Wednesday, December 4, 2019

आस्तिकता, नास्तिकता और जीवन चलता रहे।


कथा यूँ है कि किसी काल में कोई व्यक्ति बड़ी दूर की यात्रा करके किसी ढाबे में पँहुचा।
तेज़ धुप में दूर की यात्रा के कारण उसे बहुत तेज़ प्यास लगी थी। ढाबे पर पँहुचते ही उसने ढाबेवाले से कहा
: भाई पानी का एक लोटा देना।

ढाबे वाले ने उसे जो देना था दे दिया लेकिन जिस वक़्त, जिस क्षण वह मुसाफिर पानी का लोटा मांग रहा था ठीक उसी वक़्त दो दार्शनिक, एक वैयकारण और एक अनपढ़ वहाँ से गुजर रहे थे।

अनपढ़ बस गुजर गया, जैसे कुछ हुवा ही न हो लेकिन दार्शनिक और वैयाकणीय बस यूँ ही नही गुजर पाए।
वैयाकरणीय को उस मुसाफिर की जहालत पर तरस आ रही थी की उसने एक लोटा पानी की जगह पानी का एक लोटा माँगा।
भाषा का अपमान!!

पहले दार्शनिक को एक नयी सूझ मिली की यदि पानी का एक लोटा पहो सकता है तो प्यास को ही क्यों नही पिया जा सकता।
फिर तत्त्वशास्त्रीय चितन प्रारम्भ हुवा और एक नये सम्प्रदाय (दार्शनिक सम्प्रदाय) की स्थापना हुई जो पिछले दो ढाई हजार वर्ष से अस्तित्वमान है और उस #पियाईपी या #पिपासामपिपासा  सम्प्रदाय के विचारकों को अपना साहित्य है जिसमे प्यास को पिने के दिव्यज्ञान के सम्बन्ध में कम से कम तैतीस पंक्तियां लिखी हुई है।

बात यही खत्म नही हुई दूसरे दार्शनिक ने भी एक परम्परा प्रारंभ की जिसमे पानी के लोटे को एक द्वंद माना गया और इस परम्परा के अनुसार दुनिया लोटाधारी और अलोटाधारी में विभाजित है क्योंकि लोटा पूंजीवाद की देन है। आदिम समाज मे मनुष्य अंजुली से पानी पीता था। इस परम्परा के आधुनिक पुरोधा ने अपने मित्र के साथ मिलकर एक अद्वितीय ग्रन्थ #लोटा लिखा जिसकी प्रेणना पाकर यह सम्प्रदाय #ब्लैक_बुक_ऑफ_अलोटा के अनुसार 10 करोड़ से ज्यादा लोटावालो का नरसंहार कर चुका है। इस सम्प्रदाय से  जे एन यू वाले प्रोफेसर साहब आजकल आदिवासियों को यह समझाने में लगे है कि आदिवासियों में जो लोटा-पानी की परंपरा होती है वह ब्राह्मणवाद है और इसका खात्मा जय भीम-लाल सलाम के नारे के साथ सशस्त्र  क्रांति ही कर सकती है।

अनपढ़ सम्प्रदाय लोटा का पानी या पानी के लोटे से प्यास बुझा कर आगे बढ़ जाता है।

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