वेदांत पर एक प्रवचन सुना। आधे घण्टे के इस प्रवचन में कुछेक शब्दो की कई बार पुनरावृति हुई: आत्मा, अहंकार, मन, चित्त, प्राण, देह, तादात्म्य आदि लेकिन उक्त प्रवचन में जिस शब्द पर अफिकाधिक ज़ोर था वह शब्द है: मृत्यु।
जहां तक मुझे लगा सारा प्रवचन इस एक शब्द के ही इर्द गिर्द घूमता रहा। हालांकि प्रवचन का उद्देश्य मृत्यु के भय को दूर करना है।
मृत्यु होनी है और मनुष्य की विडम्बना यह है कि वह इस बात को जनता है कि मृत्यु होनी है।
एक अंतहीन अंधकार-आज मैं हूँ कल नही रहूंगा-काल निगल जाएगा इसको जिसे मैं दर्पण में देखता हूँ, किसका पिता और किसका पुत्र?
सारी चेत्तना पता नही कहाँ विलीन हो जाएगी।
कुछ नही बचेगा जब बिखर जाएंगे पंचतत्व अपने पीछे क्षणिक भाव छोड़कर!!
ओह! इस भय से बाहर निकलना है। इस भय पर कैसे जीत हासिल करे?
चलो द्वैत में सोचते है:
जाति है तो मृत्यु भी है। अस्तित्व है तो अनस्तित्वव भी है। चेतना है तो जड़ता भी है।
असल क्या है?
जाति या मरण?
लेकिन यह प्रश्न ही क्यों?
क्योंकि मृत्यु का भय है। इससे इंकार नही किया जा सकता!
लेकिन यदि भय की स्थिति है तो #अभय भी तो है। भय का निषेध तो है।
तब निश्चित रूप से मृत्यु का निषेध भी होगा।
असत है तो सत भी होगा। न होना है तो होना भी होगा।
वहाँ कल शव जड़वत पड़ा हुवा है तो उसका निषेध चैतन्यता भी अवश्य होगी।।
लेकिन मेरे शव हो जाने के बाद फिर सत, उस चित उस भय का निषेध #आनन्द किसको प्राप्त होगा?
चलिए किसको प्राप्त होगा यह प्रश्न हटा देते है यही कर देते है कि एक ऐसा तत्व ही है जो स्वयं सत चित आनंद है।।
तज्जलाल!!
अहम ब्रम्हास्मि!!!
अयमात्मा ब्रह्म!!!!
दरअसल आत्मा मृत्यु और उससे उत्तपन्न पीड़ा का मानसिक निषेध है और कुछ नही!
असहमत है?
तो ठीक है फिर मुझे "शरीर में आत्मा रहती है'
"अहंकार और देह का तादात्म्य होता है"
"आत्मा का कभी नाश नही होता" आदि वाक्यों का अर्थ समझा दीजिए लेकिन हाँ मुझे आपसे रूपक नही सुनने क्योंकि एक दिन जब मेरी 3 साल की बेटी मेरी यह बात सुनकर की "लाइट चली गई" यह पूछेगी की पापा लाइट कहाँ रहती है तो मैं मैं उसे रूपकों से ही समझाऊंगा लेकिन वह रूपक एलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म, इलेक्ट्रॉन फ्लो, इंडक्शन और सर्किट आदि प्रत्ययों से दूर दूर तक जुड़े नही होंगे।
बावजूद इसके मुझे वेदांत में विश्वाश करना है वरना मृत्यु का भय वही मुमुक्क्षत्व मुझे पागल कर देगा।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
फिर से प्रवचन सुनने जा रहा हूँ।।।
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जहां तक मुझे लगा सारा प्रवचन इस एक शब्द के ही इर्द गिर्द घूमता रहा। हालांकि प्रवचन का उद्देश्य मृत्यु के भय को दूर करना है।
मृत्यु होनी है और मनुष्य की विडम्बना यह है कि वह इस बात को जनता है कि मृत्यु होनी है।
एक अंतहीन अंधकार-आज मैं हूँ कल नही रहूंगा-काल निगल जाएगा इसको जिसे मैं दर्पण में देखता हूँ, किसका पिता और किसका पुत्र?
सारी चेत्तना पता नही कहाँ विलीन हो जाएगी।
कुछ नही बचेगा जब बिखर जाएंगे पंचतत्व अपने पीछे क्षणिक भाव छोड़कर!!
ओह! इस भय से बाहर निकलना है। इस भय पर कैसे जीत हासिल करे?
चलो द्वैत में सोचते है:
जाति है तो मृत्यु भी है। अस्तित्व है तो अनस्तित्वव भी है। चेतना है तो जड़ता भी है।
असल क्या है?
जाति या मरण?
लेकिन यह प्रश्न ही क्यों?
क्योंकि मृत्यु का भय है। इससे इंकार नही किया जा सकता!
लेकिन यदि भय की स्थिति है तो #अभय भी तो है। भय का निषेध तो है।
तब निश्चित रूप से मृत्यु का निषेध भी होगा।
असत है तो सत भी होगा। न होना है तो होना भी होगा।
वहाँ कल शव जड़वत पड़ा हुवा है तो उसका निषेध चैतन्यता भी अवश्य होगी।।
लेकिन मेरे शव हो जाने के बाद फिर सत, उस चित उस भय का निषेध #आनन्द किसको प्राप्त होगा?
चलिए किसको प्राप्त होगा यह प्रश्न हटा देते है यही कर देते है कि एक ऐसा तत्व ही है जो स्वयं सत चित आनंद है।।
तज्जलाल!!
अहम ब्रम्हास्मि!!!
अयमात्मा ब्रह्म!!!!
दरअसल आत्मा मृत्यु और उससे उत्तपन्न पीड़ा का मानसिक निषेध है और कुछ नही!
असहमत है?
तो ठीक है फिर मुझे "शरीर में आत्मा रहती है'
"अहंकार और देह का तादात्म्य होता है"
"आत्मा का कभी नाश नही होता" आदि वाक्यों का अर्थ समझा दीजिए लेकिन हाँ मुझे आपसे रूपक नही सुनने क्योंकि एक दिन जब मेरी 3 साल की बेटी मेरी यह बात सुनकर की "लाइट चली गई" यह पूछेगी की पापा लाइट कहाँ रहती है तो मैं मैं उसे रूपकों से ही समझाऊंगा लेकिन वह रूपक एलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म, इलेक्ट्रॉन फ्लो, इंडक्शन और सर्किट आदि प्रत्ययों से दूर दूर तक जुड़े नही होंगे।
बावजूद इसके मुझे वेदांत में विश्वाश करना है वरना मृत्यु का भय वही मुमुक्क्षत्व मुझे पागल कर देगा।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
फिर से प्रवचन सुनने जा रहा हूँ।।।
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