धर्म की अवधारणा एवम अभिप्राय का अध्ययन-विश्लेषण करने में "प्रविधि का निर्धारण" सबसे पहली बाधा है। मानवीय जीवन का शायद ही कोई पहलू है जो धर्म से अछूता हो साथ ही 'धर्म व्यापार में मानव का सम्पूर्णत्व लगा रहता है'।¶अपनी इस व्यापकता के कारण धर्म के अध्ययन की कोई एक प्रविधि असंगत होगी अतः इंटरडिसिप्लिनरी, मल्टीडिसिप्लिनरी तथा ट्रांसडीसीलपिंरी अप्रोच का उपयोग धर्म के अध्ययन में वांछित होगा।
¶【सामान्य धर्म दर्शन एवम दार्शनिक विश्लेषण: या मसीह पृष्ठ 23】
इन्टरडिसिप्लिनरी, मल्टीडिसिप्लिनरी तथा ट्रांसडीसीप्लिनरी अप्रोचेज़ को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है:
●इंट्राडिसिप्लिनरी:
●मल्टीडिसिप्लिनरी:
●ट्रांसडीसीप्लिनरी:
इन पदों को आरेखों द्वारा उपरोक्त तरीके से दर्शाया जा सकता है:
स्पष्ट है कि सरल समस्याओं को डिसिप्लिनरी, जटिल समस्याओं को मल्टीडिसिप्लिनरी तथा दुरूह समस्याओं को ट्रांसडीसीप्लिनरी प्रविधि द्वारा हल किया जाता है।
प्रश्न है कि धर्म किस श्रेणी की समस्या है, सरल, जटिल अथवा दुरूह?
दर्शन द्वितीय स्तर का अन्वेक्षण है अतः धर्म के अध्ययन में प्रथम स्तर पर प्रयुक्त प्रविधियों से प्राप्त निष्कर्षों का विविध दार्शनिक प्रविधियों के माध्यम से चिंतन, विश्लेषण और व्याख्या धर्म की अवधारणा को स्पष्ट करने की एक संगत विधि हो सकती है।
मानवीय विचारों के इतिहास में व्याप्त प्रवृत्तियो को विविध शीर्षकों के अंदर विभाजित किया जा सकता है: शास्त्रीय युग, मध्यकाल, आधुनिक काल की विविध प्रवृतियां यथा: बुद्धिवाद, अनुभववाद, संशयवाद, समीक्षावाद, निर्पेक्षवाद तथा समकालीन वैचारिक प्रवृतियां जैसे विश्लेषणात्मक पद्धति, अस्तित्ववाद, प्रैगमटिज़्म, फेनोमेनोलॉजी, मार्क्सवाद तथा उत्तर आधुनिकतावाद और इसकी विविध शाखाएं।


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