Wednesday, December 4, 2019

जगत आभास है?

लाख टके का सवाल है कि जो इन्द्रियानुभव में आए जगत को आभास मानते हैं उनके पास इसके प्रमाण क्या हैं कि हमारे चेतना की खिड़कियों से होकर आने वाले वाह्य जगत के स्वरूप को चेतना अपने अनुसार मोड़ देती है?
ऐसा क्यों नही की जागृत और सामान्य अवस्था में  चेतना में वातायन इस प्रकार ही हों कि हमे वाह्य जगत की कोई डिस्टॉर्टेड नही बल्कि यथारूप अनुभूति प्राप्त होती हो हाँ यह ज़रूर है कि हमारा मष्तिष्क हमेशा और हर व्यक्ति में अपना लक्षित कार्य नही करता और विक्षिप्त को या कभी कभी सामान्य मनुष्य को भी हाइल्युसिनेशन और डेलयूज़न हो सकता है। लेकिन इस डेलयूज़न और हाइल्युसिनेशन के आधार पर पूरे जगत को ही एक मैट्रिक्स और मायाजाल कह देना ठीक वैसा ही है कि हमने सपने में देखा कि हम तितली हैं और फिर सुबह उठ कर परेशान रहें कि कही सच यह तो नही की वह तितली ही स्वप्न देख रही हो कि वह हम हैं और वास्तव में हम तितली ही हों?

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