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स्टीफेन हॉकिंग एक पैराडाक्स का उल्लेख करते हैं जिसे निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है :
यदि वास्तव में एक यूनिफाइड थ्योरी है तो यह हमारे कृत्य, हमारे अनुसन्धान, हमारी जगत को समझने की कोटियों, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क को भी प्रभावित और कंडिशन्ड करेगा और इस प्रकार यह यूनिफाइड सिद्धान्त हमारे यूनिफाइड सिद्धान्त विषयक निष्कर्ष को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा। और अब आता है असली प्रश्न: यूनिफाइड थ्योरी द्वारा कंडिशन्ड हमारे अनुसन्धान, हमारा इंटेलिजेंस, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क हमे प्रमाणों से #सही निष्कर्ष, असल यूनिफाइड थ्योरी की ओर ले ही जाएंगे इस बात की क्या गारंटी है?
हाकिंग जब इस पैराडॉक्स का उल्लेख करते हैं तो वह एक वैज्ञानिक की हैसियत से यह बात नही कहते बल्कि वह स्वयम एक दार्शनिक बन जाते हैं जिसके विषय मे उन्होंने कहा कि दर्शन मृत हो गया है क्योंकि दर्शन के उन सारे प्रश्नों का उत्तर वैज्ञानिकों द्वारा दिया जा रहा है।
विज्ञान के पास उनके अपने स्वयम के इस पैराडॉक्स का कोई उत्तर नही है। वैज्ञानिक फ्रेमवर्क में इन प्रश्नों को प्रश्न स्वीकार भी नही किया जाता। हॉकिंग महोदय यहाँ स्वयम दार्शनिक कांट के जूतों में चले जाते है जिनकी उन्होंने आलोचना की है।
कांट ने अपने पूर्ववर्ती अनुभवाद और बुद्धिवाद दोनों की आलोचना, समीक्षा की और फिनामिना तथा न्युमोना के द्वैत को प्रस्तुत किया।
कांट के अनुसार #न्युमोना, थिंग इन इटसेल्फ या अपने आप मे वस्तुए हैं लेकिन यह न्युमोना ज्ञाता में फेनोमेना के रूप में प्रस्तुत होता है। कांट के अनुसार परम् सत्ता है लेकिन इसका ज्ञान (Gnosis) मानव को नही हो सकता। वैज्ञानिक ज्ञान सम्भव है किंतु यह वैज्ञानिक ज्ञान #मानव_मन_के_स्वरूप से नियंत्रित होता है। मानव-मन किसी भी ज्ञान वस्तु को तभी जान सकता है जब वह इस ज्ञेय को अपने a priori या पूर्वानुभविक रूपो के द्वारा अभिरंजित कर देता है। इस स्थिति में जो भी मानव ज्ञान का विषय होगा वह अपने असली रूप में नही जाना जा सकता।
ध्यातव्य है कि जगत पर कोई भी गम्भीर चिंतन जगत को व्यवहार और परमार्थ या फिनामिना और न्युमोना में बांट ही देता है और हाकिंग के उपरोक्त पैराडॉक्स में यह विभाजन अपनी जगह पा ही लेता है।
प्रश्न है कि यदि यह विभाजन आ ही जाता है तो क्या किया जाय?
