Friday, January 31, 2020

द्वंदात्मकता और भारत मे धर्मनिरपेक्षता

अव्वल हम किसी निश्चितता से नही कह सकते कि सृष्टि चक्रीय है। यह कारणता के प्रतीत्य उत्पाद की अवधारणा पर घटनाओ की एक अनन्त शृंखला भी हो सकती है (बौद्ध दर्शन)। दोयम, जब हम प्रकृति विषयक हेगेल के द्वंदवाद की हामी भरते हैं तो अपनी सीमितता की अनदेखी कर द्वंदवाद के दावे के साथ इस दम्भ में होते हैं कि मानवीय बुद्धि उस परम विचार को समझ सकती है और उस परम की बुद्धि भी स्वयम द्वंदात्मकता के नियम से संचालित है।
अस्तित्व सार से पहले है और हम बहुत ज्यादा यदि कुछ कर सकते हैं तो अस्तित्ववान के सार को पकड़ सकते हैं लेकिन इस सार को सम्पूर्ण प्रकृति पर आरोपित कर देना तार्किक दृष्टि से ठीक नही है।
इस्लामिक कट्टरता स्वयम द्वंद के नियम का पालन नही करती। इसके चौदह सौ सालों के इतिहास में मुझे तो कोई ऐसा काल नही दिखा। इसकी कोई एक धारा जो धर्मनिरपेक्ष हो? कोई एक इस्लामी मुल्क जहाँ धर्मनिरपेक्षता मजहबी तंत्र पर प्रमुखता पाता हो?
उनके यहाँ तो खिलाफत की परम्परा को जीवित करने की बात हो रही है और रोज ब रोज एक नया खलीफा पैदा हो रहा है। 
साम्प्रदायिक हिंदुत्व या कुछ लोगो के अनुसार मात्र हिंदुत्व, वास्तव में इस्लामिक कट्टरपंथ, इस्लामिक आक्रामकता, अरबी जाहिलियत के साथ साथ छद्मधर्मनिर्पेक्षता द्वारा उनके तुष्टिकरण की प्रतिक्रिया है। काश की यह प्रतिक्रिया ईरान में भी हुई होती, काश की यह प्रतिक्रिया उन भूखे नंगे अफ्रीकी मुल्कों में भी हुई होती जहाँ बोको हराम जैसे संगठन हैं। यह प्रतिक्रिया स्पेन में हुई है, यह प्रतिक्रिया भारत मे भी हुई है। यह प्रतिक्रिया स्पेन में हुई तभी अल्लामा इकबाल लिखते हैं: 
हस्पनिया तू खून ए मुसलमां का अमी है
मानिंद ए पाक हरम है तू मेरी नज़र में।
और ग़ज़वा ए हिन्द, शरीयत और खिलाफत से तो हम सभी परिचित है जो नब्बे फिसदी हिंदुस्तानी मुसलमानों के दिल मे धड़कता है। तभी आरिफा खानुम जैसी धर्मनिरपेक्ष पत्रकार यह कहती है कि हम अपनी स्ट्रेटजी बदल रहे है आइडियोलॉजी नही। 
बहरहाल, कोई बीमारी कई करको के एक साथ मिलने से ही उतपन्न होती है। उग्र हिंदुत्व के आने के पीछे  ऐतिहासिक रूप से तीन कारक हैं: इस्लामी आक्रामकता, कांग्रेसी तुष्टिकरण की नीति और उनको वामपंथ की बौद्धिक सहायता।
अतः गेंद इन तीनो के पाले में हैं यदि धर्मनिरपेक्षता, वास्तविक धर्मनिरपेक्षता लक्ष्य हो।

【छद्मधर्मनिरपेक्षता का आशय वह अभिवृति है जिसके अंतर्गत किसी धर्म विशेष को ही आलोचना का लक्ष्य किया जाता है एवमअन्य मजहब एवम मजहबी मामलों के प्रति चयनात्मक रूप से उदासीनता बरतते हुए सम्बंधित मामलों को बौद्धिक रूप से जायज ठहराने का प्रयास भी किया जाता है।
छद्मधर्मनिर्पेक्षता समाज के सभी धर्मों के प्रति तटस्थ नही होता बल्कि यह अपने एजेंडे के अनुसार प्रायः मात्र बहुसंख्यक धर्म के प्रति आक्रामक होता है और धर्मो के परस्पर टकराहट की स्थिति में अल्पसंख्यक धर्म को अपना समर्थन प्रस्तुत करता है।】



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