Wednesday, December 4, 2019

कुंडलिनी जागरण!

सम्भव है जब तक ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैत बना रहे यह अविद्या है। अविद्या के नष्ट होने पर यह द्वैत तिरोहित हो जाता हो।
हमारा ज्ञान हमारे जीवन, हमारी प्रजाति के जीवन के बने रहने की प्रवृत्ति से कंडिशन्ड है।
पता नही हम इस कंडिशनिग को तोड़ सकते हैं या नही, शायद तोड़ सकते हों, शायद मिनिमाइज कर सकते हों और वही समाधि की अवस्था हो और तब जो ज्ञान होगा, जो प्रज्ञा जागेगी वह न्यूनतम प्रतिबंधित, न्यूनतम कंडिशन्ड हो।
इस प्रज्ञा में सम्भव है कि जगत का नानात्व, ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैत मिट जाता हो और इस दृष्टि में परमार्थ दिखता हो जिसमें "अयमात्मा ब्रह्म"और इस बोध को प्राप्त व्यक्ति फिर तो व्यवहार में यही कहेगा: नेति, नेति!

शायद वह प्रकिया विकास को उलट कर, जीवन के पहले को महसूस करने की है तभी यह कंडिशनिग जाएगी।
एक प्रयोग किया, मष्तिष्क को विचार शून्य करने का प्रयास किया। यदि यह अवस्था पा लेता हूँ तो विकास को पीछे ले जाकर उस अवस्था के बोध में शायद पहुंच जाऊंगा जब विचार नही हैं, केवल सम्वेदनाएँ है: एक जानवर के मस्तिष्क की अवस्था (जानवर हमसे कम कंडिशन्ड हैं)। फिर और पीछे, फिर और पीछे ●●●●और तब शायद समाधि।

कुंडलिनी जगाने का मतलब कहीं जीवन जिस प्रारंभिक कंडीशन से शर्तबद्ध है उसको भी सचेतन पार कर जाना तो नही?

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