Friday, January 31, 2020

द्वंदात्मकता और भारत मे धर्मनिरपेक्षता

अव्वल हम किसी निश्चितता से नही कह सकते कि सृष्टि चक्रीय है। यह कारणता के प्रतीत्य उत्पाद की अवधारणा पर घटनाओ की एक अनन्त शृंखला भी हो सकती है (बौद्ध दर्शन)। दोयम, जब हम प्रकृति विषयक हेगेल के द्वंदवाद की हामी भरते हैं तो अपनी सीमितता की अनदेखी कर द्वंदवाद के दावे के साथ इस दम्भ में होते हैं कि मानवीय बुद्धि उस परम विचार को समझ सकती है और उस परम की बुद्धि भी स्वयम द्वंदात्मकता के नियम से संचालित है।
अस्तित्व सार से पहले है और हम बहुत ज्यादा यदि कुछ कर सकते हैं तो अस्तित्ववान के सार को पकड़ सकते हैं लेकिन इस सार को सम्पूर्ण प्रकृति पर आरोपित कर देना तार्किक दृष्टि से ठीक नही है।
इस्लामिक कट्टरता स्वयम द्वंद के नियम का पालन नही करती। इसके चौदह सौ सालों के इतिहास में मुझे तो कोई ऐसा काल नही दिखा। इसकी कोई एक धारा जो धर्मनिरपेक्ष हो? कोई एक इस्लामी मुल्क जहाँ धर्मनिरपेक्षता मजहबी तंत्र पर प्रमुखता पाता हो?
उनके यहाँ तो खिलाफत की परम्परा को जीवित करने की बात हो रही है और रोज ब रोज एक नया खलीफा पैदा हो रहा है। 
साम्प्रदायिक हिंदुत्व या कुछ लोगो के अनुसार मात्र हिंदुत्व, वास्तव में इस्लामिक कट्टरपंथ, इस्लामिक आक्रामकता, अरबी जाहिलियत के साथ साथ छद्मधर्मनिर्पेक्षता द्वारा उनके तुष्टिकरण की प्रतिक्रिया है। काश की यह प्रतिक्रिया ईरान में भी हुई होती, काश की यह प्रतिक्रिया उन भूखे नंगे अफ्रीकी मुल्कों में भी हुई होती जहाँ बोको हराम जैसे संगठन हैं। यह प्रतिक्रिया स्पेन में हुई है, यह प्रतिक्रिया भारत मे भी हुई है। यह प्रतिक्रिया स्पेन में हुई तभी अल्लामा इकबाल लिखते हैं: 
हस्पनिया तू खून ए मुसलमां का अमी है
मानिंद ए पाक हरम है तू मेरी नज़र में।
और ग़ज़वा ए हिन्द, शरीयत और खिलाफत से तो हम सभी परिचित है जो नब्बे फिसदी हिंदुस्तानी मुसलमानों के दिल मे धड़कता है। तभी आरिफा खानुम जैसी धर्मनिरपेक्ष पत्रकार यह कहती है कि हम अपनी स्ट्रेटजी बदल रहे है आइडियोलॉजी नही। 
बहरहाल, कोई बीमारी कई करको के एक साथ मिलने से ही उतपन्न होती है। उग्र हिंदुत्व के आने के पीछे  ऐतिहासिक रूप से तीन कारक हैं: इस्लामी आक्रामकता, कांग्रेसी तुष्टिकरण की नीति और उनको वामपंथ की बौद्धिक सहायता।
अतः गेंद इन तीनो के पाले में हैं यदि धर्मनिरपेक्षता, वास्तविक धर्मनिरपेक्षता लक्ष्य हो।

【छद्मधर्मनिरपेक्षता का आशय वह अभिवृति है जिसके अंतर्गत किसी धर्म विशेष को ही आलोचना का लक्ष्य किया जाता है एवमअन्य मजहब एवम मजहबी मामलों के प्रति चयनात्मक रूप से उदासीनता बरतते हुए सम्बंधित मामलों को बौद्धिक रूप से जायज ठहराने का प्रयास भी किया जाता है।
छद्मधर्मनिर्पेक्षता समाज के सभी धर्मों के प्रति तटस्थ नही होता बल्कि यह अपने एजेंडे के अनुसार प्रायः मात्र बहुसंख्यक धर्म के प्रति आक्रामक होता है और धर्मो के परस्पर टकराहट की स्थिति में अल्पसंख्यक धर्म को अपना समर्थन प्रस्तुत करता है।】



एक बाभन का जन्म



स्वामी नही
दास
महाराज नही
लघुजन
दास लघुजन
दर्शन का विद्यार्थी
(दृश्यते वस्तु यथात्मयम अनेन इति दर्शनम)
परमानन्द पांड़े बन गया:
राज करे शुद्र और
देश के बारे में सोचे ब्राह्मण?
जनेऊ की गाँठ
महामृत्युंजय।
न दास न देस
जाति!
दास लघुजन नही
जीवन पथिक नही
लोकतंत्र के तंत्र से जन्मा
मतदान पेटी पर
काँपती बुद्धि के गर्भ से
एक बाभन,
बाभन को मत  देकर!

