कहा जा सकता है कि संस्कृति विशेष से सम्बंधित होने के कारण धर्म और रिलीजन के भावार्थ में भेद अवश्य है किन्तु यदि इन्हें मानवीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो यह समानार्थी है और इस रूप में इनके अभिप्राय और अवधारणा को किसी भी एक शब्द द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। अतः धर्म धार्यता अथवा बन्धन के रूप में मनुष्य का अपनी आपात स्थिति, यथा अस्तित्वगत पीड़ा, पराधीनता, आपसी संगर्ष, अपनी ससीमता का बोध, के निवारण की प्रक्रिया है। जिस प्रकार की आपात स्थिति होती है मनुष्य उसकी के अनुरूप उपागम, ईश्वर विषयक मान्यता, अपनी अवधारणा आदि का निर्माण करता है। साथ ही धर्म मे कुछ ऐसी मान्यताएं अवश्य उपस्थित होती हैं जिनके प्रति मानव के व्यामोहित होने की संभावना विद्यमान होती है जिसका प्रकटीकरण धर्म के मूल लक्ष्य के विरुद्ध होता है।
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