Sunday, December 15, 2019

स्मृति-पुराण और कुरान आदि की व्याख्या से सम्बंधित कुछ तर्कदोष (एक)


:
विगत एक माह से स्मृतियों, श्रुतियों एवं पुराणों पर दो अलग अलग पक्षों की व्याख्याएं एवं उनके मन्तव्य को पढ़कर वर्तमान में इनकी स्थिति को समझने का प्रयत्न कर रहा हूँ। हालांकि मेरा निजी मत यह है कि हमे उक्त पुस्तको में अपनी ऊर्जा खपाने के बजाय भौतिकी, जीवविज्ञान, रसायन जैविक प्रद्योगिकी आदि की पुस्तकों को पढ़ना चाहिए लेकिन स्मृतियों एवं पुराणों का संदर्भ लेकर जब समाज आपस में गाली गलौज करना प्रारंभ कर दे तो उस वक़्त "ताओ ऑफ़ फिजिक्स" को किनारे रखकर उन किताबों एवं आज के उनके व्याख्याकारों के विषय में चिंतन बलात चला आता है।

हालाकि मुझे उन किताबों पर विभाजित दो पक्षों का नाम नहीं लेना चाहिए लेकिन मैं उनका नाम लूंगा : पहले व्यख्याकार है उग्र दक्षिणपंथी और दूसरा व्यख्याकार है मिशनरी-वामपंथी-वामसेफी गठजोड़|

जहाँ मिशनरी-वामपंथी-वामसेफी गठजोड़ की  उन किताबों से जातीय आग भड़कती दिखती है वही उग्र दक्षिणपंथ  उन किताबों के माध्यम से हिंदुत्व के उग्र रूप की पैरोकारी करता द्रष्टव्य होता है।

स्मृतियों/पुराणों की आज के सन्दर्भ में दोनों ही व्याख्यायों में मुझे तीन दोष दिखाई देते है जिन्हें मैं क्रमशः
1. डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट
2. डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ लिंग्विस्टिक्स तथा
3. डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ अडल्ट्रेशन
का नाम दूंगा।

सर्प्रथम हम "डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ रॉंग कॉन्टेक्स्ट" को लेते हैं। इस तर्कदोष के माध्ययम से जब कोई बात वर्तमान के सन्दर्भ में ऐसी होती है कि उस पर सवाल उठाया जा सके अथवा उसकी आलोचना की जा सके तो ऐसी स्थिति में समर्थक गलत अथवा सन्दर्भ के बाहर का सहारा लेकर उन बातों को जस्टिफाई करने का प्रयास करते है जो सवालों के घेरे में थी। इस तर्कदोष का प्रयोग हिन्दू दक्षिणपंथी अपेक्षाकृत कम करते हैं लेकिन मुस्लिम और क्रिस्चियन मंडनशास्त्रियों का यह फेवरेट डिफेन्स है। प्रायः जब क़ुरान की काफिरों के प्रति हिंसा का समर्थन करने वाली आयतों का उल्लेख किया जाता है तो वह झट से यह कहकर इसे सही ठहराने का प्रयास करते हैं कि ये आयतें किसी सन्दर्भ विशेष के लिए ही प्रासंगिक हैं। हिन्दू मंडनशास्त्री भी कुछ ऐसे ही तर्कों का हवाला देते हुए स्मृतियों, पुराणों की बातों को जस्टिफाई करते हैं। 
यहां एक विरोधाभास उतपन्न होता है जिसे उल्लेखित करना आवश्यक है। यदि उन बातों को सन्दर्भ विशेष में ही एप्लीकेबल माना जाय तो यह मानना होगा की ईष्वरीय वाणी सर्वदा निरपेक्ष नहीं होती उसका देश काल से सम्बन्ध होता है। अब यदि कुछ बातें सापेक्षिक हैं तो पूरा का पूरा ग्रन्थ ही आज के सन्दर्भ में अप्रासंगिक क्यों नहीं हो सकता? 
**क़ुरान की कुछ बातें उस काल में ही प्रासंगिक थी अर्थात क़ुरान अपनी सम्पूर्णता में निरपेक्ष नही है अतः यह विचार अपनी तार्किक परिणति में सम्पूर्ण क़ुरान को भी आज अप्रासंगिक बना सकता है।

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...