Wednesday, December 4, 2019

वामपंथ की क्रांति!



कल मुझे एक सपना आया:
बायें हाथों को दलित बता,
किसी ने क्रांति का गीत सुनाया---

काट दो दाएं हाथ को जो स्वयम् तो अन्न
 पकड़ता है और तुमसे मल धुलवाता है।
स्वयं तो वह कलम पकड़ता है लेकिन तुमसे ?

●●●यही तो ब्राह्मणवाद है।

"ओ बाएं हाथ, क्या तुमको पता है कि  हाँथो के आदिम समतावाद में दाएं और बाएं हाथ में कोई भेद न था: मनुष्य मल त्याग कर बिना हाथों के इस्तेमाल के अंगविशेष धरती में रहड़कर साफ कर लिया करता था लेकिन फिर दाहिने हाथ ने  मष्तिस्क को अपनी जकड़ में लिया और मष्तिस्क ने यह फरमान सुनाया की दायाँ हाथ प्रमुख होगा।

अब तुम्हारा काम केवल  मल धोना रह गया!!!!

तुम्हे पता है बाएं हाथ, इंग्लिश में जो बाएं हाथ का इस्तेमाल करते है उनको सिनिस्टर अर्थात  अभागा कहा जाता है?"

मेरा बयां हाथ अब  क्रांति को बेताब था, उसने  कटार पकड़ ली और झपटा दाएं हाथ की ओर लेकिन, तभी मेरी नींद टूट गई और मैं जग गया।

हालांकि मै  लतरहत्था हूँ तो जग गया लेकिन जो दाहिने हाथ से अन्न खाते है और बाएं से मल धोते है उनका क्या???

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 वेस्टर्न टॉयलेट के आने से दाएं हाथ और बाएं हाथ का  भेद मिट गया और  कलम की जगह  कीबोर्ड ने दाहिने हाथ की  सामन्तशाही को समाप्त कर दिया।
कांटे-चम्मच के इस युग में अब दाहिने हाथ से भोजन?
 जंगलीपन है,  असभ्यता,  गंवारपन की निशानी है।

हमे इस  नई तकनीक का स्वागत करना चाहिए जिसने हाथों के बीच समरसता लाकर उस पुराने हाथों के आदिम समतावाद को पुनर्स्थापित कर दिया।

अब हवन की आहुति डालते वक़्त इस बात की परवाह नही करनी की  हवि किस हाथ से दी जा रही है।

यद्यपि कुछ पुरातनवादी आज भी मौजूद हैं जो पाश्चात्य शैली के टॉयलेट पर बैठने और  प्रेशर वाश के बावजूद हाथ धोने की  रूढ़ि से बाहर नही निकल पाए हैं।

और कुछ पुरातनवादी तो इस नई व्यवस्था को स्वीकार ही नही कर पाए और  कब्ज से मर गए।

सौ दो सौ सालों तक तक तो सब ठीक चला लेकिन मष्तिस्क इस बात से अंजान न था कि एक नयी सेंसिब्लिटी जन्म ले रही है।

यह सेंसिब्लिटी पहले की तरह  स्थूल न थी बल्कि काफी  सूक्ष्म थी क्योंकि मानव मष्तिस्क भी स्थूल से सूक्ष्म हो चला था।

इस काल से उस सेंसिब्लिटी को महसूस कर पाना या उसके विषय में क्ह पाना भविष्य में देखने जितना कठिन होगा।

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यह क्या???

ये द्विपदी मानव  हाँथो और पैरों के बल क्यों चल रहे हैं? मानव चौपाया बनने की कोशिश क्यों कर रहा है?
ओह,तो अब पैरों ने हाथों के खिलाफ  विद्रोह कर दिया है!!
पैरों की उंगलियां, हाथों की उँगलियों के बराबर  हक़ चाहती हैं।

ये किया लिखा है---

" हमे हज़ारो सालो से भार के नीचे दबाया गया वरना ऐ हाथ हम भी तुम्हारी तरह कीबोर्ड चलाते, हम भी तुम्हारी तरह कांटा-चम्मच उठाते।"
अब तो हमे भी बराबरी का हक़ चाहिए-अब हम अकेले भार नही उठाएंगे, अब मनुष्य को फिर से चार पैरों पर चलना होगा!"

 चलना होगा!!चलना होगा!!!

( हमारा दमन हुवा है।)

और अब द्विपदी मनुष्य  को पुनः चौपाया बनाने की बात चल रही है !!!


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