Wednesday, December 4, 2019

धर्म की उतपत्ति


धर्म  की  उत्पत्ति  पीड़ा  में  होती  है।  मानव  अन्य  प्राणियों  की  तुलना  में  विशिष्ट  है।   इसकी  विशिष्टता  का  कारण  मानवीय  चेतना  ही  नही  बल्कि  इसकी  पीड़ा  भी  है।  मानव  में  जीवन  मे  पीड़ा  के  प्रति  बोध  और  आनंद  का  भाव  मानवीय  पीड़ा  को  एक  सर्वथा  नवीन  सत्तमीमांसीय  कोटि  में  डाल  देता  है।  मानव  के  सन्दर्भ  में  पीड़ा  मात्र  तत्कालिक  उद्दीपन  और  इसके  प्रति  प्रतिक्रिया  न  रहकर  इस  तथ्य  का  भी  अवबोध  है  कि  "दुःख  है"  (सर्वम  दुःखम)।  मनुष्य  इसके  निवारण  हेतु  सर्वप्रथम  पीड़ा  का  कारण  ढूंढता  है  जिसे  वह  अपने  प्रदत  अस्तित्व  में  आधारित  पाता  है:  जब  तक  अस्तित्व  की  बेड़ियां  हैं,  पीड़ा  है।  प्रदत  अस्तित्व  के  निषेध  द्वारा  इसका  शमन  किया  जा  सकता  है।  प्रदत  अस्तित्व  का  निषेध  कैसे  किया  जाय  यह  धर्म  प्रस्तावित  करता  है  और  धर्म-विशेष  की  प्रकृति  के   अनुरूप  तत्वमीमांसीय,  मिथकीय,  प्रतीकात्मक  निषेध  अपनाया  जाता  है।  इन  निषेधों  में  मानव  एक  सत्ता  अथवा  सत्व  रचता  है।  यह  सत्ता  चुकि  जीवन  और  जगत  के  आनुभविक  आयाम  से  इतर  होती  है  अतः  इसको  आनुभविक  जगत  में  स्व  से  सम्बंधित  करने  के  लिए  इसका  मूर्तकरण  किया  जाता  है।  इस  मूर्तकरण  द्वारा  मनुष्य  अपने  स्व  का  पुनर्अस्तित्विकरण  भी  करता  है  जिसमे  न  तो  कोई  पीड़ा  होती  है  न  मृत्यु  क्योंकि  यह पुनर्स्थापित  स्व  जन्म-मरण  के  चक्र  से  मुक्त  होता  है।  धर्म  प्रदत  अस्तित्व  के  निषेध  में  एक  सार  निर्माण  और  इस  सार  को  अपने  आनुभविक  जीवन  जगत  में  संयुक्त  करने  की  सम्मिलित  प्रक्रिया  है।

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