Friday, April 17, 2020

सनातनी, ईश्वर और नैतिकता

अव्वल मैं अपने को निरपेक्ष अर्थ में सनातनी नही कहता: मैं बुल्ले की जाना मैं कौन वाली स्थिति में हूँ लेकिन ऐसा नही है कि जब तक इस सवाल का जवाब नही मिल जाए तब तक के लिए मेरी कोई एड होक आइडेंटिटी नही है,बल्कि आइडेन्टिटीज़ नही हैं। 
मैं कौन हूँ इस प्रश्न का उत्तर प्रश्न के परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है: नैना का पापा, आम्रपाली का पति, राम देव मिश्र का लड़का, झारखण्ड सरकार का एक कर्मी, आधार संख्या -- -------, सर्विस संख्या 185620 कई पहचान हैं। 

सनातनी? 

बाक़ी नही मैं ख़ाकी हूँ
जिंदा हूँ जब तक बाकी हूँ

मैं कभी नही मानता कि कुछ सनातन होता है: यही एक मात्र सनातन है, इस अर्थ में आप मुझे सनातनी कह सकते हैं। 

ईश्वर?

ईश्वर के बारे में मेरी राय यह है कि यह तत्कालीन समाज के आशाओं, अपेक्षाओं, स्वप्नों, पलायनो, जीवटता आदि सारे सामाजिक मनोवैज्ञानिक गुणों अवगुणों का क्रिस्टलाइज़ेशन मात्र है।

"ख़ुदा है और क्या इसके सिवा तो कुछ भी नही
 है वो हसरतें इब्न ए आदम का ही जम जाना"

नैतिकता?

नैतिकता को लेकर मैं निर्पेक्षवादी नही बल्कि सापेक्षवादी हूँ: मूल्य शाश्वत नही होते, कदापि नही; न तो देशीय और न ही कालिय और न ही देश-कालिय आयाम में!

-----------●●●●●---------

मानुष और बनमानुष

बनमानुषों ने कुछ खोजा ठीक है लेकिन, आज की पीढ़ी के लोग उन बनमानुषों  द्वारा उनके डर, स्वप्न, आशा, निराशा, पलायन, संघर्ष में ढूंढे गए उस कुछ के लिए अपने अंदर के मानुष की हत्या कर देते हैं, यह कुछ समझ मे नही आता; तब उन बनमानुषो द्वारा अपने अंदर के मानुष की हत्या करनी उनकी मजबूरी थी लेकिन आज का मानुष अपने अंदर के मानुष को मारे ये क्या बात हुई!

------●●●●--------

कोरोना और गाथा

यदि पूरी दुनिया मे कोरोना महामारी फैल जाती है और कुछ लोग महामारी को हराकर जीवित रह जाते हैं तो यही होगा जैसे जैव विकास काम करता है।
हमारे पूर्वजो (हमारे का मतलब आदमी के पूर्वजो) ने ऐसी कई लड़ाइयां लड़ी हैं और विजयी हुए हैं और तब जाकर आज हमारा अस्तितव है वरना क्या होता है आदमी, कोई कल्पना भी नही कर सकता!
हम संयोगशाली हैं कि कोरोना जैसी आपात हमे साल-दो साल में मिलती है। हमारे पूर्वज रोजाना ऐसी आपात से सामना करते थे।
हमारा अस्तित्व करोड़ो वर्षों से हो रहे अस्तित्व के संगर्ष की गाथा है जो या तो यहीं खत्म हो जाएगा या हम उस महागाथा में दो चार पंक्तियां जोड़कर गाथा को आगे बढ़ा देंगे।

--------●●●●●-------

कोरोना और ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या

हल्की सी झपकी लगी थी कोरोना के बारे में सोचते सोचते फिर स्वप्न में कोरोना देख कर नींद उचट गई।
जाग्रत-स्वप्न-जाग्रत के इस चक्कर में याद आया कि जगत स्वप्न की भाँति मिथ्या है तथा ब्रह्म एक मात्र सत्य है अतः कोरोना अविद्या, माया, रज्जू में सर्प का भ्रम मात्र है। 
एक मुमुक्षु को कोरोना से भयभीत नही होना चाहिए क्योंकि उसको तो यह सोचना है कि यह सब मिथ्या जगत की मिथ्या चीज़ें हैं; आत्मा को कोरोना छू भी नही सकता भले शरीर तड़प तड़प कर आई सी यू में मर जाए।

कितना खोखला दावा है तुम्हारा, और तुम इसे असल ज्ञान कहते हो!