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Thursday, January 30, 2020

प्रभात


एक और कविता है जो पूरी तरह याद नही:

प्रभात
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आदित्य के प्रभाव से
प्रभात है हो चला
बिखेरती प्रकृति हर्ष
हो चली है सरस्
कोंपले प्रस्फुटित हो
प्रभात संग झूमती
गाते है  विहंग भी
प्रभात गान झूम कर।

ओस


क्लास आठ में लिखी एक और कविता

ओस
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करती क्रंदन प्रकृति निः सहाय सी
याद कर अपने संचालक सूर्य को
कहीं तृण, कहीं प्रसून या पल्लवों पर
गढ़ती प्रकृति रात्रि में ओस है।

विखरे नेत्रों से प्रकृति के शोक में
आदित्य के अभाव में विलापते
कुछ नही यह अश्रु हैं प्रकृति के
यह चमकती मोतियाँ जो ओस की

पर यह क्षणिक क्लेश था प्रकृति का
दूर हुवा प्रभात संग उल्लास से
सोख रहीं अब अर्चियाँ थी सूर्य की
विखरे हुए अश्रुओं के बूंद को।

पैनिक अटैक की एक कविता


एंग्जाइटी एक ऐसी बीमारी है जो प्रायः 18-20 के उम्र में होती है, दिल की धड़कन तेज हो जाना, डिरियलाइजेशन, कभी कभी  तंत्रिका तंत्र की अतिशय उत्तेजना के कारण यह कन्फ्यूजन की यह स्वप्न है या हकीकत, बहुत ज्यादा डर और पैनिक अटैक इसमें होते हैं। लेकिन यह साइकोसिस नही होता। पुरानी DSM इसे न्यूरोसिस मानती है। यह साइकोसिस इसलिए नही होती कि इसमें व्यक्ति अपना इनसाइट एक सायकोटिक की भांति नही खो देता और सायकोटिक के उलट वाह्य जगत से उसका सम्बन्ध बना रहता है। हाँ यह ज़रूर है कि  वाह्य या आंतरिक जगत के उद्दीपन के अनुरूप वह प्रतिक्रिया नही करता बल्कि उसकी मानसिक और भावात्मक प्रतिक्रियाएं उस उद्दीपन की तुलना में बहुत बड़ी होती हैं।
मनोचिकितशक "सेरोटोनिन" नामक न्यूरोट्रांसमीटर को इसका उत्तरदाई मानते हैं और सामान्यतया इसमें बेंज़ोडज़ापिन यथा अलप्रजोलाम, क्लोनाज़िपाम या ट्राई साइक्लिक एन्टी डिप्रेसेंट या SSRI सेलेक्टिव सेरोटोनिन रिअपटेक इंहिबिटर यथा फ्लूओकसेंटिन या पैरोओकसेन्टीन दी जाती है।
वैसे विगत कई सालों से CBT (कॉग्निटिव विहेवियर थेरेपी) को भी इसमें दवा जितना प्रभावी पाया गया है।

यह कविता उन्ही दिनों की है:

सत, शिव, सुंदर
अथवा परमानन्द का रूप है तेरा
सच्चिदानन्द,
और भय??
अज्ञानता है केवल? माया? भ्रम?
क्या केवल इब्लीस होता है 
पैनिक अटैक में?
चापलूस मानव!!!
पूर्व जन्म का पाप नही है यह
छोड़ दो कर्म प्रवाह और निर्जरा के ढोंग को।
मैने तो परमानन्द नही पाया है
उसके अलावा 
जहाँ मैं स्खलित होता हूँ शून्य में।
हाँ तो ईश्वर,
माँ ने तेरी चालीसा रखी थी सिरहाने
जब मैं केवल सोता था
भय से त्रस्त नींद की गोलियाँ खाकर,
डिरियलाइजेशन भी होता था
और भेद भी मिटता था स्वप्न और सत का
क्या मैं तेरे करीब था
अथवा पागलपन के?
डॉक्टर ने कहा था
मर जाएगा
वरना दवा खा ले
ईश्वर के बाप!
हाँ मैं तेरा बाप हूँ ईश्वर
अपनी गांठो से पैदा करता हूँ तुझे!

