मुफ्त का जहर
एकबार ईश्वर को धरती पर अमृत और विष के स्टॉल लगाने की सनक सवार हुई। ईश्वर ने शर्ट पेंट पहना, एक रजिस्टर लिया, आंखों पर चश्मा चढ़ाया और "अमृत पांच रुपए में एक पैकेट" का बोर्ड लगा कर स्टॉल पर बैठ गया।
दूसरे विष वाले स्टॉल के लिए उसने अपने को एक दूसरे भाग में विभक्त किया, उसे भी शर्ट पेंट पहनाया, रजिस्टर थमाया, चश्मा लगाया और "विष बिल्कुल मुफ्त" के बोर्ड के साथ विष वाले स्टॉल पर बैठा दिया।
विष वाले स्टॉल पर लोगों की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई। लोग मुफ्त में विष ले जाने लगे और ईश्वर उनका नाम रजिस्टर में लिखता, उनसे दस्तखत, ठेपा लगवाता और विष की पोटली दे देता। तभी बवाल हो गया। ईश्वर ने देखा लोग विष लेने वाली लाईन में कौन आगे था और कौन पीछे इसके लिए लड़ने लगे थे। खैर किसी तरह ईश्वर ने उनको शांत कराया तभी उसने देखा कि यह आदमी तो दुबारा विष लेने आया है। ईश्वर ने उससे कहा कि दुबारा विष नही मिलेगा तो उस आदमी ने चीखते हुए कहा कि बाकी बीस तीस लोगो को फिर दुबारा विष क्यो दे दिया गया?
ईश्वर परेशान की ये लोग दुबारा भी विष ले रहे हैं--कंट्रोल करना होगा और उसने उस आदमी से कहा कि उसे दुबारा विष बिल्कुल नही मिलेगा। इतना सुनना था कि उस आदमी ने विधायक जी को फोन मिलाते हुए कहा कि लीजिए तब विधायक जी से बात करिए। विधायक जी फोन पर ईश्वर को धमकाते हुए बोले कि इसे विष की पोटली मिल जानी चाहिए, यह मेरा आदमी है वरना....!
ईश्वर ने उस आदमी को दूसरी पोटली दे दी तभी एक सफेद शर्ट पेंट और सफेद बिना लेस वाले जूते में एक आदमी आया और उसने एक अन्य दूसरे आदमी को विष की दो पोटलिया देने को कहा। ईश्वर ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो वह लोकल नेता था। ईश्वर ने उसकी बात भी रख ली और उसके आदमी को भी एक्स्ट्रा विष की पोटली दे दी। दोनों चले गए। तभी ईश्वर ने पुनः दिव्य दृष्टि से देखा कि कोने में ले जाकर वह लोकल नेता उस आदमी की दूसरी पोटली में से अपने कमीशन का विष मांग रहा था।
विष की पोटलियो का स्टॉक खत्म हो गया लेकिन अभी बहुत ज्यादा लोगो की भीड़ थी और जब लोगो ने सुना कि विष की पोटली खत्म हो गई तो मारे गुस्सा के भीड़ ने विष वाली स्टॉल को उलाट दिया। ईश्वर का शर्ट फाड़ दिया, उसका चश्मा तोड़ दिया और रजिस्टर छीन लिया। ईश्वर वहां से किसी तरह जान बचा कर भागा हालांकि उसको तब तक दस बीस घुसा लग चुका था।
वह स्टॉल जहां "अमृत पांच रुपए में एक पोटली" लिखा हुआ था उसके इर्द-गिर्द तब तक कोई गया ही नही था-आखिर पांच रुपए में अमृत कौन खरीदे और अमर हो, मुफ्त का जहर ही ठीक है भले उससे मौत हो जाएगी।