Wednesday, December 4, 2019

ना मैं अपनी चेतना में नही रचा जाता!

ना, मैं अपनी चेतना में नही रचा जाता हूँ। न तो मेरे जन्म की घटना मेरी चेतना द्वारा रचित है और न ही मेरी मृत्यु। हाँ मेरे मैं का बोध अवश्य मेरी चेतना द्वारा निर्मित है लेकिन तब इस बोध की मनोवैज्ञानिक या न्यूरोलॉजिकल व्याख्या है। मेरे मैं का बोध ही वास्तविक और मेरा अंगतन्त्र, मेरे मैं से वियोजित मेरी जैविक व्यष्टि अवास्तविक नही है बल्कि मेरा भौतिक शरीर काल क्रम में ही मेरे मैं के बोध से पहले नही आता अपितु यह बोध भी उस भौतिक शरीर और उसके अंगों, अंग तन्त्रो पर अवलम्बित है।
मेरे मस्तिष्क के अभाव में मेरा मैं का बोध खत्म हो जाएगा किन्तु मेरे मैं के बोध के खत्म हो जाने के बावजूद मेरा भौतिक शरीर रहेगा।
यदि मेरे मैं के बोध और मेरे भौतिक शरीर मे यह सम्बन्ध है तो फिर ऐसा कहना कि ब्रह्मांड हमारी चेतना में रचा जाता है सही नही है। ब्रह्मांड पहले है और चेतना बाद में।

प्रकृति पुरुष को जन्म देती प्रतीत होती है लेकिन चुकी प्रकृति के समानांतर पुरूष की सत्ता स्थापित करनी है जो उसके समान ही अनादि हो अतः आगे की व्याख्या के लिए पुरुष को अविद्या में पड़ना अज़्यूम करना पड़ता है।
क्वाण्टम भौतिकीविद में से कुछ भले ही यह कहें कि की ब्रह्मांड तब अस्तित्व में आता है जब प्रेक्षक प्रेक्षण करता है लेकिन मुझे यकीन है कि जगत का इस तरह प्रेक्षक में लोप नही होगा और भौतिकीविद शीघ्र ही या कुछ वर्षों में क़वान्तम भौतिकी की यह पहली सुलझा लेंगे: विचारों का इतिहास गवाह रहा है कि अंततः जीत वस्तुवाद की ही होती है। हम प्रेक्षण करे या न करें यह जगत रहेगा।

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...