Friday, July 30, 2021

ज्ञानमीमांसा और मनोविज्ञान

ज्ञानमीमांसा और मनोविज्ञान 

हमारी संवेदनाएं, वाह्य और आंतरिक इंद्रियों के माध्यम से हमारे मनस में उपस्थित होती रहती हैं। इनमें कुछ सम्वेदनाएँ वाह्य होती है और कुछ आंतरिक। पुनः असामान्यता की स्थिति में छद्म सम्वेदनाएँ भी उपस्थित होती हैं जिनकी रचना हमरा मस्तिष्क करता है। सम्भव है कि कुछ सम्वेदनाएँ बिना बुद्धि की पकड़ में आए हमारे मनस में उपस्थित हों यथा यह उन प्राणियों में होता है जिनका मष्तिष्क अभी बुद्धि के लिए बिकसित नही हुवा है। मस्तिष्क के विकास के साथ बुद्धि अस्तित्व में आती है और फिर यह सम्वेदनाओं पर सक्रिय होती है। सम्वेदनाओं पर बुद्धि की सक्रियता के पश्चात या साथ ही मष्तिष्क की कोई और शक्ति भी सक्रिय होती है जो इनकी पहचान करती है। सम्भवतः इसी शक्ति में हमारी भाषा का स्रोत भी उपस्थित है जिसके द्वारा अब इस कोपम्लेक्स को व्यक्त किया जा सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया को यदि एक रेखाचित्र के माध्ययम से व्यक्त किया जाय तो यह निम्नवत होंगी-

इस रेखाचित्र से कई सम्भावनाओ को पकड़ा जा सकता है--

एक वाह्य जगत है जिससे हमें उद्दीपन प्राप्त होते है किंतु सारे उद्दीपन संवेदना नही बनते बल्कि इनमें से कुछ उद्दीपनो में ही वह शक्ति होती है जो हमारी ज्ञानेंद्रियों को क्रियारत कर सकता है। वैसे उद्दीपन जिनमे यह शक्ति होती है वही मात्र सम्वेदनाएँ बनती हैं।

हमारा विकास चूंकि वैसे जीवों से होकर हुवा है जिनके पास बुद्धि नही थी और यह सम्वेदनाएँ उन्हें सीधे अनुभूत होती थी अतः हमारी कुछ सम्वेदनाएँ  उन पर बिना बुद्धि के क्रियाशील हुए हमारी अनुभति का हिस्सा बन जाती हैं। 
दार्शनिक भाषा मे सम्भवतः यही निर्विकल्प प्रत्यक्ष है।
बची हुई सम्वेदनाओं पर बुद्धि क्रियाशील होती हैं और इन्हें नाम, रूप, आकार, जाति आदि  कोटिया प्रदान किया जाता है और इसके बाद यह अनुभूति के लिए उपलब्ध होती हैं।
यह भी सम्भव है, जैसा कि मनोरोगों में होता है कि 
या तो सम्वेदनाएँ  वाह्य और आंतरिक यथार्थ में हो ही नही और तब भी कहीं से उपस्थित हो और इन पर बुद्धि कार्य कर आगे अनुभूति के लिए प्रेषित कर रही हो और उसकी अनुभूति भी हो रही हो (साइकोसिस) या उतनी इंटेंस संवेदना न हो जिस इंटेंसिटी के साथ वह अनुभूत हो रही हो या जिस इंटेंसिटी के साथ संवेदना उपस्थित है वह उस इंटेंसिटी के साथ अनुभूत न हो रही हों।
पुनः यह भी सम्भव है कि वाह्य या आंतरिक वस्तु या घटना से जो संवेदनों का प्रवाह प्राप्त हो रहा है वह व्यक्ति विशेष के संदर्भ में औसत से इस मामले में विचलित हो गया हो कि कहा और किस क्षण तक वह सीधे अनुभूत हो रही है और कहा और किस क्षण और स्तर तक उनपर बुद्धि क्रियाशील होकर उसे आगे अनुभूति के लिए प्रेषित कर रही है।
ऐसे में यदि एक आदमी सबको (औसत की दृष्टि से) आदमी दिखता हो तो सम्भवतः उपरोक्त इस असामान्य प्रकिया के कारण उस आदमी की ट्विस्टेड और डिस्टॉर्टेड तस्वीर इस असामान्य व्यक्ति को मिल रही हो। (चित्र)

असामान्यता की स्थिति में यह भी सम्भव है कि सम्वेदनाओं पर बुद्धि सक्रिय ही न हो पा रही हो या कम सक्रिय होती हो जो किसी घटना विशेष के संदर्भ में भी हो सकता है या व्यक्ति के साथ यह हमेशा की बात हो यथा एक मंदबुद्धि।

बोध/अनुभूति के समरूप और बराबर भाषिक रूप हो भी सकता है और नही भी हो सकता। जब यह भाषिक रूप बोध/अनुभूति के बराबर नही होता तो इसे भाषा व्यक्त नही कर पाती या यदि करती है तो भाषा के सर्वमान्य नियम टूटने लगते हैं और शब्द अर्थ से परे जाने लगते हैं यथा रहस्यवादी अनुभव का वर्णन।

ज्ञानमीमांसा ज्ञान विषयक अध्ययन है जिसमे ज्ञान के सम्प्रत्यय, ज्ञान के स्रोत, ज्ञान की कसौटियां, इसकी सीमाएं आदि का अध्ययन होता है। जिस ज्ञान, जिस बोध को भाषा मे व्यक्त  ही न किया जा सके उसका अध्ययन करना लगभग असंभव है अतः रहस्यात्मक ज्ञान ज्ञाननमीमांसा का विषय नही बनता। पुनः ज्ञानमीमांसा का विषय मनुष्येतर प्राणियों का ज्ञान(?) या वह ज्ञान (?) जिसमे संवेदना और बुद्धि या इनमें से कोई एक  सांख्यकीय दृष्टि से विचलित हो अथवा कोई ऐसा ज्ञान जिसके विषय मे यह दावा किया गया हो कि इसमें कोई संवेदना उपस्थित नही है या यह इन सारी प्रक्रियाओं से हटकर आई है, नही है।
अतः ज्ञानमीमांसा के अंतर्गत जो ज्ञान है वह संवेदना-बुद्धि--भाषा, इन तीन तंतुओं से बनी रस्सी है। 

बुद्धि संवेदना से विशिष्ट है क्योकि यह चेतना के विकास क्रम में दूसरे स्तर पर इमर्ज होती है (प्रथम स्तर पर संवेदना और तृतीय स्तर पर भाषा इमर्ज होती है) को इनपुट चाहिए-यह इनपुट उसे संवेदनों से भी मिल सकता है , स्वयम बुद्धि से भी और यह स्वयं से मिले प्रदत्तो पर भी क्रियाशील होकर उन्हें भाषिक रूपों में परिवर्तित कर उन्हें ज्ञान बना सकती है।