--------●●●●●---------

जगत मिथ्या है
किंतु महामारी 
क्या है 
हे आस्तिक शिरोमणी?
और नागार्जुन
कोरोना भी
निः सार निष्परपंच
शून्य है क्या?
अच्छा जिनेन्द्र
तुम बताओ
वायरस में आत्मा 
है कि नही?

दरअसल हम कोरोना को उपरोक्त दर्शन/ दृष्टि/ दिठ्ठी में जन्मी शब्दावली में सोच ही नही सकते लेकिन हम उन शब्दावलियों में जगत को बलात अवश्य सोंचेंगे क्योकि अतीत महान था वर्तमान में आपात है और भविष्य फिर से महान होगा भले ही भविष्य नाम की कोई चीज ही न बचे!

-----●●●●------

फ्रैंक्सटिन कोरोना

समस्या यह है कि यदि कोरोना भारत मे फैला तो फिर बड़ी मुश्किल हो जाएगी क्योकि यहाँ न तो लोगो में अपेक्षित अनुशासन है, न ही उस स्तर की जागरूकता और जनसँख्या घनत्व का बहुत ज्यादा होना अलग से है: कोई कितना बचेगा!

ब्रह्मंडविज्ञान में एक पैराडॉक्स मौजूद है जिसे फर्मी पैराडॉक्स कहते हैं। इसके अनुसार ब्रह्मांडीय स्तर पर पृथ्वी जैसे जीवन, बल्कि इंटेलिजेंट जीवन पनपने की असंख्य जगहों के बावजूद हम आज तक कही और जीवन क्यों नही ढूंढ पाए हैं या अन्य इंटेलिजेंट जीवो ने हमे क्यो नही ढूंढ लिया है।

फर्मी पैराडॉक्स का एक हल यह भी दिया जाता है कि इंटेलिजेंस जीवन इस प्रकार प्रोग्राम्ड है कि अंततः वह अपना विनाश कर लेता है और पीछे कुछ नही बचता।

कोरोना का यह नया स्ट्रेन प्राकृतिक रूप से वायरसों में म्यूटेशन का परिणाम भी हो सकता है लेकिन यह भी दावे के साथ नही कहा जा सकता कि यह नया स्ट्रेन प्रयोगशाला में जेनेटिकली इंजीनियर्ड नही है। यदि यह वास्तव में जेनेटिकली  ईजीनियर्ड है तो हे इस धरा के एकमात्र बुद्धिधारी जीवो तुमने अपने लिए फ्रैंक्सटिन दानव तैयार कर लिया है, बधाई!

सम्भवतः प्रकृति ने तुम्हे बुद्धि देकर एक प्रयोग किया था लेकिन तुमने तो इसे बंदर के हाथ का उस्तुरा बना डाला!!

---------●●●●●--------

आवारा विचार 【कोरोना】

बहुत पहले सोचा था कि एक लंबी कहानी लिखूंगा जिसमे कई पात्रों की कहानी चलेगी जिसमे सबकी कहानी एक दूसरे से बहुत जटिल रूप से गुँथी होगी। सबके अपने अपने स्वप्न होंगे लेकिन फिर एक लंबा खाली पेज और कहानी खत्म। 
जहाँ से खाली पेज शुरू हुआ वही उन पात्रों के देश मे परमाणु बम से हमला हो गया और इसके पहले की वो कुछ समझते सब खाली, सब सादा!

------●●●●-----

संस्कृति का उत्कर्ष

संस्कृति का उत्कर्ष तो देखो
आदमी दाँत चियार के मर गया
तो संस्कृति वीरों ने कहा:
धन्य हमारी संस्कृति
यह मर के भी हँस रहा है
देखो दाँत चियारा है अभी भी!

