Wednesday, December 4, 2019

अहमकेन्द्रित विषमावस्था

जो कुछ भी जाना जा सकता है अपने अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ही जाना जा सकता है। अस्तित्व को ट्रांसेन्डेन्ट कर कुछ जाना ही नही जा सकता इस प्रकार हर जानना अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था से ग्रसित है। यदि थोड़ा और बौद्धिक अनुशाषित हुवा जाय तो हम नही जानते कि हमारे अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था में प्राप्त ज्ञान के बाहर कुछ है भी। वह अज्ञात अस्तित्वमान हो,तब भी न तो वह हमे प्रभावित करता है और न हम उसे। हमारे और उसके बीच कोई अन्तःक्रिया सम्भव नही फिर उसके बारे में चिंतन बौद्धिक अपव्यय भी हो सकता है।
उस तक हमारी वाणी नही पहुंच सकती, उस तक हमारे विचार नही पहुंच सकते तब वह हमें रिस्पॉन्ड भी नही करेगा फिर मानव एक अनावश्यक सत्ता का बोझ क्यो ढोए?

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