Sunday, July 18, 2021

ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति।


ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति।

मुझे मालूम है कि एक न्युमोनल यथार्थ है और एक फिनोमेनल यथार्थ है। न्यूमोनल यथार्थ के पार और परे कोई यथार्थ है या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक नया यथार्थ रचने की कोशिश हमेशा से मेरे पूर्वजो ने की है, और उन्होंने फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक यथार्थ की रचना करने का सतत प्रयास फेनोमेनल यथार्थ की नग्न सच्चाइयों से बचने के लिए किया है। फेनोमेनल यथार्थ बहुत ही कुरूप है। इससे संयुक्त होकर मेरे पूर्वज वेदना और पीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कुरूपता को उन्होंने अपनी कविताओं और चित्रों से ढकने का प्रयास किया ताकि उनकी पीड़ा कुछ कम हो सके किन्तु ऐसा नही हुवा। मेरे पूर्वजो ने फिनोमेनल यथार्थ की कुरूपता से बचने के लिए न्युमोनल यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश की और ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का गीत गाया किन्तु सच यह है कि यह न्यूमोना उनकी पकड़ में कभी आया ही नही और वो फेनोमेना की कुरूपता और वहाँ उपस्थित वेदना से तिल तिल कर मरते रहे।

मैं फेनोमेनल यथार्थ में एक वैज्ञानिक हूँ अतः मैंने इसकी कमियों को, इसकी कुरूपता को काव्य और पुराणों से ढकने के बजाय एक हाईपररियलिटी की रचना कर डाली और इसको मेरे सामने खड़े लोगो की सामूहिक चेतना से जोड़ डाला। मैं इसे  प्रकृति से संस्कृति की ओर वास्तविक संक्रमण कहता हूँ और देखिए इन लोगो को ये कितने खुश हैं--यह जो दौड़ रहा है वह फेनोमेना में हाथ-पैर से अपाहिज बिस्तर पर पड़ा हुवा है-- एक दुर्घटना ने इसके हाथों और पैरों को छीन लिया। यह जो दूसरा सबको उपदेश दे रहा है वह भी फेनोमेना में एक बिस्तर पर बेहोश पड़ा हुवा है। यह वहां एक अपराधी था और इसे फांसी की सजा दी गई थी लेकिन फांसी के रस्सियों ने इसे मारा नही बल्कि इसके मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर दिया और इसे हमेशा के लिए बेहोश कर दिया। फेनोमेना में अभी इसको लेकर तर्क वितर्क चल रहे है कि इसके होश में आने पर इसे पुनः फाँसी देनी चाहिए या इसकी सजा पूरी मानकर इसे मुक्त कर देना चाहिए।

ईश्वर है या नही मैं नही जानता और मनुष्य न्युमोना को जानकर ईश्वरतुल्य हो जाता है या नही यह भी मैं नही जानता क्योकि ईश्वर यदि हो भी तो उसने न्युमोनल यथार्थ के बारे में फिनोमेनल यथार्थ के मनुषयो को कुछ नही बताया लेकिन मैंने इन सबको यह बता दिया है कि वो एक सिम्युलेशन में हैं और फेनोमेनल यथार्थ में वो बिस्तर पर पड़े घुट रहे हैं। अब जब उनसे फेनोमेनल वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करने की कोशिश करता हूँ तो वह मुझसे ही पूछते है कि उन्हें  उस वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में क्यो जानना चाहिए। फिर वो आगे कहते है कि फेनोमेना में मनुष्य की धारणा थी कि उन्हें वस्तुनिष्ठ यथार्थ को इसलिए जानना चाहिए कि वो अपने पीड़ा को उतपन्न करने वाली परिस्थितियों को बदल सके लेकिन इस हाइपररियल्टी में तो उन्हें कोई पीड़ा ही नही है अतः उनके लिए ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का कोई मतलब  नही।

Saturday, July 17, 2021

रहस्यानुभूति

रहस्यानुभूति १

मुझे अपने जन्म का अनुभव नही है, शायद किसी को उसके जन्म का अनुभव नही है क्योकि तब मेरी चेतना उतनी विकसित नही थी पुनः मैं अपने मृत्यु के अनुभवों को साझा करने के लिए भी उपस्थित नही रहूंगा, कोई नही रहता तो इसका क्या यह अर्थ ले लिया जाय कि जन्म और मृत्यु के समय कोई अनुभव होते ही नही? 
यद्यपि इन अनुभवों के न्यूरल कोरिलेट्स ढूंढ लिए जाएं और उनको कोई बहुत ही एडवांस मशीन मेरे लिए रिप्रोड्यूस भी कर के इनकी अनुभूति मेरे लिए उपलब्ध करा दे तथापि क्या दूसरा कोई मेरी  अनुभूति को अनुभूत कर सकता है? 
सम्भवतः नही, मनस दर्शन में इसे क्वालिया कहा जाता है और इसकी व्यक्तिनिष्ठता से सम्बंधित क्यों और कैसे को डेविड चालमर हार्ड प्रॉब्लम ऑफ द कौंससनेस कहते है। 
साधारण उदाहरण से समझना हो तो क्या आप मेरे सामने रखे लाल रंग के मेरे अनुभव को समझ सकते हैं? मेरे अनुभव मेरे नितांत निजी अनुभव हैं इनको उसी रूप में पूर्णता के साथ न तो आप समझ सकते हैं और न ही मैं इंनको व्यक्त कर सकता हूँ और इसका कारण यह है कि हमारी भाषा असीम रूप से सामर्थ्यवान नही है, इसकी अपनी सीमाएं हैं। और चुकी इसकी अपनी सीमाएं है अतः जगत में हमे केवल अभिव्यक्त होने वाली सत्ताएं और घटनाएं ही नही मिलती बल्कि वैसी सत्ताएं भी हैं जिनको अभिव्यक्त नही किया जा सकता।
पुनः हमारी भाषा मात्र चेतना की सामान्य दशा में हमारे लिए उपलब्ध अनुभवों के परित: ही विकसित हुई है अतः चेतना के अल्टर्ड स्टेट में अभव्यक्ति भाषा के नियम और शब्दावलियों से पार चले जाते हैं साथ ही हमारी भाषा चेतना की एक सामान्य दशा में भी एक निश्चित स्पेक्ट्रम तक ही अपने कार्य को करने में समर्थवान है। इस रेंज से निचे और ऊपर के हमारे अनुभवों का भी हमारी भाषा साथ नही दे पाती।

रहस्यानुभूति ऐसी ही परिघटना है जिसको यदि अभिव्यक्त करें तो भाषा टूट जाती है, शब्द अपने से परे अर्थ देने लगते है, अनुभूति करने वाला उलटबांसियों और व्याघातों में बात करने लगता है।

