आज दो महाज्ञानियों का शास्त्रार्थ है। आज सत्य ज्ञान निर्णीत हो कर रहेगा। दोनों आचार्यो के पास अपनी अपनी परम्परा है और यह परम्परा कम से कम 3000 वर्ष पुरानी है यह बात और है कि दोनों परम्पराएं किसी एक सोते से ही फूटी है।
इन दो आचार्यो के अलावा भी और कई आचार्य है जिनके पास आज बहस की विषय वस्तु पर ज्ञान सम्बन्धी अपने अपने दावे हैं।
खैर, हमे उनसे क्या लेना हम तो इन तो इन आचार्यो पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगें।
एक आचार्य जी का नाम सदाशिव एकलिंगी है और दूसरे आचार्य का नाम सदाशिव पँचलिंगी।
एकलिंगी महाराज एकलिंग परम्परा के समर्थक है और पँचलिंगी महाराज पँचलिंग परम्परा के।
आचार्यो के बीच शास्त्रार्थ का प्रश्न यह है कि प्रकृति एक लिङ्गी है या पांच लिङ्गी क्योंकि प्रकृति के इसी लिंग का निर्धारण के कारण शायद उन्हें त्रिविध तापो से मुक्ति नही मिल रही।
एक लिङ्गी पँचलिंगियो के बारे में कहते है कि उन्हें मुक्ति मिल ही नही सकती क्योंकि प्रकृति तत्व के विषय में उनका ज्ञान अप्रमा है।
यही बात पँचलिंगी एकलिंगियों के बारे में कहते है लेकिन आज तक उन तीन हज़ार सालो में न तो किसी पँचलिंगी को और न ही किसी एक लिङ्गी को मुक्ति मिल पाई है।
और हाँ अलिंगी, स्यात लिङ्गी, लिंगलिंगी किसी भी सम्प्रदाय के किसी व्यक्ति को मुक्ति मिली विली नही है हलाकि सब एक दूसरे के प्रकृति के लिंग विषयक मत को अप्रमा मानते है और अपने मत को ही प्रमा बताते हैं।
आचार्य एकलिंगी ने पँचलिंगी के पूर्वपक्ष को रखते हुए उसका खंडन करना प्रारम्भ किया।
आपकी प्रतिज्ञा है कि प्रकृति एकलिंगी है क्योंकि आप एक प्रकृति के पांच घटक मानते है लेकिन आचार्य पँचलिंगी पांच घटकों से निर्मित प्रकृति को एक मानते हैं।
समस्या पांच से एक बनाम एक में पांच का है।
यह शास्त्रार्थ कई महीनों तक चलने वाला है या हो सकता है कई सालों तक और लिङ्गी साहित्य में गूढ़ से गूढ़तम सूत्र और व्याख्याएं आनेववाली है लेकिन उनका कोई भी ज्ञान दरअसल ज्ञान है ही नही।
उनका ग्रन्थ ज्ञान के ग्रन्थ है ही नही क्योंकि गड़बड़ी उनके प्रश्न में ही है : कितनी लिंगात्मिका है प्रकृति?
यह अप्रश्न है।
सही प्रश्न करिए शब्द ही बदल जाएंगे वरना करते रहिए दार्शनिक विमर्श और करते रहिए शास्रार्थ।
वैसे कोई इनको बता दे कि पश्चिम थेल्ज़ के जल ही जगत का मूल है के एक लिङ्गी सिद्धान्त से कहाँ क्वार्क और बोसॉन तक पहुंच गया है मात्र इसलिए की उन्हें सही प्रश्न पूछना आ गया लेकिन हम तो महामृत्युंजय मंत्र में कवान्तम जगत का चमत्कार देख कर ही रहेंगे।
जय हो!!!
इन दो आचार्यो के अलावा भी और कई आचार्य है जिनके पास आज बहस की विषय वस्तु पर ज्ञान सम्बन्धी अपने अपने दावे हैं।
खैर, हमे उनसे क्या लेना हम तो इन तो इन आचार्यो पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगें।
एक आचार्य जी का नाम सदाशिव एकलिंगी है और दूसरे आचार्य का नाम सदाशिव पँचलिंगी।
एकलिंगी महाराज एकलिंग परम्परा के समर्थक है और पँचलिंगी महाराज पँचलिंग परम्परा के।
आचार्यो के बीच शास्त्रार्थ का प्रश्न यह है कि प्रकृति एक लिङ्गी है या पांच लिङ्गी क्योंकि प्रकृति के इसी लिंग का निर्धारण के कारण शायद उन्हें त्रिविध तापो से मुक्ति नही मिल रही।
एक लिङ्गी पँचलिंगियो के बारे में कहते है कि उन्हें मुक्ति मिल ही नही सकती क्योंकि प्रकृति तत्व के विषय में उनका ज्ञान अप्रमा है।
यही बात पँचलिंगी एकलिंगियों के बारे में कहते है लेकिन आज तक उन तीन हज़ार सालो में न तो किसी पँचलिंगी को और न ही किसी एक लिङ्गी को मुक्ति मिल पाई है।
और हाँ अलिंगी, स्यात लिङ्गी, लिंगलिंगी किसी भी सम्प्रदाय के किसी व्यक्ति को मुक्ति मिली विली नही है हलाकि सब एक दूसरे के प्रकृति के लिंग विषयक मत को अप्रमा मानते है और अपने मत को ही प्रमा बताते हैं।
आचार्य एकलिंगी ने पँचलिंगी के पूर्वपक्ष को रखते हुए उसका खंडन करना प्रारम्भ किया।
आपकी प्रतिज्ञा है कि प्रकृति एकलिंगी है क्योंकि आप एक प्रकृति के पांच घटक मानते है लेकिन आचार्य पँचलिंगी पांच घटकों से निर्मित प्रकृति को एक मानते हैं।
समस्या पांच से एक बनाम एक में पांच का है।
यह शास्त्रार्थ कई महीनों तक चलने वाला है या हो सकता है कई सालों तक और लिङ्गी साहित्य में गूढ़ से गूढ़तम सूत्र और व्याख्याएं आनेववाली है लेकिन उनका कोई भी ज्ञान दरअसल ज्ञान है ही नही।
उनका ग्रन्थ ज्ञान के ग्रन्थ है ही नही क्योंकि गड़बड़ी उनके प्रश्न में ही है : कितनी लिंगात्मिका है प्रकृति?
यह अप्रश्न है।
सही प्रश्न करिए शब्द ही बदल जाएंगे वरना करते रहिए दार्शनिक विमर्श और करते रहिए शास्रार्थ।
वैसे कोई इनको बता दे कि पश्चिम थेल्ज़ के जल ही जगत का मूल है के एक लिङ्गी सिद्धान्त से कहाँ क्वार्क और बोसॉन तक पहुंच गया है मात्र इसलिए की उन्हें सही प्रश्न पूछना आ गया लेकिन हम तो महामृत्युंजय मंत्र में कवान्तम जगत का चमत्कार देख कर ही रहेंगे।
जय हो!!!
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