लग्न-योग-संयोग,
गौरवर्णा, मोहिनी,
प्रकृति का अद्भुत रूप,
वागीश्वरी का अधिष्ठान तुम्हारे स्वर,
वृतियों की डोर,
गूँथती भावों को तुम पोर पोर।
मृत्यु के घाट पर,
जीवन की अठखेलियाँ,
वृति, प्यास, प्रवृति,
अस्तित्व कम्प, भाव तरंग, बुद्धि प्रपंच,
प्रकृति सृष्ट पुरुष चाहे,
पुरुष कल्पित प्रकृति,
एक अकिंचक का जन्म।
प्रारम्भ इष्ट-अभीष्ट महाकाव्य,
नव सृजन, नवकल्पना, नव भावना,
मरघट के वासी को,
अमृत साक्षात्।
सुदर्शनम,
अमृतम तव दर्शनम!!
--●●●●●●●●●--
गौरवर्णा, मोहिनी,
प्रकृति का अद्भुत रूप,
वागीश्वरी का अधिष्ठान तुम्हारे स्वर,
वृतियों की डोर,
गूँथती भावों को तुम पोर पोर।
मृत्यु के घाट पर,
जीवन की अठखेलियाँ,
वृति, प्यास, प्रवृति,
अस्तित्व कम्प, भाव तरंग, बुद्धि प्रपंच,
प्रकृति सृष्ट पुरुष चाहे,
पुरुष कल्पित प्रकृति,
एक अकिंचक का जन्म।
प्रारम्भ इष्ट-अभीष्ट महाकाव्य,
नव सृजन, नवकल्पना, नव भावना,
मरघट के वासी को,
अमृत साक्षात्।
सुदर्शनम,
अमृतम तव दर्शनम!!
--●●●●●●●●●--
No comments:
Post a Comment