ज्ञान भाषा से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है क्योकि हम   जिस न्यायोचित सत्य विश्वास को ज्ञान कहते है वह कॉन्सेप्चुवल होता है और कोई भी कॉन्सेप्ट शब्द और भाषा के उस नियम के पालन के बगैर,जिससे दुसरो को भी सहमति है, व्यक्त नही किया जा सकता। इन कॉन्सेप्ट्स की संरचना, अमूर्तीकर्ण और नामकरण मनुष्य की विचारशीलता पर आधारित है और विचार स्वयम अभव्यक्ति के लिए भाषा पर अतएव, रहस्यानुभूति जो कि अत्यंत निजी घटना है, इसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन बहुत ही कठिन है तथापि इसका विविध दृष्टिकोणों से अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।

रहस्यानुभूति २

बेली लिखते हैं कि जिन्हें इस "उपस्थिति" का साक्षात्कार हुवा है उनके लिए तर्क अनावशयक है और जिन्हें इस उवस्थिति का साक्षात्कार नही हुवा है उनके लिए तर्क बेकार है। 
रुडोल्फ ओटो का कहना है कि रहस्यवादी अनुभूति अनूठी और अनुपम है। यह अनुभति सभी धार्मिक अनुभूतियों की सतह पर विद्यमान है तथा यह इतनी प्राइमरी और एलिमेंट्री है कि इसे किसी भी अनुभूति अथवा कॉन्सेप्ट के आधार पर स्पष्ट नही किया जा सकता। यह स्वजातीय और स्वर्गीय अथवा सुई जेनेसिस है अर्थात भाषा में अभिव्यक्त होने के बुद्धि की आवश्यक प्रक्रिया इसका वर्गीकरण, अमूर्तकरण, नामकरण आदि नही कर पाती।

प्रतीत होता है कि रहस्यानुभूति निर्विकल्प प्रत्यक्ष के पूर्व की भी घटना है और इस कारण यह अयोक्तिक, सरलतम और अभेदित है और इसी कारण यह हमारी भाषा का विषय नही बन पाती।
फर्नांड दी सुसुर, लिंग्विस्ट, के अनुसार हमारी भाषा भेदों की उपस्थिति के आधार पर काम करती है।

जेम्स के अनुसार रहस्यानुभूति के चार प्रमुख लक्षण है-अनिवर्चनीयता, प्रज्ञानात्मकता का एक अंश, क्षणभंगुरता और शिथिलता।

प्रतीत होता है कि रहस्यानुभूति चेतना की वह सरलतम और अभेदित अवस्था है जिसमे संज्ञानत्मकता और भावात्मकता दोनों ही अपने आरंभिक रूप में गूंथे होते है और आगे चलकर हमारा मस्तिष्क या मन या बुद्धि या स्वयम इस चेतना में अन्य जटिलताएँ जुड़कर और डिफ्रेंशिएट या विभेदित होकर स्पष्ट भावना और हमारे सहज बोध का निर्माण करती है।

रहस्यानुभूति ३

समाधि
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सम्भव है जब तक ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैत बना रहे यह अविद्या है। अविद्या के नष्ट होने पर यह द्वैत तिरोहित हो जाता हो।
हमारा ज्ञान हमारे जीवन, हमारी प्रजाति के जीवन के बने रहने की प्रवृत्ति से कंडिशन्ड है।
पता नही हम इस कंडिशनिग को तोड़ सकते हैं या नही, शायद तोड़ सकते हों, शायद मिनिमाइज कर सकते हों और वही समाधि की अवस्था हो और तब जो ज्ञान होगा, जो प्रज्ञा जागेगी वह न्यूनतम प्रतिबंधित, न्यूनतम कंडिशन्ड हो।
इस प्रज्ञा में सम्भव है कि जगत का नानात्व, ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैत मिट जाता हो और इस दृष्टि में परमार्थ दिखता हो जिसमें "अयमात्मा ब्रह्म"और इस बोध को प्राप्त व्यक्ति फिर तो व्यवहार में यही कहेगा: नेति, नेति!

शायद वह प्रकिया विकास को उलट कर, जीवन के पहले को महसूस करने की है तभी यह कंडिशनिग जाएगी।
एक प्रयोग किया, मष्तिष्क को विचार शून्य करने का प्रयास किया। यदि यह अवस्था पा लेता हूँ तो विकास को पीछे ले जाकर उस अवस्था के बोध में शायद पहुंच जाऊंगा जब विचार नही हैं, केवल सम्वेदनाएँ है: एक जानवर के मस्तिष्क की अवस्था (जानवर हमसे कम कंडिशन्ड हैं)। फिर और पीछे, फिर और पीछे---------और तब शायद समाधि।

कुंडलिनी जगाने/समाधि का मतलब कहीं जीवन जिस प्रारंभिक कंडीशन से शर्तबद्ध है उसको भी सचेतन पार कर जाना तो नही?

रहस्यानुभूति ४

जीवन की उत्तपति से पहले अजीवन  था अथवा ब्रह्मांड की उतपत्ति बिग बैंग में होती है अथवा जगत में दो चीजें होती हैं -उतपत्ति और नाश अथवा जगत और हमारे खुद के विषय मे हमरा जो भी अनुभव है और इन अनुभवों के लिए जो भी समीकरण हैं वह वस्तुनिष्ठ रूप से (बल्कि सत्तात्मक रूप से कहना ज्यादा उचित होगा) कितने वस्तुनिष्ठ हैं या वह जीवन के आधार रूप के ऊपर इमर्ज जीवितों की चेतना के स्वरूप का किसी उपस्थिति या सत्ता पर आरोपण है यह हम नही कह सकते।
सम्भवतः उतपत्ति, विनाश, जीवन, अजीवन आदि कोटिया हमारी चेतना की रचना हो और यह रचना हमारे जीवन (जीवित रहने नही) की शर्त से बंधा हो लेकिन कोई तरीका भी उपस्थित हो के हम शर्त को हटाकर भी कुछ देख सकते हैं और समाधि, रहस्यानुभूति वही हो।

कब, कहाँ, क्यों, कैसे, कितना इन्ही प्रश्नों का उत्तर ही तो विज्ञान भी हमे देता है न लेकिन सत्ता, अस्तित्व या उपस्थिति मात्र इन्ही प्रश्नों के उत्तर से बना है यह कहना ठीक नही होगा; ये प्रश्न या भाव हमे जीवित रखने में तो सहायक होते हैं किंतु सत्ता सम्भवतः इनके पार रहती है।

दुर्योधन कृष्ण को कब क्या क्यो कैसे कितना की कड़ियों से बने बेड़ियों से बांध लेगा?