नमस्ते!!
-------●●●●-------

बिहारी व्यवहार की एक बानगी।

बिहारी व्यवहार की एक बानगी।

यह पार्थेनियम, गाजर घास या कॉंग्रेस ग्रास है। 
इसके बीज को अकाल बीज भी कहा जाता है। यह बहुत ही खतरनाक वीड है जो अमेरिका से हमारे यहाँ आ गया और हमारे पर्यावरण, हमारी फसल, हमारी ज़मीन को बर्बाद तो कर ही रहा है हमे भी कई प्रकार के रोग भी देता है।

【Contact with the plant causes dermatitis and respiratory malfunction in humans, and dermatitis in cattle and domestic animals. The main substance responsible is parthenin, which is dangerously toxic. It also is responsible for bitter milk disease in livestock when their fodder is polluted with Parthenium leaves.

Among other allelopathic effects of the species, the presence of Parthenium pollen grains inhibits fruit set in tomato, brinjal, beans, and a number of other crop plants.】WIKI

#लेकिन_एक_मिनट!!!

हमे बी एस सी में हरबेरियम बनाना पड़ता था और संयोग से गांव (बिहार) में मुझे यह पौधा तब दिख गया जब मैं गाँव गया हुवा था। 
मैंने सावधानी से इसे उखाड़ना शुरू किया कि इसको भी अपने हरबेरियम मे डाल दूंगा तभी
अंदर से एक बुढ़िया दादी निकल कर मुझे भला वुरा कहने लगी: 
ई नतिया सब कबरलस!

आश्चर्य! इस पौधे से इनको इतना मोह क्यों!!

मैंने उन बुढ़िया दादी को शांत किया और कारण पूछा तो बुढ़िया दादी ने बताया कि 

ई बरियार ह (ये बरियार का पौधा है।) मैं रोज इसके जड़ को पीस कर दूध में पीती हु अपने कमर दर्द के लिए।

मैं आवाक था।

भोजपुरी में बरियार का मतलब  ताकतवर होता है।

-------●●●●●---------

त्राहिमाम, जय श्री राम

त्राहिमाम देश की
त्राहिमाम,
तेरी तो जय श्री राम,
जय जय श्री राम!
कोरोना का डंका?
हनुमान जी फूंकेंगे लंका!
भरत सा भाई?
असल चिन्ता करने वाला
धर्मद्रोही कसाई!
लखन के लिए संजीवनी बुट्टी,
बाहर जूझ रहे जो
उनके लिए बाबाजी की घुट्टी!
त्राहिमाम, देश की त्राहिमाम,
जय श्री राम, जय श्री राम!!

---------●●●●●--------

ठेका

ठेका!

कोरोनो से लड़ने का 
ठेका आप लो,
संस्कृति की दुहाई का
ठेका वो लेंगे।
खाने की कमी न हो
आपका ठेका,
मंत्र पढ़ खाए की 
बिस्मिल्ला कर 
उनका बताने का ठेका।
आपको उनकी गंदगी 
उठाने का ठेका,
उनका खुद को 
पॉलिश मारने का ठेका।
आपका वो बचें
इसका ठेका,
उनका, कुछ बचे न बचे
संस्कृति ठेठियाती रहे का ठेका!

---------●●●●●---------

अपना पित्तर देवता, आन्ह का पित्तर प्रेत

वेश्यावृत्ति
दारूबाजी
प्रेतपूजा

में नीचे से प्रारम्भ करता हूँ

◆ब्रह्म बांधना क्या होता है और बांध कर उनकी पूजा क्या प्रेत पूजा है?
◆ ब्रह्म बाबा और पहलवान बाबा तथा प्रेतपूजा में कोई अंतर है?
◆ पित्तर और प्रेत में कितना अंतर है?
◆ ब्रह्मदुखी परिवार क्या होते हैं और इनको शांति के लिए किसकी पूजा की सलाह दी जाती है?

वैसे प्रेत होता क्या है?

◆दारूबाजी गलत है और भांग गाँजा फूंकना सही कैसे?
◆यदि दारू पीना उनके भोजन का हिस्सा हो तो क्योकि भूगोल हमारे खान पान को निर्धारित करता है। देखिए न कुछ पेड़ तो कीड़े तक खाना शुरू कर देते है ताकि उनको नाईट्रोजन मिल सके।

◆ वेश्या, नगरबधु, गणिका में क्या फर्क है?
◆ वेश्यावृत्ति मतलब?

