मेरे मार्क्सवाद पर कुछ आक्षेप हैं। इनका खंडन किया जाय:
■ मार्क्सवाद स्वयम को विज्ञान कहता है किंतु यह विज्ञान नही है। अभी सर्वमान्य पॉपर के विज्ञान का फॉलसिफिकेशन निकष मार्क्सवाद को छद्मविज्ञान की कटेगरी में डाल देता है।
■ विज्ञान फॉलिबलिज़्म में विश्वाश करता है, इसका कोई भी सामान्यीकरण सत्य नही बल्कि प्रोबेबल होता है। मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद द्वारा वाद और प्रतिवाद से होकर इतिहास को साम्यवाद में ले जाते हैं और कम से कम इस कथन को निरपेक्ष स्वीकार करते हैं। चुकी विज्ञान में कोई नियम कोई सामान्यीकरण निरपेक्ष नही होता अतः साम्यवाद भी धर्मो के "एक निरपेक्ष" के दोष से पीड़ित है।
■ कोई भी दर्शन, विचार तत्कालीन चेतना की उपज होता है। भौतिकवाद ही आज ध्वस्त हो चुकी है। तत्वमीमांसिय चिंतन के लिए हमे नए कोटियों की सहायता लेनी पड़ती है। मार्क्सवाद में किसी काल विशेष में प्रचलित जगत की "तत्वमीमांसिय वस्तुवादी" तस्वीर इम्प्लाइड है जबकि आज भौतिकी में ही जगत ही वह पुरानी तत्वमीमांसिय वस्तुवादी तस्वीर स्वीकार नही की जाती और उसके जगह चेतना केंद्रित वस्तुवाद या व्यवहारिक वस्तुवाद स्वीकार किया जाने लगा है। इस नए वस्तुवाद से मार्क्सवाद की संगति नही है अतः मार्क्सवाद की जगत विषयक समझ मे हेगेल की भांति एक ब्लॉक्ड यूनिवर्स उभरता है।
■ समकालीन चिंतन पद्धति में भी विज्ञान के इतनी तरक्की के बावजूद जगह जगह पर अतीन्द्रिय फेनोमेना उभरकर सामने आने लगता है। रॉबर्ट लाँजा जैसे वैज्ञानिक जगत की भौतिकीकेन्द्रित व्याख्या की जगह इसकी जीवनकेन्द्रित या चेतनकेन्द्रित व्याख्या करने के एक नए पैराडाइम की वकालत करते है। मार्क्सवाद इस नए पैराडाइम के साथ कभी कॉम्पिटेबल हो ही नही सकता क्योंकि वह चेतना को भूत का प्रतिवाद मानता है।
■ आधुनिक मनोवैज्ञानिक भले ही दबे मन से लेकिन यह स्वीकार करने लगे हैं कि हमारे मस्तिष्क में न्यूरॉन्स इस तरह से तारबद्ध हैं कि धर्म की चेतना किसी काल विशेष की परिणाम न होकर हमारे मस्तिष्क और न्यूरानो में आवश्यक रूप से गूंथा हुवा है। हम इसके बाहर नही जा सकते और यदि बाहर जाते हैं तो एक विखंडित मनुष्य अस्तित्व में आता है।
हमे अफीम खाना ही पड़ेगा। अतः मार्क्सवाद की धर्म की आलोचना सुसंगत नही है।
विज्ञान की अपनी पूर्वमान्यताएँ, अपने अजम्प्शन हैं जिनको विज्ञान मान लेना विज्ञान को एक डोग्मा में एक रूढ़ि में तब्दील कर देता है। भौतिकवाद विज्ञान की पूर्वमान्यता है, स्वयम में विज्ञान नही।
अंततः विज्ञान भी कुछ ऐसे विश्वासों पर आधारित आधारित है जिसे न तो सत्य और न ही असत्य सिद्ध किया जा सकता है। तदर्थ आधार पर हम उसे स्वीकार करते हैं क्योंकि उन अजम्प्शन की पृष्ठभूमि में किए गए क्रियाकलाप व्यवहारिक परिणाम देते हैं और प्रेक्षण में कम से कम अनामोली मिलती है जिसके लिए अन्य अतिरिक्त अजम्प्शन बनाने नही होते।
विज्ञान को अपने अंदर के इस विरोधाभास का आभास है इसलिए वैज्ञानिक कभी किसी निरपेक्ष सत्य की बात नही करते। विज्ञान वृत में सत्य का क्रियात्मक निकष या फंक्शनल कॉन्सेप्सपन ऑफ ट्रुथ इसिलए ज्यादा मान्य है। अनमोलीज़ कि अधिकता होने पर विज्ञान अपने पैराडाइम बदलने से नही हिचकता और अब अपने अज़्मप्शन्स मे भी विज्ञान द्वारा बदलाव किया जाता है। टॉमस खुन इस अवस्था को क्रांतिकारी विज्ञान कहते है जो पैराडाइम शिफ्ट के पूर्व के नॉर्मल साइंस से इस मायने में अलग होता है कि नॉर्मल साइंस एक पज़ल या पहेली हल करने वाली क्रियाकलाप होती है जबकि इस क्रांतिकारी विज्ञान की अवस्था मे पुरानी पहेलियां बेमानी हो जाती हैं और नए पैराडाइम की पृष्ठभूमि में नई पहेलियां उभरती हैं।
मार्क्सवाद जो स्वयम को वैज्ञानिक कहता है वह विज्ञान के इस चरित्र की या तो अनदेखी कर देता है या विज्ञान का यह चरित्र उसके एजेंडा को सूट नही करने के कारण कई बार इसे दबाने का भी प्रयास करता है:
-यू एस एस आर में राजनीतिक रूप से लैमारकीज़म को डार्विनिज़्म के ऊपर तरजीह दी गई क्योंकि लैमारकीज़म साम्यवादी एजेंडे को ज्यादा सूट करता था।
-स्टीफेन हॉकिंग लिखते हैं कि उनके और पेनरोज़ के1970 के थीसिस का रसियन लोगो ने विरोध किया था क्योंकि उनकी थीसिस मार्क्सवाद के वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म के विरुद्ध जा रही थी।
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