Sunday, July 11, 2021

पोस्टमोडरनिज्म


 पोस्टमोडरनिज्म
एक: 

कांटियन ज्ञानमीमांसा यह निष्कर्ष स्थापित करती है कि हमारी बुद्धि न्युमोना या थिंग-इन-इटसेल्फ या परम सत्ता तक नही पहुँच सकती; इसकी पकड़ मात्र फेनोमेना तक ही है। फेनोमेना वह है जो हमारी चेतना में प्रकाशित होता है। न्युमोना को हमारी चेतना अपने पूर्वनिर्धारित संरचना, नियम और कोटियों के माध्ययम से पकड़ती है जिसके कारण चेतना में जो प्रकाशित होता है वह थिंग इन इटसेल्फ या वस्तुगत सत्ता नही होती बल्कि इसमें व्यक्तिनिष्ठता होती है।
कांट के इस ज्ञानमीमांसिय स्थापना के विरूद्ध यद्यपि प्रतिक्रियाएं हुई और न्यूमोना को अनावश्यक मान कर हीगल ने फेनोमेना को ही अपने "फेनोमेनोलॉजी ऑफ द स्पिरिट" का विषय-वस्तु बनाया तथापि कांटियन स्थापना अपने मूल भाव के साथ आगे के दार्शनिक विचारों को प्रभावित करने वाली थी और  हाइडेगर तथा नीत्शे के दर्शन में बुद्धि सत्ता को जानने और पकड़ने के लिए मनुष्य के अन्य सम्वेदनाओं से कमतर ही नही बल्कि उग्र रूप में यह स्वीकारोक्ति बन जाती है कि मानवीय बुद्धि सत्ता की डिफ़ॉर्मड और डिस्टॉर्टेड तस्वीर प्रस्तुत करती है। नीत्शे का सुपरमैन इस आशय से बुद्धि का त्याग ही कर देता है और वह यथार्थ को बिना किसी रेशनलाइजेशन, नीत्शे के अनुसार जिसके निमित्त ही बुद्धि है, के स्वीकार करता है। 

पोस्टमोर्डन चिंतन, सत्यता और बुद्धि विषयक विचारधारा को, जिसका जन्म कांट की ज्ञानमीमांसा में हुवा था और जिसको नीत्शे एवम हाइडेगर आगे ले जाते है, को और आगे ले जाते है जिसके कारण मानवीय बुद्धि में विश्वास, जो कि पुनर्जागरण और आधुनिक दर्शन का केंद्र बिंदु था, दर्शन के केंद्र से बाहर कर दिया जाता है और
निष्कर्षत: बुद्धि हमे सत्यता दिखाने में समर्थ ही नही है तथा वस्तुगत सत्यता कुछ होती ही नही है, की स्थापना होती है।


कांट--मानवीय बुद्धि सत्य तक पहुंचाने में  असमर्थ है।
हीगल--सत्य बौद्धिक है साथ ही यह स्वयम को व्यघातो के द्वारा प्रस्तुत करता है।
मार्क्स: यद्द्यपि सत्य स्वयम को व्याघातो द्वारा प्रस्तुत करता है यह अपने अंतिम स्वरूप में भौतिक है।

लेकिन आगे दर्शन का विकास उपरोक्त की भांति लीनियर या रैखिक नही हुवा। आगे दर्शन की कई धाराओं में एक धारा यह आई जिसमे उसने कांट और हीगल का संश्लेषण प्रस्तुत किया जिसके अनुसार यथार्थ को मानवीय बुद्धि नही पकड़ सकती साथ ही सत्य द्वन्दों और कन्फ्लिक्टस से भरा हुआ है।
मार्क्स के लिए यद्द्यपि सत्य द्वंद और संघर्षों से भरा हुआ है तथापि वह मानवीय बुद्धि का विषय है और इस अर्थ में मार्क्स भी पुनर्जागरण के दार्शनिक कहे जा सकते है किंतु जर्मनी में दर्शन की एक और धारा भी पनप रही थी जिसका चरित्र पुनर्जागरण की भावना के विरुद्ध था।

इस प्रतिपुनर्जागरण की मूल स्थानपा इस बात के इर्द-गिर्द होने वाली थी कि मानवीय बुद्धि सत्यता को समझने में असमर्थ है। प्रोफेसर स्टीफेन हिक्स इसे ज्ञानमीमांसा की असफलता कहते है जिसके बीज कांट के क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन में उपस्थित थे जिसको हीगल के व्याघाती सत्य की संकल्पना के साथ आगे संश्लेषित किया जाना था।
कालांतर में यह व्याघाती सत्य जीवन मे उपस्थित संघर्ष और कनफ्लिक्ट बन गया और मानवीय बुद्धि को तो इस प्रति-पुनर्जागरण के चिन्तनों के उग्र रूप में सत्य को समझने की राह में व्यवधान की तरह देखा गया। 

यद्यपि जर्मनी से निकली प्रति पुनर्जागरण  की धारा अपनी दिशा में नीत्शे, हाइडेगर और हुसर्ल आदि के दर्शन में फल फूल रही थी तथापि पाश्यात्य जगत में दर्शन की एक धारा थी जिसने पुनर्जागरण की मानवीय बुद्धि में विश्वास को जीवित रखा था। यह धारा एंग्लो-अमेरिकन परम्परा की धारा थी लेकिन इनके हाथों में दर्शन का स्वरूप अब वह नही रह गया जो आज तक दर्शन के स्वरूप के विषय मे पाश्चात्य जगत की परपरा थी। इस एंग्लो-अमेरिकन परम्परा के यह निष्कर्ष थे कि तत्त्वमिमनासा के कथन ही निर्रथक है अतएव अब अपनी भूमिका में दर्शन को विज्ञान का सबऑर्डिनेट बन जाना चाहिए तथा इसका काम किसी प्रकार का संश्लेषण नही वरन विश्लेषण होना चाहिए। इस धारा ने भाषा, चिन्हों, संकल्पनाओं का विश्लेषण प्रारम्भ कर दिया लेकिन तब तक ऊपर वर्णित विचारधारा स्वयम को स्थापित कर चुकी थी अतः दर्शन की इस विचारधारा और उस विचारधारा के मध्य एक खाई पैदा हो गई।
दर्शन के इतिहासकार इस घटना को एनालिटिकल-कॉन्टिनेंटल स्पिल्ट कहते है। 

मजेदार बात यह है कि प्रति-पुनर्जागरण जे  उत्तरआधुनिक दर्शन अमेरिकी विश्वविद्यालयों में फला फुला जबकि उनकी धारा तो विश्लेषणात्मक थी। इसका कारण यह है कि विश्लेषणात्मक दर्शन  ने विकसित होकर इस तथ्य को उदघाटित किया कि भाषा अपने से इतर किसी के बारे में नही बता सकती अतः किसी वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करना बेमानी है। हिक्स लिखते है कि जो बात कांट ने लगभग 200 वर्षो पूर्व की थी वही बात अब विश्लेषणात्मक दार्शनिक कर रहे थे और इसका प्रभाव यह हुवा की अमेरिकन विश्वविद्यालय नीत्शे और हाइडेगर आदि की तरफ झुकते चले गए।