सोशीयोलॉजिकल इमेजिनेशन एक टर्म है जिसको सी राईट मिल्स ने दिया है। यदि आपको पूर्वाग्रह से हटकर समाजशास्त्र करना है तो अपने मस्तिष्क में यह सोशीयोलॉजिकल इमेजिनेशन डालना होगा वरना अपरिचित हमेशा बुरा और शत्रु लगता है। यह दोष आपका नही, आपके अंदर के बनमानुष का है जो अभी आदमी नही बन पाया है।
आप किसी किसी अन्य समाज का विश्लेषण करते समय अपने समाज, अपने मूल्य को ही कसौटी कैसे मान सकते हैं?
-------●●●●●--------

संस्कृति वीरों

संस्कृति वीरों,
राम को नही मानने के वावजूद 
मेरा खून खौल उठता है,
राम सीता के अपमान पर।
ओह, अब समझा..
खून को पानी कर
उस पानी से अपना 
पेचिश साफ करना
असल मे राम को 
मानना है।
ठीक है, विभीषण के रक्तबीजों!!
महीनमारों मैं फिर से कहता हूँ
गजनियो की तलवारों से खतरनाक हैं
एम एफ हुसैनो की कुचियाँ
और सबसे खतरनाक हो तुम!!

--------●●●◆◆---------

कोरोना (क्या करें?)

कुछ नही करेंगे जल्दी 
तो सब खत्म हो जाएगा
लेकिन क्या करें यह पता नही 
किसी को नही
बस किए जा रहे है कुछ कुछ
तो करते जाना है
जब तक पता नही चलता
असल में करना क्या है।

---------●●●●------

लाल बड़बोले

लाल बड़बोले
------------------

वह चीथड़ों में लिपटी है
कोई अंग ढका नही
उसके होठो पर 
चरक का दाग है
दाग को छुपाने के लिए 
उसके पास लाली है
लाली, लाली, ओठलाली,
हैड्रॉक्सिक्लोरोक्विन!

यह ओठलाली
जगतसुंदरी बनने के लिए
अपर्याप्त है
जगत सुंदरी को भर पेट 
खाना चाहिए, साफ पानी चाहिए
शौचालय चाहिए शौचने के लिए
उसके जान की कीमत हो
और मंदिर की ज़रूरत तो है ही
जिसके आगे वो चीथड़ों में लिपटी
भीख मांगेगी।

क्या जानते हो, 
ओठलाली वाली
अपनी दवाई ट्रायल के लिए भी
वही भेजती है 
ताकि वह कम से कम
लाली से दाग ढकते हुए भी
जिंदा रह सके
चीथड़ों और छाड़न में लिपटी ही सही?

और लालीवाली के लालो बड़बोले
तुम और मैं
केवल चूहे है
बिलायती चूहे
उनके लिए, 
उनकी प्रयोगशाला के चूहे!

--------●●●●●----------

कोरोना यदि हम हार गए

कोरोना यदि हम 
हार गए तुमसे,
यदि तुमने हमारी नाभी का अमृत
सोख लिया ओ चीन,
तो इतिहास पुराण तुम लिखोगे ही,
बस कुछ को 
विभीषण ज़रूर लिख देना
मेरी  प्रार्थना मानके।
आग तो हमारी लंका में तुमने
लगा ही रखी है अभी
हम राक्षसों की राक्षसनियो के
गर्भपात होने ही लगे हैं भय से!
और दोष तुमको क्या दुँ जब
घर का भेदी ही लंका ढाए?
--------●●●●--------

आवारा विचार 【जिंदगी】

जिंदगी में कुछ है वै नही सब नाटक है और इस नाटक के नीचे थोड़ी सी ही असल ज़िंदगी है।
कभी उसको देखा भी है तुमने?

