Wednesday, December 4, 2019

शुद्र, पैर और सभ्यता

भाई, पुरुष सूक्त का हवाला दिया जाता है कि उससे जाति वाद की शुरुवात हुई, ब्राह्मण मुख बना और शूद्र पैर।
समझ-समझ का फेर है, पैर को कोई इतना निम्न क्यो समझता है?

मानवो में जो उनकी अपनी विशिष्ट चेतना, सौंदर्य बोध और नैतिकता है वह एक प्रजाति के रूप में उनमे बाद में आया।
विकासक्रम में सबसे पहले पैर आया, फुट आया क्योकि लेग्स तो अन्य जीवों में भी थे। मनुष्य ने सबसे पहले खड़े होना सीखा। उसके पैर और बटक्स कि पेशियाँ मजबूत हुईं और यह जीवों के बहुलता के बीच एक अद्वितीय घटना थी।
पैरों के आने की इस अद्वितीय घटना ने हाथों को शरीर का भार ढ़ोने के कार्य से स्वतंत्र कर दिया। अब हाथ वास्तविक मायने में हाथ थे। अब हाथ टूल्स बना सकते थे।
वृक्षो से उतरकर जमीन पर अनुकूलन होने के लिए हाथ-पैर का यह शार्प विभेद स्थापित हुआ और फिर हमने आग जलाना सीखा, खेती सीखी आदि-आदि●●●●●●


हाँ शुद्र कौन?
तपसे शूद्रम (यजुर्वेद )
जो अत्यनत कठिन शारीरिक श्रम करे वह शुद्र।
जो बौद्धिक श्रम करे वह ब्राह्मण।

मतिष्क अपने पैरों का शोषण नही करता और न ही अपना ही पैर अपने सर को लात मरता है।

यह जो कुछ मष्तिष्क अपने पैरों से अपने सर को कुचल देने के लिए उकसा रहे हैं वह उनके अंदर की क्रांति नही, उस मष्तिष्क का पागलपन है। ऐसे में कोई नही बचेगा!!

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