अब समग्र पाश्चात्य जगत में वस्तुगत सत्यता एक मिथक था तथा बुद्धि भी उतनी बौद्धिक नही थी---इस स्थापना के साथ ही आधुनिक युग का अंत हो चुका था और हम उत्तरआधुनिक युग मे प्रवेश कर चुके थे।



दो: 

नौलेज इज़ पावर--मिशेल फूको को पढ़ने के बाद स्पष्ट हो गया कि पूर्वाधुनिक काल की प्रवृतियां आधुनिक काल मे भी नही बदली और वास्तव में पुनर्जागरण का वह उद्देश्य की ज्ञान से मानव को उसके अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त करना है--वही, नए कलेवर में, ऋग्वेद के तमसो मा ज्योतिर्गमय पुनः प्रभुता (डोमिनेन्स) का एक हथियार ही बन गया और मार्क्सवादी विमर्शों की पूर्व आधुनिक काल का बाइनरी 'विप्र और शूद्र' आधुनिक काल मे एक नए शरीर के साथ उपस्थित हो जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि स्वयम मार्क्सवादी के पास इनको या तो देखने और महसूस करने की दृष्टि नही है या वो जानबूझ कर इनकी अनदेखी करते हैं।
सम्भवतः इसका कारण यह है कि मार्क्सवाद संरचनावाद के इर्द गिर्द बुना गया विमर्श और चिंतन है। इसकी जगत और मानवीय दशा की व्याख्या में अर्थव्यवस्था आधार रूप में उपस्थित है लेकिन अब हम इतिहास के उत्तरआधुनिक युग मे पहुंच गए है और इस युग की चेनता ने हमे दिखाया है कि सतह के नीचे कोई स्ट्रक्चर या आधार नही है।
दो बिम्ब--सतही और आधार की थ्योरी खत्म हो रही है। सतही और सामान्य अनुभव के पीछे कुछ है यथा इंद्रधनुष। इंद्रधनुष सतही बिम्ब है तथा इसका एक वैज्ञानिक विम्ब भी है जिसे 'आधार बिम्ब' कहा जाता रहा है, परन्तु यह आधार-बिम्ब भी अपने आप मे और जाननेवाले से इस प्रकार उलझा हुवा है कि अब विज्ञान और फिक्शन का अंतर मिटता प्रतीत हो रहा है।

आधुनिकता के पास एक प्रोजेक्ट था जिसके लिए उसने मनुष्य को केंद्र में स्थापित कर एक संरचना विकसित की थी। आधुनिकता के पास अपने आधुनिक मूल्य थे लेकिन उसके गर्भ में ही कुछ ऐसा भी पल रहा था जिसने उसे आगे अप्रसांगिक कर दिया और आधुनिकता की आशा  को ही अब संशय से देखा जाने लगा। आधुनिकता ने जो संरचना बनाई थी, जो उद्देश्य बनाए थे, जो मूल्य रचे थे उसका क्षरण आरंभ हो गया। आधुनिकता इस क्षरण को त्रासदी के रूप में देखती है लेकिन उत्तरआधुनिकता का तो जन्म ही इसी में हुवा है अतः वह इस क्षरण को एन्जॉय करती है। 
देज़ा वू!! आधुनिकता का जन्म भी तो पूर्वआधुनिकता के क्षरण में हुवा था। उसने भी तो  ईश्वर का मजाक उड़ाया था। उत्तरआधुनिकता का जन्म भी आधुनिकता के क्षरण में हो रहा है और वह अब आधुनिकता के केंद्र वाले मनुष्य  को चिढ़ा रही है।

--------★★★★---------

उत्तरआधुनिकता

कांट--मानवीय बुद्धि सत्य तक पहुंचाने में  असमर्थ है।
हीगल--सत्य बौद्धिक है साथ ही यह स्वयम को व्यघातो के द्वारा प्रस्तुत करता है।
मार्क्स: यद्द्यपि सत्य स्वयम को व्याघातो द्वारा प्रस्तुत करता है यह अपने अंतिम स्वरूप में भौतिक है।

लेकिन आगे दर्शन का विकास उपरोक्त की भांति लीनियर या रैखिक नही हुवा। आगे दर्शन की कई धाराओं में एक धारा यह आई जिसमे उसने कांट और हीगल का संश्लेषण प्रस्तुत किया जिसके अनुसार यथार्थ को मानवीय बुद्धि नही पकड़ सकती साथ ही सत्य द्वन्दों और कन्फ्लिक्टस से भरा हुआ है।
मार्क्स के लिए यद्द्यपि सत्य द्वंद और संघर्षों से भरा हुआ है तथापि वह मानवीय बुद्धि का विषय है और इस अर्थ में मार्क्स भी पुनर्जागरण के दार्शनिक कहे जा सकते है किंतु जर्मनी में दर्शन की एक और धारा भी पनप रही थी जिसका चरित्र पुनर्जागरण की भावना के विरुद्ध था।

इस प्रतिपुनर्जागरण की मूल स्थानपा इस बात के इर्द-गिर्द होने वाली थी कि मानवीय बुद्धि सत्यता को समझने में असमर्थ है। प्रोफेसर स्टीफेन हिक्स इसे ज्ञानमीमांसा की असफलता कहते है जिसके बीज कांट के क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन में उपस्थित थे जिसको हीगल के व्यघाती सत्य की संकल्पना के साथ आगे संश्लेषित किया जाना था।
कालांतर में यह व्यघाती सत्य जीवन मे उपस्थित संघर्ष और कनफ्लिक्ट बन गया और मानवीय बुद्धि को तो इस प्रति-पुनर्जागरण के चिन्तनों के उग्र रूप में सत्य को समझने की राह में व्यवधान की तरह देखा गया। 