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जय माँ शारदे


सरस्वती माता पर यह कविता आठवी में लिखा था जब जयशंकर प्रसाद की "हिमाद्रि तुंग श्रृंग से" कविता पढ़ी थी।
पता नही कितनी अशुद्धियाँ हैं:

प्रशस्थपथप्रदर्षिणी विवेक स्रोतस्विनी
सुहासिनी सुवासिनी भारती मधुरभाषिणी
विणाधारिणी गिरा शारदा अमृतवर्षिणी
अमर्त्यदात्री भाग्यविधात्री पददलित उत्कर्षिणी

वसन्त


वसन्त पर यह कविता क्लास 9 में लिखा था।
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बिखेरते मदमस्त पवन मकरंद को,
कलियाँ बिखेरे नव-सुवास आनन्द से,
विहाग भी गान गाते झूम-झूम,
स्वागत करते पावन रम्य वसन्त का।

दिखाती नवश्रृंगार नवपल्लवों की लाली,
क्षण-क्षण है वसन्त का अहलादमय,
कण-कण युक्त वसन्त के सुवास से,
है प्रकृति आज कुछ अतुल्य सी।

वसन्त है सन्देश नवसंकल्प का,
प्रतिबिम्ब जिसके कौतूहल प्रकृति के,
कहती प्रकृति आओ मेरे संग-संग
खो जाओ नवजीवन के उल्लास में।

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Friday, January 24, 2020

क्रांति अमर रहे कॉमरेड

   

और उस  कॉन्क्लेव में टकीला की शिप और सिगरेट का कश लेते हुए उस महिला कॉमरेड ने 
वहां---- सुदूर उस आदिवासी इलाके में क्रांति के सब्ज बाग की  मार्केटिंग के लिए अपनी इस कविता के टैग लाइन का प्रोपोजल किया जिसे बाकी कामरेडों ने अपनी अपनी पसंद के शराब की घूंट पीते हुए स्वीकार कर लिया:
'तुम सभ्य सुसंस्कृत
टकीला पिया है
माँ की छाती से तुमने 
हमने माँ की छाती से आंसू
जो जम गया है हर तह में बारूद बनकर
हाँ हम  आदिवासी हैं!'
बाकियों ने कहा: हाँ कॉमरेड इस कविता में बारूद है, आदिवासियों की मांए तो अभाव में आंसू पीकर ही बड़ी होती हैं, अब अपने बच्चों को तो अपनी छाती से वह आंसू ही पिलाएंगी न और बुर्जुवा लडकिया चुकि टकीला पीकर बड़ी होती हैं इसलिए उनके स्तनों से तो टकीला ही निकलेगा।

नेपथ्य से आवाज आई कामरेडायन, "तुम क्या पी रही हो" जिसे बाकी कामरेडों ने अनसुना करते हुए कहा:
---वाह कॉमरेड, वाह कॉमरेड, वाह कॉमरेड!!

"लेकिन कॉमरेड यदि उन आदिवासी इलाकों में सरकार  विकास की योजनाएं लेकर पँहुचे तो?"
एक दूसरे कॉमरेड ने सवाल किया।
-इसके लिए एक अलग  नैरेटिव है, साथी।
मूलता के खतरा का नैरेटिव।

और उसकी मार्केटिंग का टैग-लाइन होगा,
'राम, तेज पियोगे हमारा?
हमारी नाभी में अमृत नही है,
बारूद है, आपादमस्तक:
फट जाएगा तुम्हारे 
नीलकण्ठ का कण्ठ भी',

और फिर कहीं कुछ केन बम लगवा देना है!

सारे कामरेडों ने एक साथ शराब होठो से लगाते हुए कहा: लाल सलाम कॉमरेड, क्रांति अमर रहे!!

भारतीय दर्शन का इतिहास और काल विभाजन


पाश्चत्य परम्परा में दार्शनिक चिंतन का प्रारम्भ थेलस से माना जाता है। थेलस से लेकर आजतक पश्चिमी दार्शनिक परम्परा के इतिहास को प्री सौक्रेटिक, सौक्रेटिक, मध्यकाल, आधुनिककाल और समकालीन दार्शनिक प्रवृति में विभाजित किया जाता है। भारतीय परंपरा में इस प्रकार का विभाजन कठिन है जिसका कारण यह है कि यहाँ पश्चिम की तरह दार्शनिक परम्पराएं किसी काल विशेष में ही प्रभावी नही रही साथ ही पश्चिम की भांति किसी दर्शन विशेष का यहाँ कोई खास युग नही रहा। जोनार्डन गनेरी के अनुसार शास्त्रीय भारतीय दर्शन की बात करना बेमानी है और इसका कारण है भारतीय दर्शनिक परम्पराओ की सातत्यता और जीवंतता।¶ वेदों-उपनिषदों के अतिप्राचीन सिद्धान्त आज भी भारतीय जनमानस के व्यवहार में जीवंत हैं।
भारतीय दर्शन के इतिहास को राधाकृष्णन वैदिक काल, महाकाव्य काल, सूत्र काल तथा टीका काल मे विभाजित करते हैं:
■वैदिक काल: 1500 ई● पू● से 600 ई● पू●
■महाकाव्य काल: 600 ई● पू● से 200 ई● पश्चात
■ सूत्रकाल एवम टीकाकाल: 200 ई● के पश्चात

