एक बार सड़क पर एक मदारी जादू दिखा रहा था। मैं उधर से गुजर रहा था तो मैंने सोचा कि देखूं क्या कर रहा है। उसने जो जादू दिखाया वह मैंने पकड़ लिया और चूंकि उसके दर्शक गण में मैं ही थोड़ा अलग था अतः मदारी की निगाह मुझ पर बराबर बनी थी।
उसके जादू को पकड़ कर मैं जादू का भेद बोलने वाला ही था कि मदारी मेरी मंशा को भांपते हुए बोला:
सत्य यही है साहब, एक बित्ता पेट, फिर उसने अपने पेट को बित्ता से नापते हुए कहा: बाकी सब जादू है, सब माया!
मैं माया को भेदते हुए सत्य को जानने के लिए शरमाया था।
और मदारी गा रहा था:
एक पीस मछरी कड़ाही भर झोर
दौड़ दौड़ मांगे समधी लाजो न होय।
उसके जादू को पकड़ कर मैं जादू का भेद बोलने वाला ही था कि मदारी मेरी मंशा को भांपते हुए बोला:
सत्य यही है साहब, एक बित्ता पेट, फिर उसने अपने पेट को बित्ता से नापते हुए कहा: बाकी सब जादू है, सब माया!
मैं माया को भेदते हुए सत्य को जानने के लिए शरमाया था।
और मदारी गा रहा था:
एक पीस मछरी कड़ाही भर झोर
दौड़ दौड़ मांगे समधी लाजो न होय।
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