यद्यपि जर्मनी से निकली प्रति पुनर्जागरण  की धारा अपनी दिशा में नीत्शे, हाइडेगर और हुसर्ल आदि के दर्शन में फल फूल रही थी तथापि पाश्यात्य जगत में दर्शन की एक धारा थी जिसने पुनर्जागरण की मानवीय बुद्धि में विश्वास को जीवित रखा था। यह धारा एंग्लो-अमेरिकन परम्परा की धारा थी लेकिन इनके हाथों में दर्शन का स्वरूप अब वह नही रह गया जो आज तक दर्शन के स्वरूप के विषय मे पाश्चात्य जगत की परपरा थी। इस एंग्लो-अमेरिकन परम्परा के यह निष्कर्ष थे कि तत्त्वमिमनासा के कथन ही निर्रथक है अतएव अब अपनी भूमिका में दर्शन को विज्ञान का सबऑर्डिनेट बन जाना चाहिए तथा इसका काम किसी प्रकार का संश्लेषण नही वरन विश्लेषण होना चाहिए। इस धारा ने भाषा, चिन्हों, संकल्पनाओं का विश्लेषण प्रारम्भ कर दिया लेकिन तब तक ऊपर वर्णित विचारधारा स्वयम को स्थापित कर चुकी थी अतः दर्शन की इस विचारधारा और उस विचारधारा के मध्य एक खाई पैदा हो गई।
दर्शन के इतिहासकार इस घटना को एनालिटिकल-कॉन्टिनेंटल स्पिल्ट कहते है। 

मजेदार बात यह है कि प्रति-पुनर्जागरण जे  उत्तरआधुनिक दर्शन अमेरिकी विश्वविद्यालयों में फला फुला जबकि उनकी धारा तो विश्लेषणात्मक थी। इसका कारण यह है कि विश्लेषणात्मक दर्शन  ने विकसित होकर इस तथ्य को उदघाटित किया कि भाषा अपने से इतर किसी के बारे में नही बता सकती अतः किसी वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करना बेमानी है। हिक्स लिखते है कि जो बात कांट ने लगभग 200 वर्षो पूर्व की थी वही बात अब विश्लेषणात्मक दार्शनिक कर रहे थे और इसका प्रभाव यह हुवा की अमेरिकन विश्वविद्यालय नीत्शे और हाइडेगर आदि की तरफ झुकते चले गए।

अब समग्र पाश्चात्य जगत में वस्तुगत सत्यता एक मिथक था तथा बुद्धि भी उतनी बौद्धिक नही थी---इस स्थापना के साथ ही आधुनिक युग का अंत हो चुका था और हम उत्तरआधुनिक युग मे प्रवेश कर चुके थे।

Saturday, July 10, 2021

कांटियन ज्ञानमीमांसा और पोस्टमोडरनिज्म

कांटियन ज्ञानमीमांसा और पोस्टमोडरनिज्म

कांटियन ज्ञानमीमांसा यह निष्कर्ष स्थापित करती है कि हमारी बुद्धि न्युमोना या थिंग-इन-इटसेल्फ या परम सत्ता तक नही पहुँच सकती; इसकी पकड़ मात्र फेनोमेना तक ही है। फेनोमेना वह है जो हमारी चेतना में प्रकाशित होता है। न्युमोना को हमारी चेतना अपने पूर्वनिर्धारित संरचना, नियम और कोटियों के माध्ययम से पकड़ती है जिसके कारण चेतना में जो प्रकाशित होता है वह थिंग इन इटसेल्फ या वस्तुगत सत्ता नही होती बल्कि इसमें व्यक्तिनिष्ठता होती है।
कांट के इस ज्ञानमीमांसिय स्थापना के विरूद्ध यद्यपि प्रतिक्रियाएं हुई और न्यूमोना को अनावश्यक मान कर हीगल ने फेनोमेना को ही अपने "फेनोमेनोलॉजी ऑफ द स्पिरिट" का विषय-वस्तु बनाया तथापि कांटियन स्थापना अपने मूल भाव के साथ आगे के दार्शनिक विचारों को प्रभावित करने वाली थी और  हाइडेगर तथा नीत्शे के दर्शन में बुद्धि सत्ता को जानने और पकड़ने के लिए मनुष्य के अन्य सम्वेदनाओं से कमतर ही नही बल्कि उग्र रूप में यह स्वीकारोक्ति बन जाती है कि मानवीय बुद्धि सत्ता की डिफ़ॉर्मड और डिस्टॉर्टेड तस्वीर प्रस्तुत करती है। नीत्शे का सुपरमैन इस आशय से बुद्धि का त्याग ही कर देता है और वह यथार्थ को बिना किसी रेशनलाइजेशन, नीत्शे के अनुसार जिसके निमित्त ही बुद्धि है, के स्वीकार करता है। 

पोस्टमोर्डन ने सत्यता और बुद्धि विषयक विचारधारा को, जिसका जन्म कांट की ज्ञानमीमांसा में हुवा था और जिसको नीत्शे एवम हाइडेगर आगे ले जाते है, और आगे ले जाते है जिसके कारण मानवीय बुद्धि में विश्वास, जो कि पुनर्जागरण और आधुनिक दर्शन का केंद्र बिंदु था, दर्शन के केंद्र से बाहर कर दिया जाता है और
निष्कर्षत: बुद्धि हमे सत्यता दिखाने में समर्थ ही नही है तथा वस्तुगत सत्यता कुछ होती ही नही है, की स्थापना होती है।

Monday, July 5, 2021

वेश्या

वेश्या

तुम एक वेश्या हो, मात्र कामकला में सिद्धहस्त नही वरन पुरुष के काम मनोविज्ञान के अंतरतम की ज्ञाता। यह सँच है कि संस्कृति ने नर और मादा के सम्बन्ध को विवाह में बांध दिया है; एक नर और एक मादा लेकिन, प्रवृत्तियां कहाँ मानती हैं, जीवन तुम्हे अंदर ही अंदर ढूंढता है। इसलिए नही की तुम एक वेश्या हो बल्कि इसलिए की तुम जीवन की सबसे मूल प्रवृति को तृप्त कर देती हो; तृप्तिका!
तो क्या वह दूसरी स्त्री मेरी प्रवृत्तियों को तृप्त नही कर पाती? न ऐसा नही है लेकिन तुम्हारे पास आकर मुझे अपने पुरुष होने का अहसास और प्रबलता से होता है। मेरे पसीने से कमाए धन का तुम बढ़कर मोल चुकाती हो; तुम्हारे पास आकर मैं इस संस्कृति से बदला लेता हूँ; तुम्हारे पास हलाकि मैं चोरों की तरह आता हूँ लेकिन मेरा और तुम्हारा कुछ ऐसा नाता है कि मैं रोमांचित तो महसूस करता ही हूँ, अंततोगत्वा एक विजेता, नही विजेता पुरुष की भांति महसूस करता हूँ और इसमें तुम मेरे साथ कदम से कदम, हांथो से हाथ, कंधे से कंधा और सांसो से साँस मिलाकर चलती हो।

लेकिन तुमने उस दिन मेरे पूर्ण पुरुष होने के भ्रम को खंडित कर दिया था जब मैंने तुम्हारे आस-पास एक दूसरे पुरुष की उपस्थिति को महसूस किया था। उस दिन वह पुरूष तुम्हारी बातों में था, तुम्हारी आंखों में था, तुम्हारे शरीर पर मैंने उसके छाप महसूस किए थे, तुम्हारे पसीने में उसके पसीने की बदबू थी, तुम्हारी सांसों में उसके सांसों की दुर्गंध थी---- हाँ तुम वेश्या हो--मुझे तुमसे घृणा हो गई है---वेश्या!!