देखना, लेकिन तब उसके लिए मौला बनना पड़ेगा, पागल बनना पड़ेगा, मलंग बनना पड़ेगा और साथ ही अपने इनहिबिशन्स पर जीत भी हासिल करनी होगी और यह बड़ी हिम्मत का काम है।

नदी पुल से पार कर लिया तो बड़े तीसमारखाँ हो?
डूबने का मजा लो, गहराई में उतरो, पानी से बाहर आओ फिर डुबो, थोड़ी देर धारा के साथ बहो, थोड़ी देर उसके विरुद्ध तैरो....नदी पार करने का मज़ा तब है न।

नदी के उस पार दो-तीन मन लकड़ी ही है सबके लिए, सबके लिए!
इसलिए अपना ही व्यक्तित्व जियो।

दानिशमंदी बादशाही न मालो असबाब की फिकर
फकीरी करता रहूँ, ज़िंदगी गुजरे मेरी फकीराना।


------------●●●●●-----------

युद्ध कैसे जीते जाते है?

मेरी प्यारी बहना सह मित्र सह जूनियर ने लिखा कि युद्ध आध्यत्म से जीते जाते हैं।

बहना काश की युद्ध आध्यत्म से जीते जाते! 
युद्ध दरअसल हथियार, अनुशाशन और रणनीति से जीते जाते हैं। कभी कभार लक, चान्स, देऊस एक्स मेकिना हो सकता है जो युद्ध मे अप्रत्याशित परिणाम ला दे लेकिन यह न के बराबर होता है। 

बीसे बिसा नौ पैतीसा झका झुमरिया डेढ़ सौ पर विश्वास हमे पराजित ही करता है।
 
पता नही सच या झूठ किन्तु जब गजनी ने सोमनाथ मंदिर पर चढ़ाई की तो ब्राह्मण देवता कमण्डलु से जल छिड़क रहे थे। उन्हें यकीन था कि सोमनाथ उनकी और अपनी रक्षा कर लेंगे किन्तु क्या हुवा?
हम पराजित हो गए! 
अध्यात्म ठीक है, यह अपने आप से जीतने के लिए अवश्य ज़रूरी होगा किंतु युद्ध मे लड़ाई स्वयम से नही बल्कि शत्रु से होती है और इस बार का शत्रु तो साक्षात रक्तबीज है। हर बार माता काली स्वयम इस रक्तबीज का नाश करने अपने खप्पर लेकर क्यो आएंगी भला? 
और कैसे पता कि यह रक्तबीज ही है, यह  उनकी  लपलपाती जिव्हा भी हो सकती है?
यदि ऐसा भी है तब भी डॉक्टर, प्रशाषन, ड्राइवर, सफाईकर्मी आदि कल्याणकारी शिव बनकर माई की राह में  लेटने की कोशिश कर तो रहे हैं। शायद माई का ह्रदय द्रवित हो जाय!

ये क्या मैं तो भटक गया...!
हाँ, तो लड़ाई में अध्यात्म प्राथमिक नही होता बल्कि हथियार और रणनीति प्राथमिक होते हैं। 
बहना देखो न, चीन ने, ताईवान ने, दक्षिण कोरिया ने और अपने यहां केरल ने इनके बदौलत कितना अच्छा इस महामारी पर नियंत्रण कर लिया है।

बहना हमारे यहाँ, जहां मेरी ड्यूटी है अभी कुछ दिन पहले जगत को बचाने के लिए अयोधया से कुछ ज्ञानी आध्यात्मिक पुरूष आए थे लेकिन महामारी फैली, लौकडाउन हुवा और वो बेचारे वापस अयोध्या नही जा पाए और यहीं फंस गए।

अब हम उनको बचा रहे हैं।

----------------●●●●●------------

Friday, April 10, 2020

प्रश्न बदल जाते हैं।

प्रश्न बदल जाते हैं। 

एक प्रश्न प्रायः पूछा जाता है कि बिग बैंग कहाँ हुवा या यह ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है।
सम्भवतः हम गलत प्रश्न पूछ रहे हैं और यह कहॉ ब्रह्मांड पर हम मात्र अपने मष्तिष्क में सादृश्यता की प्रक्रिया द्वारा, ब्रह्मांड के अंदर की घटनाओं को, जो कि देश काल मे घटती है, उनका आरोपण समग्र ब्रह्मांड पर कर रहे हैं।

हमारे "कँहा" कि शायद एक सीमा है क्योकि बिग बैंग हर उस जगह हुवा जिस जगह से हम परिचित हो सकते हैं: मैं जहाँ बैठा हूँ वहां भी और आप जहाँ बैठे हैं वहां भी।