प्रो● हिरियन्ना ने इसे वैदिक युग, प्रारम्भिक वेदोत्तर युग तथा दर्शनों के युग मे विभाजित किया है।
■ वैदिक युग: उपनिषद पूर्व विचारधारा तथा उपनिषद
■ प्रारम्भिक वेदोत्तर युग: भगवतगीता, प्रारम्भिक बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म
■ दर्शनों का युग: भौतिकवाद, उत्तरकालीन बौद्ध सम्प्रदाय, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्वमीमांसा-उत्तरमीमांसा

उपरोक्त विद्वानों के अलावा जोनार्डन गनेरी ने भी एक  विभाजन किया है:
■जीवन पद्धति के रूप में दर्शन: 800 ई● पू से 200 ए● डी: इस काल मे वेद, उपनिषद, गीता, प्रारम्भिक बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म आजाते हैं। इस काल की प्रवृति विमर्शात्मक चितन, विविध परिकल्पनाएं और दर्शन के माध्ययम से उच्चतम आदर्श और जीवन का खोज करते हुए दुःखो का शमन था।
■ सूत्रों का काल: 100 ई● पू● से 350 ए● डी● जीवन मार्ग के रूप में दर्शन के पश्चात सूत्रों का काल आता है। यहाँ भी हालांकि दर्शन का वह प्रारम्भिक उद्देश्य बना रहता है किंतु दर्शन अब अनवीक्षकी बन जाती है और फोकस उक्त लक्ष्य के बावजूद आत्मा के अलावा प्रमाण और प्रमेय पर केंद्रित हो जाता है। भावत्वमकता का स्थान तर्कशीलता ले लेती है।
यही काल है जब बौद्ध और जैन दार्शनिक विमर्श पाली और प्राकृतिक से हटकर संस्कृत भाषा मे किए जाते हैं।
यह काल दर्शन के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस काल मे विविध परम्पराओं ने आपस मे संवाद और विमर्श स्थापित किया।
■ 150 ए● डी से 550 ए●डी● के काल को गनेरी बौद्ध विश्लेषण और जैन संश्लेषण का काल कहते हैं।

इसके पश्चात बौद्ध धर्म और दर्शन की अवनति के कारण इस उत्प्रेरक के अभाव में भारतीय दार्शनिक सम्प्रदाय शिथिल से पड़ते हैं।

नौंवी शताब्दी से 13वी 14वी शताब्दी का काल गनेरी के अनुसार भारतीय दर्शन के व्याकुलता का काल है। इस काल मे दार्शनिक इस्लाम की उपस्थिति के कारण कुछ नए की बजाय पुराने दार्शनिक सिद्धान्तो की ओर लौटते नज़र आते हैं और इसके बाद उपनिवेश काल मे दर्शन तत्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा से हटकर समाज और राजनैतिक दर्शन की ओर अपना रुख करती है।
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¶ भारतवर्ष में कुछेक दार्शनिक मतवादों का जन्म बहुत पुराने समय मे ही हो गया था, और आगे के समय का दार्शनिक क्रियाकलाप-कम से कम इरादे में-इन मूलभूत दृष्टिभंगियो का पल्लवन-भर था। 
(चट्टोपाध्याय)

【यह शोध का विषय हो सकता है कि भारत में दार्शनिक क्रियाकलाप एक सर्वथा नवीन वैचारिक ढांचे में नवीन चिंतन, जगत और मनुष्य तथा जगत और मनुष्य के नए नए सम्बन्धो की तलाश की बजाय पूर्व में प्रतिपादित कुछ मूलभूत दृष्टि और स्थापित वैचारिक ढाँचे का ही बार बार नवीन हामी ही क्यों रहा।
दर्शन मनुष्य से बड़ा नही है किंतु भारत मे इस दृष्टि का जन्म क्यो नही हो पाया जिसमे मनुष्य के अस्तिव को दर्शन के ऊपर स्थापित किया जाय। 
विचारों में परिवर्तन, वैचारिक ढाँचों में परिवर्तन बदलती परिस्थितियों के सूचक होते हैं। भारत मे एक ही वैचारिक ढाँचे और फिर मात्र बौद्ध धारा में एक नवीन वैचारिक फ्रेमवर्क का आना क्या इस बात की ओर ईशारा नही करता कि भारतीय समाज पश्चिमी समाज की तुलना में गत्यात्मक नही था?
राजनैतिक उठापठक, साम्राज्यों का आना और जाना अलग बात है और सामाजिक गत्यात्मकता और बात।】

