Wednesday, December 4, 2019

दर्शन का एक कार्य यह भी होना चाहिए

विज्ञान  विजित क्षेत्र है; इसकी हद में वह सुरक्षित क्षेत्र हैं जिसमे ज्ञान और कला हमारे अद्भुत जगत का निर्माण करते हैं। लेकिन यात्रा यहीं खत्म नही हो जाती। इस विजित क्षेत्र के आगे और अनिश्चित तथा और भी अधिक रहस्य से भरा क्षेत्र जीते जाने के लिए उपलब्ध होता है। दर्शन यहाँ परिकल्पनाओं और विमर्शात्मक चिंतन द्वारा पथ-प्रदर्शक बनने का प्रयास करता है।
ध्यातव्य है कि इस विंदु पर कल्पना की कोई एक दिशा नही होती, कल्पना यहाँ हर दिशा में उड़ान लेती है। चिंतन की पद्धति में एक नया पैराडाइम भी उपस्थित हो सकता है और विज्ञान आगे बढ़ता है।
इन सबो के बीच एक समस्या उतपन्न होती है: विज्ञान द्वारा पुष्ट उन एक या अनेक दार्शनिक परिकल्पनाओं के अलावा शेष परिकल्पनाओं को भी मोह/रूढ़ि/वश मानव नकार नही पाता और उन्हें जीवित रखने के लिए जाने-अनजाने छद्म विज्ञान की रचना करता है। यहाँ दुर्भाग्य से  ज्ञान-से दिखनेवाले ऐसे तन्त्रो का एक समूह भी विकसित किया जाता है जिनका वास्तव में कोई मोल नही, ये मात्र अपव्यय हैं।

दर्शन का काम छद्मविज्ञानो को नष्ट करने के  साथ साथ  इन बन्ध्या परिकल्पनाओं और विचार पद्धतियों को भी नष्ट करना  होना चाहिए।

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