हाँ तो बात हो रही थी दर्शन की तो सर्वप्रथम इसका अंग्रेजी पर्याय #फिलोसोफी अर्थात love for Wisdom, विवेकानुराग।
दर्शन विवेकानुराग से अधिक है और उसकी चर्चा फिर कभी। यहाँ फिर वही प्रश्न की क्या फिलोसोफी प्रासंगिक है?
इस प्रासंगिकता के प्रश्न पर विचार करने के पूर्व हमे डाटा, इन्फॉर्मेशन, नॉलेज तथा विज़डम के अंतर को समझना होगा क्योंकि "वैग्यानिक ज्ञान" तो होता है "वैग्यानिक विवेक" या "साइंटिफिक विज़डम' शब्द मेरा दावा है कि आपने नही सुना होगा। विज़डम हमेशा फ़ॉलोसॉफिकल होती है: फ़ॉलोसॉफिकल विज़डम।
इस विषय पर अल्लामा इक़बाल की एक बहुत ही सुंदर नज़्म है:
ख़िरद के पास खबर के सिवा कुछ और नही
तेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नही।
ख़िरद का अर्थ मस्तिष्क है, मस्तिष्क विज्ञान करता है लेकिन यह पदार्थ और ऊर्जा विषयक खबर और इल्म केवल चिराग-ए-राह है।
वह लिखते हैं:
गुजर जा अक्ल से आगे के यह नूर
चिराग-ए-राह है मंज़िल नही है।
मंज़िल का पता फिर कौन बताए? मंज़िल का पता विवेक ही बता सकता है और विवेकानुराग ही तो फिलोसोफी है।
रिचर्ड फाइनमेन ने यह कहा था कि विज्ञान का दर्शन #वैज्ञानिक के लिए उतना ही आवश्यक है जितना पक्षियों के लिए पक्षीशास्त्र।
वियतनाम वार के पश्चात MIT ने, जिसकी तर्ज पर भारत के IITs मॉडल्ड हैं अपने पाठ्यक्रमो में मानविकी को शामिल किया क्योंकि उनका मानना था कि #मानवीय_स्पर्श_के_साथ_वैज्ञानिक एक #निरे_वैज्ञानिक से बेहतर मनुष्य है और वैज्ञानिक के पास वैज्ञानिक ज्ञान के अलावा विवेकी चेतना भी होनी चाहिए। (https://youtu.be/8Oh_4McLjuU)
आई आई टीज़ ने भी एम आई टी पर मॉडल्ड होने के कारण आई आई टीज़ में मानविकी का पाठ्यक्रम शामिल किया हालांकि यह किस हद तक सफल रहा उस पर एक अलग चर्चा हो सकती है और इस विषय पर #प्रोफेसर_कौर का विख्यात #पेपर है।
आई आई टी में दर्शन की भी पढ़ाई होती है इस तथ्य को प्रमाणित करने हेतु आई● आई● टी मद्रास द्वारा यह लिंक डाल रहा हूँ
https://www.youtube.com/playlist?list=PLM6LeGBYW4gc0B0ddemhN8XkoVm_IJeKp
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