मस्तिष्क विकसित हुवा,
तदनुरूप चेतना विस्तृत हुई,
अब आत्मा में बुद्धि, भावना, संकल्प तीनो थे।
बुद्धि ने प्रश्न किया,
भावना ने उत्तर दिया और सामने ईष्वर खड़ा था।
भावना ने प्रश्न किया और बुद्धि घबरा गई और बस अज्ञेय पद तक ही पहुंच पाई।
ईश्वर वाणी के लिए गूंगे का गुड़ था।
बस अपना स्वाद।
वैखरी से अव्यक्त।
लेकिन गुड़ के लिए संकल्प आवश्यक है।
अपना प्रश्न,
अपना संकल्प ही दे सकता है,
उत्तर।
उद्दरेद्धात्मानः!!!!
तदनुरूप चेतना विस्तृत हुई,
अब आत्मा में बुद्धि, भावना, संकल्प तीनो थे।
बुद्धि ने प्रश्न किया,
भावना ने उत्तर दिया और सामने ईष्वर खड़ा था।
भावना ने प्रश्न किया और बुद्धि घबरा गई और बस अज्ञेय पद तक ही पहुंच पाई।
ईश्वर वाणी के लिए गूंगे का गुड़ था।
बस अपना स्वाद।
वैखरी से अव्यक्त।
लेकिन गुड़ के लिए संकल्प आवश्यक है।
अपना प्रश्न,
अपना संकल्प ही दे सकता है,
उत्तर।
उद्दरेद्धात्मानः!!!!
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