लालबेगी
यह इतिहास की, नहीं नहीं समाज की, नही धर्म की ,नहीं------- - रहने दीजिए क्या फर्क पड़ता है कि किसकी विडम्बना रही है लेकिन गुड्डू लालबेगी मुजाविर और उसका भाई मंगल राम मंदिर बने या बबरी मस्जिद की दुबारा तामीर हो, इस प्रश्न पर कंफ्यूज हो जाते हैं।
तो क्या ये दोनों अपनी रिलिजियस आइडेंटिटी को लेकर कंफ्यूज हैं?
मंगल अपनी दुकान खोलते ही सबसे पहले काली माता को अगरबत्ती दिखाता है और गुड्डू एक मुजाविर है। मुजाविर अर्थात मजार की देख रेख करने वाला। दिन में गुड्डू लालबेगी एक सरकारी अस्पताल में मेस्तर है और अस्पताल से लौटने के बाद मुजाविर। तब तक मंगल की दुकान भी बंद हो जाती है और शाम को वह अपने बड़े भाई के साथ मजार पर जाता है । मजार की साफ सफाई करता है और गुड्डू की मदद करता है।
यहां गंगा के किनारे लगभग 3-4 किमी के दायरे में बबूल की झाड़ियां फैली है जिसके कारण लोग इस जगह को बबुराही कहते हैं।
इसी बबुराही में तीन मजार है और इन तीनो मजारो के बीच एक मस्जिद जिसका नाम जिन्नाती मस्ज़िद है। मस्ज़िद के बाएं जो दो मज़ार है उनका मुजाविर गुड्डू है और मस्ज़िद के दाएं वाली मज़ार का मुजाविर परवेज जमाल।
एक दिन यु ही परवेज जमाल से मुलाकात हो गई तो मैंने उनसे अनायास ही पूछ लिया की मुजीवीर जी यह किनके मज़ार हैं?
परवेज़ जमाल का जवाब सुनकर मैं चौक गया।
'वह असली जिन्न का मज़ार है जहाँ का मुजाविर मैं हूँ लेकिन वो बुतपरस्त का जना काफीर उन मजारो को जिन्न का मज़ार कहता है जहाँ वह बैठता है।'
मैं इसलिए नहीं चौका की ये जिन्न के मज़ार है मैं इस लिए चौका की गुड्डू बुतपरस्त का जना है।
-एक बुतपरस्त का जना मुजाविर?
-हाँ साला मेस्तर है।
-तो क्या गुड्डू मुसलमान नहीं है, मैंने पूछा।
-अरे नहीं दोगला है, दोगला।
-मतलब?
-अब रहने दीजिए कभी बाद में बताऊंगा।
-अरे बता भी दीजिए
-गुड्डू लालबेगी है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी, बहाई तो सुना था लेकिन लालबेगी पहली बार सुन रहा था। यह लालबेगी कौन सा नया धर्म पैदा हो गया?
मैंने फैसला किया कि गुड्डु से ही पूछूँगा।
गुड्डु से चुकी नज़दीकी बढ़ानी थी अतः मैंने मज़ार पर जाना शुरू कर दिया। कभी उर्स में चंदा दिया तो कभी अपने आप को गुडु से झड़वाया तो कभी वहाँ खीचड़ा खाया । धीरे धीरे गुडु से मेरी पहचान हो गयी। एक दिन मैं गुडु के साथ नौ बजे तक मज़ार पर बैठा रहा। नौ बजे के बाद सब कुछ समेट कर जब गुडु जाने लगा तो मैं भी उसके साथ हो लिया। रास्ते में मैंने गुडु से पूछा गुड्डु भाई ये लालबेगी क्या होते हैं?
गुडु ने कहा कि आदमी होते हैं
मैंने कहा भाई आप समझे नहीं मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आप हिन्दू है या मुसलमान?
गुड्डु हंसने लगा फिर उसने मुझसे ही पुछा की इंसान का हिन्दू या मुसलमान होना ज़रूरी है क्या?
