Sunday, August 8, 2021

यथार्थ

जीवित रहने या जीवित होना किसी एक भाववाचकता के साथ उपस्थित पद नही है, यह एक पूरा स्पेक्ट्रम है जिसमे विभिन्न प्रकार के "जीवित रहने या होने" की घटनाएं है जो आपस मे समान होते हुए भी गुणात्मक रूप से भिन्न हैं।
बुद्धि का काम है कि वह इन्द्रिय प्रदत्तो (सेंस डाटा) पर क्रियाशील होकर जीव को व्यष्टि रूप और समष्टि रूप से जीवित रखे तथा गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ 'जीवित होने' की ओर जीव को ले जाए किन्तु इसके लिए बुद्धि को अलग अलग प्रयोग करने की स्वतन्त्रा चाहिए होगी जो प्रकृति ने उसे दिया--जादू, मिथक, मेटाफिजिक्स, विज्ञान बुद्धि के उन्ही प्रयोगों की स्वतंत्रता में 'गुणात्मक जीवन" के निमित्त ही जन्मे हैं: इन समस्त प्रयोगों में विज्ञान सबसे सफल है।
हमे मिथक, तत्त्वमीमांसा और विज्ञान को इस दृष्टि से देखनी चाहिए वनिस्पत इसके की इनमें से कौन जगत की वास्तविक तस्वीर देता है क्योकि सम्भव है वास्तविक जैसा कुछ होता ही न हो और यह शब्द स्वयम बुद्धि के प्रयोग की स्वंत्रता के कारण उसके कुछ प्रयोगों के लिए उसके द्वारा रचित एक तदर्थ प्रत्यय या कॉन्सेप्ट हो।

भौतिकी की क्लासिकल कॉग्निशन से परे इसकी क्वांटम कॉग्निशन बुद्धि की द्वितीय स्तर की कोटियों के आधार पर क्वांटम-प्रदत्तो को एक कोहरेन्ट, सामंजस्यपूर्ण तंत्र में सजाना है।
संभव है तीसरे स्तर पर हमें कुछ मेटा-क्वांटम डेटा मिलें जिनकी व्याख्या के लिए यह बुद्धि की द्वितीय स्तर की कोटिया भी नाकाफी हों।
पुनः यह मेंखला कब तक और कहाँ तक जानी है यह हम नही जानते।
"यथार्थ" कोई वस्तुनिष्ठ वस्तु या सत्ता नही है  बल्कि यह हमारे संज्ञान में आए आए विषय-वस्तु को एक कोहरेन्ट रूप में सजाना है। हमारे संज्ञान के विषय-वस्तु के कारण क्या हैं अथवा उस अज्ञात पर बुद्धि की कार्य-कारण कोटि लागू हो भी सकती है हम यह कभी नही जान सकते: हमारे पास कोई तरीका ही नही है, हम मात्र और मात्र अपने अनुभव में गोते लगा सकते हैं; हर बार और अधिक गहराई में उतर सकते हैं।

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