Wednesday, January 22, 2020

मजहब और धर्म की मतिग्रस्तियाँ

यदि अब्राहमीय मजहबों में एकेश्वरवाद को लेकर मतिग्रस्ति है तथा ईश्वर और मनुष्य के मध्य मध्यस्थता एक आवश्यक तत्व है जिसके आधार पर जगत की विविधता को नष्ट करते हुए इन तत्वों के नाम पर कई सभ्यताओ के संहार को न्यायोचित ठहराया जाता है तो हिन्दू धर्म भी अपने सामाजिक सन्दर्भ में इन नकारात्मकताओं से अछूता नही रहा है। जहाँ रिलीजन में एकेश्वरवाद को लेकर मतिग्रस्ति है वहीं धर्म, वर्णाश्रम धर्म तथा कर्म सिद्धान्त को लेकर व्यामोहित रहा है। कर्म सिद्धान्त और वर्णाश्रम धर्म मे यह संभावना उपस्थित है कि व्यक्ति अतिशय भाग्यवादी बन जाता है तथा वर्ण जन्मना बन कर व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य विभेद स्थापित करता है।
सामाजिक सन्दर्भ में धर्म या रिलीजन प्रायः अपनी श्रेष्ठता के दावा का करण बन कर भी उभरे हैं। रिलीजन में विस्तारवादी प्रवृति होने के कारण जहाँ इसके नाम पर अपनी श्रेष्ठता का दावा अन्य धर्मो, संस्कृतियों एवम सभ्यताओ के दमन के रूप में उपस्थित है वही धर्म मे विस्तारवादी प्रवृति की अनुपस्थिति के कारण अपनी श्रेष्ठता के दावा को अभिव्यक्त करने के लिए एक आंतरिक विभेद और अंत:मुखी विस्तारवाद उपस्थित है जिसका परिणाम समाज के एक वृहत हिस्से का अमानवीयकरण रहा है। अमानवीयकरण को कर्म सिद्धान्त द्वारा न्यायोचित ठहराना एक ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में उपस्थित है।

Tuesday, January 21, 2020

वामपंथ क्या है?



लेखक परिचय: ईश मिश्रा 
रिटायर्ड एशोशिएट प्रोफेसर (दिल्ली विश्ववि●)
शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे●एन●यू
एक क्रांतिकारी, लेखक, ब्लॉगर।
आपके ब्लॉग को यहाँ से एक्सेस किया जा सकता है:
आपका फेसबुक लिंक:
https://www.facebook.com/mishraish
वामपंथ
(एक)
वामपंथ यथास्थिति में जनपक्षीय परिप्रेक्ष्य से परिवर्तन की विचारधारा है तथा दक्षिणपंथ यथास्थिति की हिमायत में पुरानपंथी पारंपरिक परिप्रक्ष्य से परिवर्तन के विरोध की विचारधारा है। इस नाम से वाम-दक्षिण यद्यपि संयोगात परिभाषित हुआ 1789 में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान, लेकिन यथास्थितिवादी और परिवर्तनकामी अवधारणाओं के रूप में इनकी जड़े, समतामूलक आदिम समाजों के विघटन तथा सभ्यता के इतिहास की शुरुआत तक जाती हैं। क्रांति की ही तरह प्रतिक्रांति भी निरंतर प्रक्रिया है। वर्णाश्रम के विरुद्ध बौद्ध क्रांति शुरुआत में यूरोप के प्रबोधन (एनलाइटेनमेंट) आंदोलन की तरह बौद्धिक  क्रांति थी जो मौर्यकाल में राजनैतिक प्रश्रय के चलते दीर्घजीवी राजनैतिक-सामाजिक क्रांति में तब्दील हो गयी। जिसके विरुद्ध ब्राह्मणवादी (वर्णाश्रमी) प्रतिक्रांति पुष्यमित्र शुंग के समय से शुरू होकर शंकराचार्य तक चली। हर क्रांति और प्रतिक्रांति को बरकरार रखने के लिए उसकी बौद्धिक पुष्टि के दर्शन और विचारधारा की आवश्यकता होती है, ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि के लिए पुराण रचे गए।
अतः हम देखते हैं कि वाम-दक्षिण संदर्भ विशिष्ट सापेक्ष कोटियां हैं। उपनिवेशवाद के विरुद्ध पूरी कांग्रेस वामपंथ की प्रतिनिधि थी लेकिन कांग्रेस के अंदर भी वाम-दक्षिण थे। फ्रांसीसी क्रांति से तीन धाराएं निकलीं -- नेपोलियन के नेतृत्व में दक्षिणपंथ तथा समानता की साजिश के सिद्बधांतकार ब्वायफ के नेतृत्व में अतिवामपंथ तथा ब्लांक के नेतृत्व में मध्यमार्गी समाजवाद जिसे बाद में एंगेल्स ने यूटोपियन समाजवाद कहा। 19वीं सदी के मध्य (1848 की क्रांति) में मार्क्स-एंगेल्स द्वारा कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो (1848) के प्रकाशन के बाद मार्क्सवाद वामपंथ की विशिष्ट धारा के रूप में विकसित होना शुरू हुआ। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भगत सिंह की एचएसआरए, कम्युनिस्ट तथा कांग्रेस सोसलिस्ट, वामपंथ की 3 सापेक्ष धाराएं थीं। (जारी) इस तरह देखें तो जो भी परंपरा तथा कठमुल्लेपन के विरुद्ध परिवर्तन का पक्षधर है वह वामपंथ की व्यापक कोटि में आता है। 