अब मुझे खीज हो रही था, जिसे शायद उसने पढ़ लिया और मुझसे बोला,
'भाई हम लालबेगी एक तरह से हिन्दू भी होते है और मुसलमान भी और दूसरी तरह से ना हिन्दू होते हैं न मुसलमान ही।'
'देखिए भाई हम मस्जिद भी जाते हैं और मंदिर भी। हम ईद भी मानते है और होली भी।
हमारा खतना नहीं होता, लेकिन हम दफनाए जाते हैं। जन्म होने पर हमारी छठिहारी भी नहीं होती, मरने पर चालीसा भी नहीं होता।'
अब चाहे यह जिसकी भी विडम्बना रही हो हुवा यूँ की जब इस्लाम का इस शहर में प्रचार हो रहा था तो गुडु के पुरखे जो मैला ढोते थे उन्होंने इस्लाम में अपनी मुक्ति देखी। उन्होंने इस्लाम अपना लिया लेकिन चुकी यहाँ 'अशराफ',संभ्रांत मुसलमान थे, अतः इस्लाम ने उन्हें नहीं अपनाया और हिंदुओं ने तो इनको बेदख़ल कर ही दिया था।
अब ये ना हिन्दू थे न मुसलमान लेकिन चुकी ये हिन्दू और मुसलमान के पाखाना ढोते थे, उनके रहमो करम पर जीना था इसलिए इन्हें कभी हिन्दू बनना पड़ता था तो कभी मुसलमान।
जिन्नाती मस्जिद को बने लगभग 400 साल बीत चुके है अतः आज लालबेगियों की चौथी पांचवी पीढ़ी है। यह पीढ़ी अपने आपबीती भूल कर स्वयं को मुस्लमान भी मानती है और हिन्दू भी।
विडम्बना ने लालबेगियों के रूप में "इंसान" को जन्म दे दिया।
हाँ ये अभी भी कन्फ्यूज़ है कि अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए या बबरी मस्ज़िद की दुबारा तामीर हो।
यह इतिहास की, नहीं नहीं समाज की, नही धर्म की ,नहीं------- - रहने दीजिए क्या फर्क पड़ता है कि किसकी विडम्बना रही है लेकिन गुड्डू लालबेगी मुजाविर और उसका भाई मंगल राम मंदिर बने या बबरी मस्जिद की दुबारा तामीर हो, इस प्रश्न पर कंफ्यूज हो जाते हैं।
तो क्या ये दोनों अपनी रिलिजियस आइडेंटिटी को लेकर कंफ्यूज हैं?
मंगल अपनी दुकान खोलते ही सबसे पहले काली माता को अगरबत्ती दिखाता है और गुड्डू एक मुजाविर है। मुजाविर अर्थात मजार की देख रेख करने वाला। दिन में गुड्डू लालबेगी एक सरकारी अस्पताल में मेस्तर है और अस्पताल से लौटने के बाद मुजाविर। तब तक मंगल की दुकान भी बंद हो जाती है और शाम को वह अपने बड़े भाई के साथ मजार पर जाता है । मजार की साफ सफाई करता है और गुड्डू की मदद करता है।
यहां गंगा के किनारे लगभग 3-4 किमी के दायरे में बबूल की झाड़ियां फैली है जिसके कारण लोग इस जगह को बबुराही कहते हैं।
इसी बबुराही में तीन मजार है और इन तीनो मजारो के बीच एक मस्जिद जिसका नाम जिन्नाती मस्ज़िद है। मस्ज़िद के बाएं जो दो मज़ार है उनका मुजाविर गुड्डू है और मस्ज़िद के दाएं वाली मज़ार का मुजाविर परवेज जमाल।
एक दिन यु ही परवेज जमाल से मुलाकात हो गई तो मैंने उनसे अनायास ही पूछ लिया की मुजीवीर जी यह किनके मज़ार हैं?
