Wednesday, December 4, 2019

धर्म का संस्थानीकरण और सामाजिक समस्या


धर्म के संस्थानीकरण के साथ समस्या अपने भारतीय संस्करण में भी उपस्थित रही है जहाँ वर्ण व्यवस्था के स्वरूप की विकृति के साथ धर्म शोषण का माध्ययम बन गया और मानव के एक बहुत बड़े हिस्से को अस्पृश्य बनाकर उनके सच्चिदानन्द स्वरूप को ही नही बल्कि उनके मानव होने की अनुभूति को ही हर लिया गया। अब इनके लिए धर्म एक बाध्यता थी, कुलीन वर्गों के विस्तारवादी मनस्थिति की अभिव्यक्ति! अतः कबीर, रैदास का आना एक ऐतिहिसिक यथार्थता बनी।

यदि अब्राहमीय धर्म बहुधा इस तथ्य को नकार देते है हैं कि उनकी धर्मिक मान्यताएं काल विशेष में किसी ऐतिहिसिक समस्या का समाधान थीं और उनकी वही व्याख्या जो उस काल मे उपस्थित थी, आज की परिस्थितियों में उसी रूप में लागू नही हो सकतीं तो यह भी मानते रहना की धर्म का जो अभिप्राय था, इसकी जो अवधारणा थी, वह आज भी अपने उसी रूप में विद्यमान है, केवल आत्मप्रवंचना और इतिहास में जीना है। इतिहास में जीना और आत्मप्रवंचना किसी संस्कृति को नष्ट करने के लिए काफी होता है।

यदि भारतीय संस्कृति को बचना है तो हमे धर्म और इसके द्वारा उतपन्न विसंगतियों को स्वीकार करना ही होगा तथा उस मूल स्थिति में लौटना होगा जहाँ धर्म की अवधारणा और अभिप्राय मानवीय सत्ता को उसके दिव्य रूप से साक्षत्कार कराना है। इस मूल अवधारणा में वर्तमान की विसंगतियों के लिए कोई जगह नही हो सकती।

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