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वामपंथ
(दो)
 
1848 में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टों के प्रकाशन के बाद मार्क्स तथा मार्क्सवाद वामपंथ के संदर्भ विंदु बन गए। 1864 में मजदूरों के प्रथम अंतरराष्ट्रीय संगठन (फर्स्ट इंटरनेसनल) में 3 प्रमुख धाराएं थीं, गुप्त सशस्त्र साजिश से सत्ता पर कब्जा करके अर्थव्यवस्था संशोधित करने के हिमायती, 'समानता की साजिश' के सिद्धांत वाले फ्रांसीसी क्रांतिकारी ब्लांकी के समर्थक, प्रूदों तथा बकूनिक के अराजकतावादी समर्थक तथा वर्गचेतना से लैस सर्वहारा क्रांति के प्रतिपादक मार्क्स-एंगेल्स एवं उनके समर्थक। अराजकतावादी पेरिस कम्यून (1871) तक प्रमुख क्रांतिकारी ताकत थे। मार्क्स  और मार्क्सवाद की चर्चा के साथ अराजकतावाद पर संक्षिप्त चर्चा वाजिब है। दूसरे इंटरनेसनल (1889) के बाद से वामपंथ की सारी धाराएं मार्क्सवाद को अपना वैचारिक श्रोत मानने लगीं, जैसे इस समय कई संगठन मार्क्सवाद की विचारधारा के दावेदार हैं, पांड़ौ में पांड़ा (पांडेय  में पांडेय) की तर्ज पर भांति-भांति के लाल हैं तथा सब अपने को ही असली क्रांतिकारी मानते हैं। (जारी)

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वामपंथ
(तीन)

वामपंथ की इस  चर्चा में मार्क्सवाद पर आते हैं, बीच के विकास क्रम को छोड़ते हुए। 1848 में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टों के प्रकाशन के बाद मार्क्स तथा मार्क्सवाद वामपंथ के संदर्भ विंदु बन गए। 1864 में मजदूरों के प्रथम अंतरराष्ट्रीय संगठन (फर्स्ट इंटरनेसनल) में 3 प्रमुख धाराएं थीं, गुप्त सशस्त्र साजिश से सत्ता पर कब्जा करके अर्थव्यवस्था संशोधित करने के हिमायती, 'समानता की साजिश' के सिद्धांत वाले फ्रांसीसी क्रांतिकारी ब्लांकी के समर्थक, प्रूदों तथा बकूनिक के अराजकतावादी समर्थक तथा वर्गचेतना से लैस सर्वहारा क्रांति के प्रतिपादक मार्क्स-एंगेल्स एवं उनके समर्थक। अराजकतावादी पेरिस कम्यून (1871) तक प्रमुख क्रांतिकारी ताकत थे। मार्क्स  और मार्क्सवाद की चर्चा के साथ अराजकतावाद पर संक्षिप्त चर्चा वाजिब है। दूसरे इंटरनेसनल (1889) के बाद से वामपंथ की सारी धाराएं मार्क्सवाद को अपना वैचारिक श्रोत मानने लगीं, जैसे इस समय कई संगठन मार्क्सवाद की विचारधारा के दावेदार हैं, पांड़ौ में पांड़ा (पांडेय  में पांडेय) की तर्ज पर भांति-भांति के लाल हैं तथा सब अपने को ही असली क्रांतिकारी मानते हैं।

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वामपंथ
(चार)