परवेज़ जमाल का जवाब सुनकर मैं चौक गया।
'वह असली जिन्न का मज़ार है जहाँ का मुजाविर मैं हूँ लेकिन वो बुतपरस्त का जना काफीर उन मजारो को जिन्न का मज़ार कहता है जहाँ वह बैठता है।'
मैं इसलिए नहीं चौका की ये जिन्न के मज़ार है मैं इस लिए चौका की गुड्डू बुतपरस्त का जना है।
-एक बुतपरस्त का जना मुजाविर?
-हाँ साला मेस्तर है।
-तो क्या गुड्डू मुसलमान नहीं है, मैंने पूछा।
-अरे नहीं दोगला है, दोगला।
-मतलब?
-अब रहने दीजिए कभी बाद में बताऊंगा।
-अरे बता भी दीजिए
-गुड्डू लालबेगी है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी, बहाई तो सुना था लेकिन लालबेगी पहली बार सुन रहा था। यह लालबेगी कौन सा नया धर्म पैदा हो गया?
मैंने फैसला किया कि गुड्डु से ही पूछूँगा।
गुड्डु से चुकी नज़दीकी बढ़ानी थी अतः मैंने मज़ार पर जाना शुरू कर दिया। कभी उर्स में चंदा दिया तो कभी अपने आप को गुडु से झड़वाया तो कभी वहाँ खीचड़ा खाया । धीरे धीरे गुडु से मेरी पहचान हो गयी। एक दिन मैं गुडु के साथ नौ बजे तक मज़ार पर बैठा रहा। नौ बजे के बाद सब कुछ समेट कर जब गुडु जाने लगा तो मैं भी उसके साथ हो लिया। रास्ते में मैंने गुडु से पूछा गुड्डु भाई ये लालबेगी क्या होते हैं?
गुडु ने कहा कि आदमी होते हैं
मैंने कहा भाई आप समझे नहीं मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आप हिन्दू है या मुसलमान?
गुड्डु हंसने लगा फिर उसने मुझसे ही पुछा की इंसान का हिन्दू या मुसलमान होना ज़रूरी है क्या?
अब मुझे खीज हो रही था, जिसे शायद उसने पढ़ लिया और मुझसे बोला,
'भाई हम लालबेगी एक तरह से हिन्दू भी होते है और मुसलमान भी और दूसरी तरह से ना हिन्दू होते हैं न मुसलमान ही।'
'देखिए भाई हम मस्जिद भी जाते हैं और मंदिर भी। हम ईद भी मानते है और होली भी।
हमारा खतना नहीं होता, लेकिन हम दफनाए जाते हैं। जन्म होने पर हमारी छठिहारी भी नहीं होती, मरने पर चालीसा भी नहीं होता।'
अब चाहे यह जिसकी भी विडम्बना रही हो हुवा यूँ की जब इस्लाम का इस शहर में प्रचार हो रहा था तो गुडु के पुरखे जो मैला ढोते थे उन्होंने इस्लाम में अपनी मुक्ति देखी। उन्होंने इस्लाम अपना लिया लेकिन चुकी यहाँ 'अशराफ',संभ्रांत मुसलमान थे, अतः इस्लाम ने उन्हें नहीं अपनाया और हिंदुओं ने तो इनको बेदख़ल कर ही दिया था।
अब ये ना हिन्दू थे न मुसलमान लेकिन चुकी ये हिन्दू और मुसलमान के पाखाना ढोते थे, उनके रहमो करम पर जीना था इसलिए इन्हें कभी हिन्दू बनना पड़ता था तो कभी मुसलमान।
जिन्नाती मस्जिद को बने लगभग 400 साल बीत चुके है अतः आज लालबेगियों की चौथी पांचवी पीढ़ी है। यह पीढ़ी अपने आपबीती भूल कर स्वयं को मुस्लमान भी मानती है और हिन्दू भी।
विडम्बना ने लालबेगियों के रूप में "इंसान" को जन्म दे दिया।
हाँ ये अभी भी कन्फ्यूज़ है कि अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए या बबरी मस्ज़िद की दुबारा तामीर हो।
No comments:
Post a Comment