यह ब्रह्मांड क्यों है?
जब हम यह प्रश्न करते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? मेरे सामने यह पुस्तक क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक के माध्ययम से मेरा एक प्रयोजन सिद्ध होना है। ब्रह्मांड के विषय मे जब हम क्यो का प्रश्न करते हैं तो हम अचेतन रूप से इस बात को मान रहे होते हैं कि ब्रह्मांड का प्रयोजन है लेकिन क्या हो यदि सत्य यह हो कि ब्रह्मांड का कोई प्रयोजन ही न हो और इस प्रकार ब्रह्मांड क्यों एक निरथर्क प्रश्न हो।
ब्रहांड बस हो जैसा बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं। विश्व मे कोई प्रयोजनवत्ता नही हो और यह मात्र यांत्रिकता के नियम और सिद्धान्त से संचालित होता हो?
भौतिकी के आधुनिक सिद्धान्त हमे बताते हैं कि जगत में कोई प्रयोजन नही है। यह उस घड़ी की तरह है जिसका कोई न तो घड़ीसाज है न किसी के लिए ही यह निर्मित है: यह बस है,इसके पुर्जे आपस मे एक दूसरे से जुड़े हुए 14 खरब वर्षो से अनन्त(?) काल तक टिक-टिक-टिक-टिक।
हमारी बुद्धि यह आसानी से मान लेती है कि ईश्वर अपना स्वयम का कारण हो सकता है लेकिन जगत में प्रयोजन देखने को हम इतने अभ्यस्त हैं कि जगत भी स्वयम्भू हो सकता है यह बात हमे अटपटी लगती है लेकिन ऐसा क्यों नही हो सकता?
जगत अपने आप से अपनी रचना क्यो नही कर सकता? जगत अपने एकत्व से ही अपने अंदर के नानात्व को क्यो नही रच सकता?
मुझे पता है कि यदि इस चिंतन को थोड़ा और आगे ले जाऊं तो मुझे स्पिनोजा का ईश्वर मिल जाएगा अतः यहीं विराम क्योकि स्पिनोज़ा का ईश्वर प्रकृति के लिए बहुत हद तक भवाश्रित एक दूसरा शब्द है।
जब हम यह प्रश्न करते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? मेरे सामने यह पुस्तक क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक के माध्ययम से मेरा एक प्रयोजन सिद्ध होना है। ब्रह्मांड के विषय मे जब हम क्यो का प्रश्न करते हैं तो हम अचेतन रूप से इस बात को मान रहे होते हैं कि ब्रह्मांड का प्रयोजन है लेकिन क्या हो यदि सत्य यह हो कि ब्रह्मांड का कोई प्रयोजन ही न हो और इस प्रकार ब्रह्मांड क्यों एक निरथर्क प्रश्न हो।
ब्रहांड बस हो जैसा बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं। विश्व मे कोई प्रयोजनवत्ता नही हो और यह मात्र यांत्रिकता के नियम और सिद्धान्त से संचालित होता हो?
भौतिकी के आधुनिक सिद्धान्त हमे बताते हैं कि जगत में कोई प्रयोजन नही है। यह उस घड़ी की तरह है जिसका कोई न तो घड़ीसाज है न किसी के लिए ही यह निर्मित है: यह बस है,इसके पुर्जे आपस मे एक दूसरे से जुड़े हुए 14 खरब वर्षो से अनन्त(?) काल तक टिक-टिक-टिक-टिक।
हमारी बुद्धि यह आसानी से मान लेती है कि ईश्वर अपना स्वयम का कारण हो सकता है लेकिन जगत में प्रयोजन देखने को हम इतने अभ्यस्त हैं कि जगत भी स्वयम्भू हो सकता है यह बात हमे अटपटी लगती है लेकिन ऐसा क्यों नही हो सकता?
जगत अपने आप से अपनी रचना क्यो नही कर सकता? जगत अपने एकत्व से ही अपने अंदर के नानात्व को क्यो नही रच सकता?
मुझे पता है कि यदि इस चिंतन को थोड़ा और आगे ले जाऊं तो मुझे स्पिनोजा का ईश्वर मिल जाएगा अतः यहीं विराम क्योकि स्पिनोज़ा का ईश्वर प्रकृति के लिए बहुत हद तक भवाश्रित एक दूसरा शब्द है।
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