डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण
भूमिका:
भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि भाषाई दृष्टि से भी इनका गहरा विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। इस लेख में खरवार, चेरो और डीहवार शब्दों की व्युत्पत्ति, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भाषा-विज्ञान की दृष्टि से उनके विकास की पड़ताल की गई है।
1. खरवार: नामकरण और व्युत्पत्ति
खरवार समुदाय की उत्पत्ति को लेकर कई मत प्रचलित हैं।
(क) भाषाई विश्लेषण:
"खरवार" शब्द संभवतः ऑस्ट्रोएशिएटिक (आग्नेय भाषा परिवार) से विकसित हुआ है। इस संदर्भ में "खेड़ेहोड़" → "खड़होड़" → "खड़हड़" → "खरवार" का विकास तर्कसंगत प्रतीत होता है।
संथाल-मुंडा समुदायों में "होड़" या "हड़" शब्द का अर्थ मनुष्य होता है। उदाहरण के लिए:
- बिरहोर (बिर = जंगल, होर = आदमी) → जंगल में रहने वाले लोग
- केसरिहड़, बानुहड़ जैसे कुड़मी गोत्रों में भी "हड़" प्रत्यय मिलता है।
"खरवार" शब्द का संबंध दक्षिण-पूर्व एशियाई "Khmer" (ख्मेर) समुदाय से भी जोड़ा जा सकता है, जो मोन-खमेर भाषा परिवार से संबंधित हैं। यह संभावना है कि प्राचीन भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच हुए संपर्कों ने इन नामों को प्रभावित किया हो।
(ख) ऐतिहासिक संदर्भ:
- ब्रिटिश जनजातीय विद्वान डब्ल्यू. क्रुक (1896) और रसेल-हिरालाल के अनुसार, खरवारों का संबंध खैर-कत्था उत्पादन या खर घास से जोड़ा गया है, लेकिन यह तर्क कमज़ोर प्रतीत होता है।
- महाभारत में वर्णित "करुष" जनजाति, जिन्होंने कौरवों का साथ दिया था, संभवतः खरवारों से संबंधित हो सकते हैं।
(ग) सामाजिक स्थिति और क्षत्रियकरण:
खरवारों को कहीं-कहीं क्षत्रिय समुदाय का दर्जा प्राप्त है। इनके वैवाहिक संबंध राजपूतों, खांगर क्षत्रियों, परमारों और तोमरों से रहे हैं। कई क्षेत्रों में ये जमींदार और स्थानीय राजा भी रहे हैं, जिससे इनका सामाजिक दर्जा ऊँचा हुआ।
2. चेरो: मूल, संपर्क और आर्यीकरण
चेरो जनजाति का मूल इंडो-आर्यन समुदायों से नहीं, बल्कि संथाल-मुंडा समुदायों से अधिक जुड़ा हुआ है।
(क) भाषाई मूल:
"चेरो" शब्द संभवतः ऑस्ट्रोएशिएटिक शब्द 'चिरो' (खेड़े, चेड़े) से आया हो सकता है।
संथाल-मुंडा मिथकों में मनुष्य की उत्पत्ति चिड़िया के अंडे से बताई गई है। यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंदी में "चिड़िया" शब्द संस्कृत से नहीं निकला, बल्कि इसे ऑस्ट्रोएशिएटिक मूल का माना जाता है।
(ख) चेरो और इंडो-आर्यन संपर्क:
चेरो समुदाय सीमांत क्षेत्रों में रहते थे और इनका इंडो-आर्यन समुदायों से व्यापक संपर्क हुआ। इसके परिणामस्वरूप:
- संस्कृतिकरण (Sanskritization) – इन्हें वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय स्थान मिला।
- भाषा और परंपराओं का सम्मिश्रण – इनके बीच हिंदू रीति-रिवाजों का प्रसार हुआ।
(ग) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- चेरो राजाओं का शासन झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में फैला हुआ था।
- चेरो राजा इंद्रजीत चेरो और उनके वंशजों का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है।
3. डीहवार: व्युत्पत्ति और ऐतिहासिक संदर्भ
"डीहवार" शब्द का संबंध "डीह" (गाँव/स्थल) और "होड़/हड़" (मनुष्य/जनजाति) से जोड़ा जा सकता है।
(क) भाषाई विकास:
- "डीह-होड़" → "डीह-हड़" → "डीहवार"
- यह परिवर्तन उसी प्रकार हुआ, जैसे "होड़" से "हड़" और फिर "वार" में रूपांतर हुआ।
यह ध्यान देने योग्य है कि "वार" प्रत्यय संस्कृत-प्राकृत में पहले से मौजूद था (नगरवार, ग्रामवार), लेकिन इसका संबंध फारसी के "वाला" प्रत्यय से भी हो सकता है, जो हिंदी में आया (जैसे, चायवाला, फेरीवाला)।
(ख) सामाजिक स्थिति:
डीहवार संभवतः उन समुदायों से संबंधित थे, जो ग्राम-देवता (डीह) की पूजा करते थे। बाद में, इनका इंडो-आर्यन संस्कृति के साथ घनिष्ठ संपर्क हुआ और इनका सामाजिक दर्जा बढ़ा।
4. निष्कर्ष
- खरवार मूलतः एक ऑस्ट्रोएशिएटिक (मुंडा) समुदाय थे, जिनका नाम "खेड़ेहोड़ → खड़होड़ → खरवार" रूपांतरित हुआ। इनका संबंध महाभारत के "करुष" जनजाति से भी हो सकता है।
- चेरो मूलतः संथाल-मुंडा समूह के निकट रहे, लेकिन इंडो-आर्यन संपर्क के कारण इनका संस्कृतिकरण और क्षत्रियकरण हुआ।
- डीहवार शब्द "डीह-होड़" से विकसित हुआ, जहाँ "हड़/होड़" प्रत्यय "वार" में रूपांतरित हो गया।
भाषाई निष्कर्ष:
- "होड़/हड़" शब्द संथाल-मुंडा भाषाओं में मनुष्य को दर्शाता है और यह कई जनजातीय नामों में मिलता है।
- "वार" प्रत्यय संभवतः हिंदी-फारसी संपर्क से आया या स्वतः विकसित हुआ।
इतिहास और समाज:
- खरवार और चेरो जनजातियाँ संस्कृतिकरण और सामाजिक उत्थान के कारण क्षत्रिय वर्ण में सम्मिलित हो गईं।
- डीहवार संभवतः उन समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ग्राम देवताओं (डीह) की पूजा करते थे।
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