19वीं सदी के उत्तरार्ध के   दौर में समाजवाद की प्रमुखतः 4 धाराएं थीं, जो कभी समानांतर होतीं तो कभी उनका संगम भी होता।
1. राज्य समाजवाद: सामाजिक-जनतंत्रवाद (सोसल डेमोक्रेसी) की बुनियाद
लुई ब्लांक ने नेतृत्व वाला संसदीय समाजवाद या राज्य समाजवाद, इस दौर में अप्रासंगिक सा हो गया था।  लुई बोनापार्ट संसद से सत्ता हासिल कर संसद भंग कर दी थी। इसलिए चुनाव के जरिए सत्ता हासिल कर जनपक्षीय कानूनों और राज्य मशीनरी से समतामूलक समाज की संभावनाएं नदारत थीं। फ्रांस में सेंट सिमोन और फूरियर के सहकारितावादी अनुयायी संसदीय रास्ते से सत्ता हासिल कर अर्थव्यवस्था पुनर्गठित करने के पैरोकार थे। इस धारा के प्रमुख प्रतिनिधि लुई ब्लांक थे जिनके बारे में ऊपर बताया गया है कि शासन पर बोनापार्ट के एकाधिकार स्थापित होने के बाद जिन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा। यूरोप के कई देशों और अमेरिका में कई समाजवादी सांसद भी बने लेकिन मजदूरों की हालत दयनीय बनी रही। समाजवादियों से निराश मजदूरों ने अराजकतावाद का दामन थामा। 1886 में शिकागो के टेक्सटाइल मजदूरों के ऐतिहासिक आंदोलन समेत ज्यादातर मजदूर आंदोलन अराजकतावादियों के नेतृत्व में हुए। 1 मई 1886 को अमेरिका के मजदूर संघों ने मिलकर निश्चय किया कि वे 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेंगे। जिसके लिए संगठनों ने हड़ताल की थी। इस हड़ताल के दौरान शिकागो की हेयमार्केट में बम ब्लास्ट हुआ। जिससे निपटने के लिए पुलिस ने मजदूरों पर गोली चला दी जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए। हेयमार्केट के शहीदों को श्रद्धांजलि के रूप में दुनिया भर में एक मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। इंगलैंड में मजदूर संगठन उदारवाद के प्रभाव में चले गए और ओवेनवादी समाजवादियों का अगला संस्करण, फाबियनवाद 1880 के दशक में उभरा। इसमें और शासकवर्ग की अन्य पार्टियों में कोई गुणात्मक फर्क नहीं रहा जैसे कि आज लेबर पार्टी और टोरी पार्टी में या जैसे भारत की संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों और शासक वर्ग की संसदीय पार्टियों में कोई गुणात्मक फर्क नहीं रह गया है । संसदीय या संशोधनवादी समाजवादियों के भविष्य के बारिस समाजिक जनतंत्रवादी और हिंदुस्तान की सोसलिस्ट पार्टियां हैं, जिनकी और उनके साथ इनकी भी थोड़ी और चर्चा अगले लेखों में होगी।

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वामपंथ
(चार-क)

