Wednesday, December 4, 2019

माईलेशियन लिगेसी (ख)



प्रायः विचारों का एकाकीपन बौद्धिकता को कुंठित कर देता है। विचार चाहे कितने भी पवित्र क्यों न हो उन पर पुनर्विचार आवश्यक है। श्रद्धा आवश्यक है किंतु गुरु-शिष्य की वह परम्परा ज्यादा फलित है जिसमे शिष्य गुरु के विचारों को आँखें बंद कर आत्मसात नही कर लेता। पश्चिम में विचारों के सम्बंध में यह स्वतंत्रता भी माईलेशियन थाती है जिसके अंतर्गत इस नए चिंतन पद्धति में शिष्य का कार्य  गुरु के विचारों के प्रति आस्थावान होकर महज उसका प्रसार नही था बल्कि शिष्यत्व में गुरु के विचारों की समीक्षा और आलोचना भी शामिल थी। इस परंपरा में यदि शिष्य को लगा कि पूर्व के सिद्धान्त में त्रुटि है तो वह इसे सुधार ही नही सकता था बल्कि इसे छोड़ने को वह स्वतंत्र था।
विज्ञान की यही खूबसूरती होती है कि इसमें विचार न तो इतने नाजुक होते हैं कि वह समीक्षा के आगे न ठहर सकें और न ही इतने पवित्र की उन पर पुनर्विचार नही किया जा सकता और उन पर बार-बार प्रश्न न किया जाय।
यद्यपि माईलेशियन विचारकों के प्रश्न यही थे कि जगत का अंतिम तत्व क्या है तथापि अनैक्ज़िमेंडर ने इसका जवाब अपने गुरु थेलस से हट कर दिया और यही नही इस प्रश्न के जवाब में अनएक्सीमेनिज ने भी अपने गुरु अनैक्ज़िमेंडर की बात नही दुहराई।
थेलस ने इस प्रश्न का उत्तर जल के द्वारा दिया था।
अनैक्ज़िमेंडर  जल, अग्नि, पवन में से किसी को मूल तत्व स्वीकारने के पक्ष में नही थे। उनका कहना था कि यदि इन तत्वो में से किसी एक को मूल तत्व स्वीकार कर लिया जाय तो अन्य तत्वो में निहित विरोधी गुणों की व्याख्या नही हो सकती।
अतः इन्होंने एक ऐसे तत्व की कल्पना की अपरिमित, नित्य, अनिश्चित तथा अष्पष्ट है। इस तत्व को उन्होंने एपेइरॉन ( apeiron) कहा।

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