समस्या यह है कि यह "कहाँ" का प्रश्न दिक-काल का, बल्कि दिक के निर्धारण का प्रयास है और दिक ब्रह्मांड के अंदर है तथा हम किसी भी प्रकार ब्रह्मांड के बारे में बाहर की दृष्टि, आउट ऑफ बॉक्स विचार बना ही नही सकते।
सिम्पली नॉट अलाउड, क्या याज्ञवल्क्य ने गार्गी से नही कहा था कि बस करो गार्गी वरना तुम्हारा मस्तिष्क फट जाएगा जब वो इस "कँहा" की शृंखला पर याज्ञवल्क्य पर प्रश्न पर प्रश्न करती जा रही थी।

लेकिन क्यों? क्या उपरतोक्त कारण ही है या अन्य कोई तर्क है जिससे इस बात को बल मीले सकता है कि हम वस्तुतः प्रश्न ही गलत कर रहे हैं?

मैं भी एक साम्यानुमान का सहारा लूंगा।

मेरी बेटी अबोध है। वह देखती है कि पड़ोस वाली बुवा हमारे घर मे आती है फिर अपने घर जाती है अर्थात पड़ोस वाली बुवा यहां से जब चली जाती है तो अपने घर मे जाती है और उनका घर हमारे घर के पीछे है।

एक दिन बेटी सुनती है कि "बिजली चली गई"
अब वह बुवा के साथ उपस्थित चीजो के साथ बनी अपनी मन मे संकल्पना के आधार पर साम्यानुमान का प्रयोग कर पूछती है कि पापा बिजली का घर कहा है?

वह बड़ी होगी और उसकी चेतना विकसित होगी तो वह जानेगी की बिजली चली गई एक बस काम चलाऊ वाक्य है। बिजली चली गई और बुवा चली गई दोनों एक बात नही है।

हममें उनकी जिनकी भौतिकी और गणित में उस स्तर की ट्रेनिंग नही है शायद मेरी बेटी की तरह ही साम्यानुमान के आधार पर यह गलत प्रश्न पूछ रहे है कि बिग बैंग कहा हुवा और ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है।* ज्ञान के विस्तार के साथ, चेतना के विकास के साथ शायद हमारे प्रश्न बदल जाए और हमे यह प्रश्न अ-प्रश्न लगे- बिगबैंग कहा हुवा और ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है।

 -------●●●●--------
* हॉकिंग कहते हैं कि यह ऐसा ही प्रश्न है कि उत्तरी ध्रुव के उत्तर में क्या है।

Thursday, April 9, 2020

कोरोना 2

एक झूठ की तुम ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं; एक झूठ की तुम अशरफ उल मख़लूक़ात हो, एक झूठ की सोबोरे ऊपर मानुष।
एक झूठ की तुम केंद्र में हो।
सच यह कि तुमने यहाँ आने के लिए संघर्ष भी नही किया है, सच मात्र इतना है कि आज तक प्रकृति ने अचेतन रूप से तुम्हारा पक्ष लिया है।
तुम्हारी सभ्यता का दम्भ, तुम्हारी संस्कृति का दर्प, तुम्हारे ज्ञान का अहंकार सब खोखले हैं।
तुम बीमारी से मरते हो, तुम भूख से मरते हो, तुम आपस मे लड़ कर मरते हो।
तुम्हारे झूठ का आवरण हट चुका है, आँखें खोलकर अपनी खिड़की से फैले वीराने को देखो, यह सूनापन चीख चीख कर तुम्हे आईना दिखा रहा है।

आज कपड़ो की कमी हो जाय तो तुम अपने जननांग ढकने के बजाय कपड़े से मुंह-नाक ढकने का विकल्प चुनेंगे!

तुम्हारी सभ्यता ध्वस्त हो रही है, तुम्हारी संस्कृति वाष्पीकृत हो रही है।
वो तुममें से ही एक थी न जो कल नग्न होकर अमेरिका की सड़क पर मुँह में चूहे दबाए बेतहाशा दौड़ रही थी?

तुम बचोगे या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन अगर बच गए तो झूठ और गफलत में मत जीना।
एक नई संस्कृति विकसित करना, अपनी प्राथमिकतायें बदल लेना!

