Friday, December 6, 2019

धर्म के निरसन की सम्भाव्यता:

धर्म की उत्पत्ति के साथ ही धर्म की प्रसांगिकता पर प्रश्न किया जाने लगा और इसके निरसन का प्रयत्न प्रारंभ हो गया,  अतः धर्म के निरसन की संभाव्यता प्रश्न का उत्तर मानवीय इसिहास में धर्म की स्थिति के आधार पर दिया जा सकता है।
ऐतिहिसिक परिदृश्य में धर्म का निषेध अ-धर्म नही बल्कि एक नया धर्म रहा है जो पुराने सार और उसके अस्तित्विकरण की प्रक्रिया को एक नए सार एवम अस्तित्विकरण की नवीन प्रकिया से प्रतिस्थापित कर देता है। जाहिलियत का तौहीद से तथा ओलोम्पियन धर्म का ईसाईयत से प्रतिस्थापन्न इसके कुछेक उदाहरण हैं। 
यदि जीवन और जगत के बारे में वस्तुगत तथ्य निःसारता ही है तो फिर इस केयोस और अराजकता में किसी भी वाद, किसी भी प्रश्न की उपादेयता क्या है? विचारको के उपरोक्त प्रश्न और विश्लेषण उनके अपने ही जगत की व्याख्या में, जहाँ केयोस और अराजकता है, किस तरह संगतिपूर्ण है, क्योंकि इन विचारको ने धर्म की उक्त आलोचना के बावजूद जीवन के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया है।
धर्म की परम्परागत परिभाषाओं  में मौजूद यदि कुछेक शर्ते हटा दी जायँ तो नास्तिकता भी धर्म की परिधि में आ जाती है और इन शर्तों को ढीला करके ही दार्शनिक और विचारक "मानववाद" को धर्म की श्रेणी में डाल पाते हैं। मानववाद, जो परम्परागत धर्मो का नवीनतम प्रतिस्थापन है। यही नही कुछ विचारक दबे शब्दों में मार्क्सवाद को भी इस आधार पर धर्म सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। 
रिक्तता और पीड़ा मनुष्य के जीवन का अनिवार्य तत्व है क्योंकि यदि जगत निरुद्देश्य, निरर्थक और अराजक है तब भी मनुष्य के जीवन में रिक्तता है, और यदि जगत उद्देश्यपूर्ण और सार्थक है तब भी जब तक वह अपने अर्थ को प्राप्त नही कर लेता उसके अस्तित्व में रिक्तता है।
धर्म इन दोनों ही स्थितियों में उतपन्न रिक्तता को भरने की  मानवीय अन्तःप्रवृति है जो मानवीय अस्तित्व में व्याप्त विशिष्ट चेतना और विशिष्ट पीड़ा के साथ ही अविर्भूत हुई है।
रोडनी स्टार्क एवम डब्लू सिम्स वेनब्रिज अपनी पुस्तक “द फ्यूचर ऑफ रिलीजन” में लिखते हैं, “धर्म वह मानवीय गठन है जिसके माध्ययम से मानव मूलतया अतिप्रकृतिक मान्यता के द्वारा जीवन एवम जगत में अभाव की सम्पूर्ति करने में प्रयत्नशील है।“
अर्थात जब तक मानव में पीड़ा, अभाव और रिक्तता है, धर्म की उपस्थिति एक यथार्थ है।

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