Sunday, July 4, 2021

उत्तरआधुनिकता 1


नौलेज इज़ पावर--मिशेल फूको को पढ़ने के बाद स्पष्ट हो गया कि पूर्वाधुनिक काल की प्रवृतियां आधुनिक काल मे भी नही बदली और वास्तव में पुनर्जागरण का वह उद्देश्य की ज्ञान से मानव को उसके अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त करना है--वही, नए कलेवर में, ऋग्वेद के तमसो मा ज्योतिर्गमय पुनः प्रभुता (डोमिनेन्स) का एक हथियार ही बन गया और मार्क्सवादी विमर्शों की पूर्व आधुनिक काल का बाइनरी 'विप्र और शूद्र' आधुनिक काल मे एक नए शरीर के साथ उपस्थित हो जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि स्वयम मार्क्सवादी के पास इनको या तो देखने और महसूस करने की दृष्टि नही है या वो जानबूझ कर इनकी अनदेखी करते हैं।
सम्भवतः इसका कारण यह है कि मार्क्सवाद संरचनावाद के इर्द गिर्द बुना गया विमर्श और चिंतन है। इसकी जगत और मानवीय दशा की व्याख्या में अर्थव्यवस्था आधार रूप में उपस्थित है लेकिन अब हम इतिहास के उत्तरआधुनिक युग मे पहुंच गए है और इस युग की चेनता ने हमे दिखाया है कि सतह के नीचे कोई स्ट्रक्चर या आधार नही है।
दो बिम्ब--सतही और आधार की थ्योरी खत्म हो रही है। सतही और सामान्य अनुभव के पीछे कुछ है यथा इंद्रधनुष। इंद्रधनुष सतही बिम्ब है तथा इसका एक वैज्ञानिक विम्ब भी है जिसे 'आधार बिम्ब' कहा जाता रहा है, परन्तु यह आधार-बिम्ब भी अपने आप मे और जाननेवाले से इस प्रकार उलझा हुवा है कि अब विज्ञान और फिक्शन का अंतर मिटता प्रतीत हो रहा है।

आधुनिकता के पास एक प्रोजेक्ट था जिसके लिए उसने मनुष्य को केंद्र में स्थापित कर एक संरचना विकसित की थी। आधुनिकता के पास अपने आधुनिक मूल्य थे लेकिन उसके गर्भ में ही कुछ ऐसा भी पल रहा था जिसने उसे आगे अप्रसांगिक कर दिया और आधुनिकता की आशा  को ही अब संशय से देखा जाने लगा। आधुनिकता ने जो संरचना बनाई थी, जो उद्देश्य बनाए थे, जो मूल्य रचे थे उसका क्षरण आरंभ हो गया। आधुनिकता इस क्षरण को त्रासदी के रूप में देखती है लेकिन उत्तरआधुनिकता का तो जन्म ही इसी में हुवा है अतः वह इस क्षरण को एन्जॉय करती है। 
देज़ा वू!! आधुनिकता का जन्म भी तो पूर्वआधुनिकता के क्षरण में हुवा था। उसने भी तो  ईश्वर का मजाक उड़ाया था। उत्तरआधुनिकता का जन्म भी आधुनिकता के क्षरण में हो रहा है और वह अब आधुनिकता के केंद्र वाले मनुष्य  को चिढ़ा रही है।

विद्रोही


विद्रोही

विद्रोही ने दो बार यमदूतों को मारने की कोशिश की थी हालांकि दोनों ही बार वह असफल हुवा।  तीसरी बार जब वह उनको मारने की योजना बना रहा था तब यमराज के क्रूर यमदूतों ने उसे गिरफ्तार कर लिया और बेड़ियों में जकड़ कर यमराज के पास ले गए। यद्यपि वह उन क्रूर यमदूतों द्वारा पकड़े जाने से बचने के लिए आत्महत्या कर  सकता था लेकिन उसने उनके द्वारा खुद को पकड़ लिए जाने के विकल्प को चुना क्योंकि कोई तीसरा विकल्प नही था।

यम-दरबार मे मुकदमा चला और यमराज ने उसके सामने दो विकल्प रखे--या तो वह यम-सत्ता के साथ हो जाए या सजा स्वीकार करे। 
विद्रोही को यम की सत्ता के साथ हो जाना भी उसका आत्महत्या ही लगा, एक दार्शनिक आत्महत्या। अतः यहाँ भी उसने सजा का विकल्प चुना।
सजा देने के लिए यमराज ने उसे नीचे धर्मराज के पास भेज दिया।
विद्रोही को तब तक कोड़े मारने की सजा सुनाई गई जब तक वह मर न जाए लेकिन उसे यह बात न बताई गई या उसने यह नही सुना या सम्भवतः उसने सुन कर भी अनसुना कर दिया।

अगले दिन उसे खुले मैदान में लाया गया और उस मैदान के बीचों बीच वाले खंभे से उसका मुंह और पेट सटाकर बांध दिया गया। कमर तक उसके कपड़े उतार दिए गए ताकि उसकी नंगी पीठ जल्लाद के सामने हो।

धर्मराज के जल्लाद ने कोड़े लगाने शुरू किए--सौ- दोसौ कोड़ो तक विद्रोही  के लिए सब कुछ सामान्य रहा: विद्रोही कोड़ो से उठे दर्द को अपने दांतों से दबा लेता तथा जल्लाद और अधिक वेग से उसकी पीठ पर कोड़े बरसाता। लेकिन इसके बाद वह टूटने लगा था: विद्रोही के मुँह से चीख भी निकलती और जल्लाद के कोड़े लगाने का वेग भी बढ़ता  जाता।
लेकिन, केवल यही बात न थी--विद्रोही के अंदर कुछ और भी घट रहा था--विद्रोही के मन और शरीर को दो कोड़ो के बीच के अंतराल को महसूस करने लगे थे। धीरे धीरे उसके मन और शरीर ने उन अंतरालों को पकड़ना भी सिख लिया और और फिर मात्र पकड़ा ही नही बल्कि उन्हें जकड़ने और अपने पास उन अंतरालो को हमेशा रखने के लिए प्रयास भी करने लगे; उसके मन ने दो कोड़ो के अंतराल के उसके समय-बोध को बदल दिया; उसके लिए उसके मन ने इन अंतरालों में समय की चाल को अत्यंत धीमा कर दिया। इन अंतरालों में उसके मन और शरीर खुश हो जाते, उन्हें जीवन अच्छा लगने लगता, फिर से कुछ नए स्वप्न सृजित हो जाते लेकिन तभी कोड़े का पीठ से स्पर्श.... और सारे स्वप्न, खुशी पानी के बुलबुले की तरह फूट जाते। बहुत देर तक यही चला परन्तु धीरे धीरे अब कोड़े के दर्द के अंदर यह आशा भी पनप जाती की इसके बाद एक अंतराल है जिसमे पीड़ा नही होगी। हर दर्द के साथ ही पैदा हो जाने वाली इस आशा ने उसके पीड़ा को भी कम कर दिया और उसकी चीखों की तीव्रता भी थोड़ी कम हो गई---वह विद्रोही था--जीवन विद्रोही, क्योकि जीवन ही विद्रोह है।
वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी--!

