आदिम युगों से
सींचता रहा पत्थर को
इस गांठ में मिटता रहा मैं
घुट घुटकर अचेतन बन।
युग-युगांतर
तुमने दिए घुटन
मर्यादाएं कहकर।
तुम्हारे छद्म को
नकारता हूँ
मिट्टी हूँ मैं
यही परमसत्य है।
सींचता रहा पत्थर को
इस गांठ में मिटता रहा मैं
घुट घुटकर अचेतन बन।
युग-युगांतर
तुमने दिए घुटन
मर्यादाएं कहकर।
तुम्हारे छद्म को
नकारता हूँ
मिट्टी हूँ मैं
यही परमसत्य है।
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