मनुष्यों यह संसार केवल तुम्हारा नही है। तुम किसी प्रयोजन के निमित्त यहाँ नही हो। बस हो।
तुम नही भी हो तो प्रकृति को कोई फर्क नही पड़ेगा। तुम्हारे पुरुष की कल्पना बस अपने मन की तुष्टि के लिए है। पुरुष है ही नही, केवल प्रकृति है: सत तम रज से युक्त, उन्मुक्त!
उन्मुक्त क्योकि उसका कोई नियंता नही है और वह स्वयम भी सचेतन कोई कार्य नही करती।
देश-काल के द्वि पदों से वह बस विचरण करती रहती है, निरुद्देश्य।
उस प्रारंभिक बीज से वह प्रस्फुटित है या वह बीज भी उसने ही जना है यह तुम नही जान सकते क्योंकि उसने तुम्हे यह स्वतंत्रता दी ही नही है।
उसके किसी कदम पर तुम्हारे होने की घटना घट गई, बस यूं ही, निरूद्देश्य और यंत्रवत और तुमने समझा तुम उस प्रकृति के पुरुष हो!

---------●●●●●---------

Friday, April 3, 2020

कोरोना 1

यदि पूरी दुनिया मे कोरोना महामारी फैल जाती है और कुछ लोग महामारी को हराकर जीवित रह जाते हैं तो यही होगा जैसे जैव विकास काम करता है।
हमारे पूर्वजो (हमारे का मतलब आदमी के पूर्वजो) ने ऐसी कई लड़ाइयां लड़ी हैं और विजयी हुए हैं और तब जाकर आज हमारा अस्तितव है वरना क्या होता है आदमी, कोई कल्पना भी नही कर सकता!

आप मानो या न मानो लेकिन चेतना अस्तित्व के अंतर, अंतरा और परि प्रजातीय संघर्ष के कारण ही जन्मी है; इसकी धारक कोई  शाश्वत, नेति नेति या तत्वमीमांसा वाली आत्मा नही है।

हम संयोगशाली हैं कि कोरोना जैसी आपात हमे साल-दो साल में मिलती है। हमारे पूर्वज रोजाना ऐसी आपात से सामना करते थे।
हमारा अस्तित्व करोड़ो वर्षों से हो रहे अस्तित्व के संगर्ष की गाथा है जो या तो यहीं खत्म हो जाएगी या हम उस महागाथा में दो चार पंक्तियां जोड़कर गाथा को आगे बढ़ा देंगे।

इति सिद्धम, पीड़ा मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है। 
सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।
परमार्थ के बोध में पीड़ा का निवारण नही होता बल्कि पीड़ा से पलायन के प्रयास में परमार्थ रचा जाता है।

अतएव धर्म जीवन के लिए है, ईश्वर जीवन के लिए है न कि जीवन धर्म और ईश्वर के लिए। यदि ये जीवन को आसान करने के बजाय और उलझा दें तो फिर अधार्मिक और नास्तिक बनना भला।
जीवन का यदि कोई लोकोत्तर या ट्रान्सेंडैंटल उद्देश्य (मुक्ति/ईश्वरीय साम्राज्य/जन्नत) न हो तो जीवन का मूल्य कम नही हो जाता, जीवन तब भी उतना ही मूल्यवान रहता है, बल्कि इहलोक में ही जीवन के उत्सव मनाने की संभावना तब और बढ़ जाती है, जीवन और जगत जैसा है उसकी स्वीकार्यता बढ़ जाती है, पलायन की अधिभौतिकी नही रचनी पड़ती।
अभी हम बंदर से आदमी ताज़ा ताज़ा बने थे इसलिए अभी भी हम मुकम्मल तौर पर आदमी नही बन पाए 
बनमानुषों ने कुछ खोजा ठीक है लेकिन, आज की पीढ़ी के लोग उन बनमानुषों  द्वारा उनके डर, स्वप्न, आशा, निराशा, पलायन, संघर्ष में ढूंढे गए उस कुछ के लिए अपने अंदर के मानुष की हत्या कर देते हैं, यह कुछ समझ मे नही आता; तब उन बनमानुषो द्वारा अपने अंदर के मानुष की हत्या करनी उनकी मजबूरी थी लेकिन आज का मानुष अपने अंदर के मानुष को मारे ये क्या बात हुई!

------●●●●--------

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...