लेकिन, यह अर्धसत्य है!!
जीवन निश्चितरूप से विद्रोह है लेकिन दार्शनिक ने उस विद्रोही को सम्पूर्णता में न देखा था तथापि यह कह डाला था 'वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी'। यह सच है कि पीड़ा ने विद्रोही के सामने उसके अस्तित्व के नए आयामो को खोल दिया था तथा उसे दो कोड़ो के बीच के अंतराल को  पकड़ना आ गया था। इस अंतराल में समय-बोध को उसने काफी धीमा करना भी सीख लिया था और इन अंतरालों में उसके अंदर से स्वप्न भी फूट पड़ते जो आगे भले ही कोड़ो से उपजे दर्द में चकनाचूर हो जाते।
कोड़े के साथ उठने वाली पीड़ा में आशा का जन्म भी वास्तविक थी, लेकिन मात्र इन चीजों के देखकर जब दार्शनिक ने उसे जीवन-विद्रोही कह दिया था, वह गलत था। वह गलत था, क्योकि विद्रोही के अस्तित्व की गहराई में घटी उसकी अतार्किक, आस्था की छलांग को दार्शनिक देख ही नही पाया था। दार्शनिक यह भी नही देख पाया था कि विद्रोही के अस्तित्व में सपने दरअसल उसकी आस्था के छलांग के बाद से आते थे और उनके स्रोत वहीं अवस्थित थे जहाँ विद्रोही का अस्तित्व छलांग लगा कर पहुंचा था।
यहाँ पहुंच कर विद्रोही ने अपने व्यक्तिनिष्ठ तत्त्वमीमांसा की रचना कर डाली जिसमे वह मुक्त था ;उसके पास सारी स्वतंत्रता थी; यहाँ उसकी सारी पीड़ा मिट जाती।
उसे यह मुक्ति अच्छी लगी अतः हर बार वह उन अंतरालों में अपनी इस तत्त्वमीमांसा का लेप इस स्थान से दोनों मुट्ठियों में उठाता और वहां अपने बंधे शरीर पर लेप आता--विद्रोह!

यद्यपि भविष्य में मनोवैज्ञानिक यह लिखने वाले थे कि असल मे उसका मस्तिष्क उसे धोखा दे रहा था ताकि उसकी पीड़ा की तीव्रता उसके लिए कम हो सके तथापि उसके लिए उसकी निजी तत्त्वमीमांसा असली थी जो उसके अस्तित्व ने छलांग लगाकर शून्य से रची थी। यह कोई दार्शनिक आत्महत्या भी नही थी क्योकि जीवन का स्वभाव ही यही है: दरअसल  हर विद्रोह के पीछे आस्था है, विद्रोह का बीज विश्वास की जमीन पर ही पनप सकता है, चाहे वह जीवन-विद्रोह ही सही।

पोस्ट स्क्रिप्ट: माताजी का कैंसर के कारण लंबी बीमारी से देहांत हुवा। उन्हें असहनीय पीड़ा उठती थी लेकिन पीड़ाओं के बीच के अंतरालों को वह जीती थी, उन पीड़ाओं के बीच उठने वाले अंतरालों में उनके पास स्वप्न होते थे, आशाएँ होती थीं।


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(कामू के सिसिफस के मिथ और माताजी की पीड़ा से  प्रेरित)

Thursday, July 1, 2021

जनेऊ

जनेऊ

उस वासना के प्रेत का जनेऊ पहनना समाज के लिए एक सुखद अनुभूति थी। उसके जनेऊ के समय समाज ने उसे कई प्रण करवाए थे जिनका अभिप्राय उसे प्रकृति से निकाल कर संस्कृति में स्थापित कर देना था क्योकि बुजुर्गों को पता चल चुका था कि प्रकृति में विकृति है और इस विकृति को केवल संस्कृति ही ठीक कर सकती है।
वासना का प्रेत स्वछंद था क्योकि वह प्रकृति की विकृति लिए हुए था। उसकी स्वछंदता के ऊपर गांठ लगानी आवश्यक थी वरना यह दुनियाँ प्रेतों की दुनियाँ बन जाएगी इसलिए समाज ने उसकी वासनाओं में से उन हिस्सों को छोड़कर जिनकी पूर्ति कर वह मनुष्य के रूप में विकसित होगा, शेष पर ब्रह्मगांठ लगा दिया और उस धागे को उस प्रेत के शरीर पर लपेट दिया।
अब वासना का वह प्रेत मानव था और शेष मानवों की पंगत में बैठ सकता था और अब बुजुर्गों से भी सम्वाद कर सकता था। बुजुर्गों द्वारा साक्षात किए गए सत्य अब उसके लिए भी उपलब्ध थे।

लेकिन वासना का वह खास प्रेत, ईमानदार नही था। हालांकि उसने अपने शरीर पर धागे लपेटवाए थे और अपनी स्वच्छन्दता के ऊपर ब्रह्मगांठ लगाने दिया था फिर भी उसके अंदर की बेईमानी ने उसे दिखा दिया कि इस धागे को तोड़ा जा सकता है, ब्रह्मगांठ को खोला जा सकता है और पुनः वापस वासनाओं का प्रेत हुवा जा सकता है। उसे वापस पुनः वासनाओं का प्रेत होना था क्योकि वहाँ प्रकृति की विकृति में उसे ज्यादा सुख मिलता। वँहा उसे ज्यादा सुख मिलता क्योकि प्रकृति की विकृति में वह स्वच्छंद था और स्वच्छन्दता वास्तव में सुसंस्कृत होने से ज्यादा सुख देती है। सभी पुनः वापस प्रेत नही हो जाते क्योकि उन्हें मालूम है कि मात्र सुख ही अब हमारे जीवन का उद्देश्य नही है लेकिन इस बेईमान प्रेत के लिए उसके जीवन का उद्देश्य मात्र सुख ही था।
वासना के इस प्रेत ने जनेऊ तोड़ डाला, अपनी स्वच्छन्दता को ब्रह्मगांठो से मुक्त कर दिया और वापस संस्कृति से प्रकृति की विकृति में चला गया।

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डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...