निर्जन स्थान पर हूँ। चारो ओर उस वृत में जहाँ धरती और आकाश आपस मे मिलते प्रतीत हो रहे हैं उसके और मेरे बीच कुछ नही है। मैं हूँ, मेरी सम्वेदनाएँ हैं, मेरी स्मृति है, मेरे स्वप्न हैं और धरती और आकाश है।
आकाश की ओर देखता हूँ: यह नीला है लेकिन यह वास्तव में नीला नही है यह जानता हूँ। यह जानता हूँ कि सूर्य से आने वाली दृश्य प्रकाश के नीले किरणों का सर्वाधिक प्रकीर्णन हो रहा है। चारो ओर देखता हूँ तो उस क्षितिज द्वारा बने वृत के केंद्र में स्वयम को पाता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति मुझसे मात्र एक मिटर भी किसी भी दिशा में हट के खड़ा हो तो वह स्वयम को अपने द्वारा दृश्य अपने वृत के केंद्र में पाएगा। हमे यह समझने में वक्त लगा कि पृथ्वी इस ब्रह्मांड का केंद्र नही है हालांकि ऐसा प्रतीत होता है।
खैर, मुझे जो भी प्रत्यक्षीकरण अपनी ज्ञाननेंद्रियों के माध्ययम से हो रहा है क्या होता यदि मेरी इंद्रियां किसी और दिशा में विकसित हुई होती? क्या मुझे यह आकाश दिखता? क्या मुझे यह पृथ्वी दिखती? क्या मुझे इस हवा की सनसनाहट सुनाई देती जो अभी सुन रहा हूँ?
एक प्रश्न और आ रहा है मन मे, क्या हो यदि अचानक से मेरे मैं का यह मनोवैज्ञानिक बोध खत्म हो जाए? तब भी क्या मैं, मैं रहूंगा?
क्या हो यदि मेरी इंद्रियां लघु से लघु चीजें देखने लग जाएं?
तब क्या मैं अपनी भौतिक सीमा और मेरे इस भौतिक शरीर के बाहर जो कुछ भी है उसमें भेद कर पाऊंगा?आप कहेंगे कि हां अपनी संवेदना के कारण मैं भेद कर पाऊंगा लेकिन मुझे तो दो तीन साल पहले अपने पैर की एक उंगली का ही बोध किसी नर्व के दब जाने के कारण नही होता था। मेरे व्यवहारिक जीवन के लिए क्या ऐसा नही है कि प्रकृति ने मेरे और इस जगत के बीच का नर्व दाब कर रखा हो और यह उस नर्व का दबना भी महज मेरे जैविक विकास का परिणाम हो?
एक सम्भावना तो बनती है कि मैं कुछ और भी हूँ और मेरे सम्वेदना में आने वाला जगत भी कुछ और भी है।
कहीं सच मे मैं/यह जो है और जगत/वह जो है एक ही तो नही हैं?
आकाश की ओर देखता हूँ: यह नीला है लेकिन यह वास्तव में नीला नही है यह जानता हूँ। यह जानता हूँ कि सूर्य से आने वाली दृश्य प्रकाश के नीले किरणों का सर्वाधिक प्रकीर्णन हो रहा है। चारो ओर देखता हूँ तो उस क्षितिज द्वारा बने वृत के केंद्र में स्वयम को पाता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति मुझसे मात्र एक मिटर भी किसी भी दिशा में हट के खड़ा हो तो वह स्वयम को अपने द्वारा दृश्य अपने वृत के केंद्र में पाएगा। हमे यह समझने में वक्त लगा कि पृथ्वी इस ब्रह्मांड का केंद्र नही है हालांकि ऐसा प्रतीत होता है।
खैर, मुझे जो भी प्रत्यक्षीकरण अपनी ज्ञाननेंद्रियों के माध्ययम से हो रहा है क्या होता यदि मेरी इंद्रियां किसी और दिशा में विकसित हुई होती? क्या मुझे यह आकाश दिखता? क्या मुझे यह पृथ्वी दिखती? क्या मुझे इस हवा की सनसनाहट सुनाई देती जो अभी सुन रहा हूँ?
एक प्रश्न और आ रहा है मन मे, क्या हो यदि अचानक से मेरे मैं का यह मनोवैज्ञानिक बोध खत्म हो जाए? तब भी क्या मैं, मैं रहूंगा?
क्या हो यदि मेरी इंद्रियां लघु से लघु चीजें देखने लग जाएं?
तब क्या मैं अपनी भौतिक सीमा और मेरे इस भौतिक शरीर के बाहर जो कुछ भी है उसमें भेद कर पाऊंगा?आप कहेंगे कि हां अपनी संवेदना के कारण मैं भेद कर पाऊंगा लेकिन मुझे तो दो तीन साल पहले अपने पैर की एक उंगली का ही बोध किसी नर्व के दब जाने के कारण नही होता था। मेरे व्यवहारिक जीवन के लिए क्या ऐसा नही है कि प्रकृति ने मेरे और इस जगत के बीच का नर्व दाब कर रखा हो और यह उस नर्व का दबना भी महज मेरे जैविक विकास का परिणाम हो?
एक सम्भावना तो बनती है कि मैं कुछ और भी हूँ और मेरे सम्वेदना में आने वाला जगत भी कुछ और भी है।
कहीं सच मे मैं/यह जो है और जगत/वह जो है एक ही तो नही हैं?
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