इसके तीन उत्तर हो सकते हैं: पहला इस विभाजन को स्वीकार करते हुए परमार्थ पर भी चिंतन किया जाय दूसरा इस विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद फिनामिना पर अपना ध्यान केन्दित किया जाय या तीसरा न्युमोना को बकवास मानते हुए केवल फेनोमेना की ही बात की जाय।
एक रिगरस वैज्ञानिक के लिए तीसरे विकल्प को चुनना उसकी मजबूरी होती है क्योंकि वैसा कुछ भी जो अनुभव में पकड़ नही आ सकता उसको विज्ञान विषयक कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार विज्ञान के लिए अनआवश्यक विषय है।
निश्चित तौर पर विज्ञान की प्रकृति के कारण न्युमोना को बकवास मानना विज्ञान की बाध्यता है लेकिन चेतना जब जगत पर समग्रता से विचार करती है तो यह प्रश्न मात्र बकवास और बकलोली नही हैं क्योंकि विज्ञान सीमित है और जगत असीमित: जगत मात्र #कैसे चर (वेरिएबल) के साथ मौजूद नही है।
हाकिंग जब इस पैराडॉक्स का उल्लेख करते हैं तो वह एक वैज्ञानिक की हैसियत से यह बात नही कहते बल्कि वह स्वयम एक दार्शनिक बन जाते हैं जिसके विषय मे उन्होंने कहा कि दर्शन मृत हो गया है क्योंकि दर्शन के उन सारे प्रश्नों का उत्तर वैज्ञानिकों द्वारा दिया जा रहा है।
विज्ञान के पास उनके अपने स्वयम के इस पैराडॉक्स का कोई उत्तर नही है। वैज्ञानिक फ्रेमवर्क में इन प्रश्नों को प्रश्न स्वीकार भी नही किया जाता। हॉकिंग महोदय यहाँ स्वयम दार्शनिक कांट के जूतों में चले जाते है जिनकी उन्होंने आलोचना की है।
कांट ने अपने पूर्ववर्ती अनुभवाद और बुद्धिवाद दोनों की आलोचना, समीक्षा की और फिनामिना तथा न्युमोना के द्वैत को प्रस्तुत किया।
कांट के अनुसार #न्युमोना, थिंग इन इटसेल्फ या अपने आप मे वस्तुए हैं लेकिन यह न्युमोना ज्ञाता में फेनोमेना के रूप में प्रस्तुत होता है। कांट के अनुसार परम् सत्ता है लेकिन इसका ज्ञान (Gnosis) मानव को नही हो सकता। वैज्ञानिक ज्ञान सम्भव है किंतु यह वैज्ञानिक ज्ञान #मानव_मन_के_स्वरूप से नियंत्रित होता है। मानव-मन किसी भी ज्ञान वस्तु को तभी जान सकता है जब वह इस ज्ञेय को अपने a priori या पूर्वानुभविक रूपो के द्वारा अभिरंजित कर देता है। इस स्थिति में जो भी मानव ज्ञान का विषय होगा वह अपने असली रूप में नही जाना जा सकता।
ध्यातव्य है कि जगत पर कोई भी गम्भीर चिंतन जगत को व्यवहार और परमार्थ या फिनामिना और न्युमोना में बांट ही देता है और हाकिंग के उपरोक्त पैराडॉक्स में यह विभाजन अपनी जगह पा ही लेता है।
प्रश्न है कि यदि यह विभाजन आ ही जाता है तो क्या किया जाय?
इसके तीन उत्तर हो सकते हैं: पहला इस विभाजन को स्वीकार करते हुए परमार्थ पर भी चिंतन किया जाय दूसरा इस विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद फिनामिना पर अपना ध्यान केन्दित किया जाय या तीसरा न्युमोना को बकवास मानते हुए केवल फेनोमेना की ही बात की जाय।
एक रिगरस वैज्ञानिक के लिए तीसरे विकल्प को चुनना उसकी मजबूरी होती है क्योंकि वैसा कुछ भी जो अनुभव में पकड़ नही आ सकता उसको विज्ञान विषयक कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार विज्ञान के लिए अनआवश्यक विषय है।
निश्चित तौर पर विज्ञान की प्रकृति के कारण न्युमोना को बकवास मानना विज्ञान की बाध्यता है लेकिन चेतना जब जगत पर समग्रता से विचार करती है तो यह प्रश्न मात्र बकवास और बकलोली नही हैं क्योंकि विज्ञान सीमित है और जगत असीमित: जगत मात्र #कैसे चर (वेरिएबल) के साथ मौजूद नही है।
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