जैकोबिनवाद: समानता का षड्यंत्र
दूसरी धारा, फ्रांसीसी क्रांति से निकली बब्वॉयफ की साम्यवादी विरासत के दावेदारों की थी जो पहली क्रांति के जैकोबिन की तर्ज पर गुप्त षड्यंत्र के जरिए सत्ता पर कब्जाकर सत्ता और आर्थिक व्यवस्था का समाजीकरण करना चाहते थे। 1793 में जैकोबिनों के सत्ता से हटने और डायरेक्टरी शासन द्वारा उनके प्रमुख नेताओं की हत्या के बाद, बचे-खुचे अनुयायियों ने मार्गदर्शन के लिए बब्वॉयफ का रुख किया। भूमगत जैकोबिनों ने बब्वॉयफ के संगठन समानता का षड्यंत्र के साथ गठबंधन कर तख्तापलट की योजना बनाई किंतु एक गद्दार की मुखबिरी से विद्रोह के पहले ही सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर व्यापक रक्तपात की योजना के आरोप में मुकदमा चलाया गया और बव्वॉयफ समेत कई प्रमुख नेताओं को मृत्युदंड दिया गया। इस धारा के प्रमुख प्रतिनिधि ब्लांकी थे, जिनके बारे में पहले बताया जा चुका है। उन्हें 1848 के सर्वहारा विद्रोह के पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और 1871 में पेरिस के मजदूरों के विद्रोह के पहले ही, बोनापार्ट के शासन के पतन के बाद बनी सरकार ने धोखे से गिरफ्तार कर लिया था। जिसके बारे में आगे बात की जाएगी। 1848 की क्रांति के पहले और बाद में ब्लांकी के नेतृत्व वाली समाजवाद की इस धारा की योजना क्रांतिकारी नेताओं के एक समूह द्वारा सत्ता पर कब्जा करके एक क्रांतिकारी सरकार की स्थापना के बाद यथासंभव जल्दी-से जल्दी 1793 में रद्द के गए जैकोबिन संविधान के अनुसार संसद का चुनाव कराना था। लेकिन वे चुनाव के पहले सभी संपत्तियों का अधिग्रहण कर पुनर्वितरित तथा संपत्ति के सामूहिक स्वामित्व तथा उपभोग की प्रणाली लागू करना चाहते थे। प्रकृति की संपदा पर सबके समान अधिकार के सिद्धांत के आधार पर पूंजीपतियों की संपत्ति का अधिग्रहण कर उन पर सामूहिक स्वामित्व की स्थापना उनके कार्यक्रम की बुनियाद थी। देश को नई प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटकर अधिग्रहित संपत्ति का प्रबंधन, आम मजदूर के समान वेतन पर निर्वाचित अधिकारी करेंगे। यह योजना 1871 के अल्पजीवी पेरिस कम्यून में लागू की गयी थी। 1864 में गठित पहले अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन कामगरों का अंतर्राष्टीय संगठन (पहला इंटरनेसनल) के गठन में ब्लांकी के अनुयायी भी शामिल थे। ब्लांकी समता के अधिकार को प्रगति का आधार मानते थे। वे इतिहास की व्याख्या समता और विशेषाधिकारों के बीच, यानि गरीबी और अमीरी के बीच संघर्ष के इतिहास के रूप में करते हैं, जिसे मार्क्स और एंगेल्स ने वर्ग-संघर्षों का इतिहास कहा। वे विशेषाधिकार की तुलना में समता की नैतिक, बौद्धिक श्रेष्ठता के आधार पर समाजवाद की विजय को अवश्यंभावी बताते हैं।
ब्लांकी, निजी संपत्ति और ‘स्वतंत्र’ श्रम शक्ति की माल के रूप में उपलब्धता के सिद्धांतों पर आधारित, जड़ जमाते पूंजीवादी उत्पादन के सामाजिक संबंधों और समाजवाद की वैज्ञानिक समझ के अभाव के बावजूद, एक उत्साही क्रांतिकारी थे। उदारवादियों की मनुष्य की स्वार्थी और आत्मकेंद्रित अवधारणा के विपरीत वे उसकी अंतरात्मा की पुकार और उसके नैतिक पक्ष पर जोर देते हैं। वे वैज्ञानिक शिक्षा और विज्ञान के विषयों की शिक्षा को साम्यवाद प्राप्ति का अचूक हथियार मानते थे। ‘यदि फ्रांस के 3 करोड़ 80 लाख नर-नारी एक-बैग वैज्ञानिक बन जाएं तो एक महीने में साम्यवाद की स्थापना की जा सकती है। ब्लांकी अगर आज होते तो यह देखकर सर पकड़ लेते कि संकीर्णतावादी राष्ट्रोंमाद की अगली कतारों में विज्ञान के विषय पढ़े लोगों की बहुतायत है। अगस्त ब्लांकी के लिए साम्यवाद राष्टीय नहीं अंतर राष्ट्रीय मसला है। 1850 में उन्होने इंगलैंड के चार्टिस्टों से कम्युनिस्ट लीग के साथ मिल कर आंदोलनों की योजना बनाया था। 1861 में उनकी गिरफ्तारी के विरुद्ध विरोध प्रदर्शनों में मार्क्स ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 1789 की क्रांति और बब्वॉयफ के ‘समानों का घोषणापत्र’ से प्रेरित समाजवाद की इस साम्यवादी धारा की चर्चा समाप्त करते हैं, इसका जिक्र दुबारा पहला इंटरनेसनल और पेरिस कम्यून की चर्चा के साथ फिर होगा क्योंकि दोनों में ही ब्लांकी के समर्थकों की उल्लेखनीय भूमिका थी। कम्यून के पतन के बाद ब्लांकी के समर्थक भी क्रांति के जैकोबिनवादी तरीकों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाने लगे थे।


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वामपंथ
(पांच)


तीसरी धारा अराजकतावाद की थी
अराजकतावाद
महात्मा गांधी प्रबुद्ध (एंलाइटेंड) अराजकता के पक्षधर थे किंतु सामाजिक प्रबुद्धता के अभाव में व्यवस्थित अराजकता पर आधारित, ग्राम को मूल राजनैतिक इकाई पर केंद्रित, विकेंद्रित सामुद्रिक वृत्त का राजनैतिक सिद्धांत दिया। गांधी का व्यवस्थित अराजकतावाद रूसो और 19वीं शताब्दी के अराजकतावादी दर्शन और आंदोलन की छाप छोड़ता है। उदारवाद राज्य को आवश्यक बुराई मानता है तथा अराजकतावाद इसे अनावश्यक बुराई मानता है। यह स्वैच्छिक संस्थाओं पर आधारित आत्म-शासित समुदायों की पक्षधरता का राजनैतिक दर्शन है। राज्यवाद या राज्य की केंद्रीकृत शासन व्यवस्था का विरोध इस दर्शन का केंद्रीय विंदु है किंतु यह जीवन के हर क्षेत्र में और मनुष्यों के बीच हर संबंध में सत्ता या श्रेणीबद्धता का विरोधी है। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के विभिन्न धड़े एक दूसरे पर अराजक होने का आरोप लगाते रहे थे। यद्यपि इस अवधारणा का प्रयोग 19वीं शताब्दी के शुरुआती सालों के क्रांतिकारियों, खासकर विलियम गॉडविन और विल्हेम वाल्टिंग के विचारों में देखा जा सकता है, यद्यपि उन्होने ने न खुद को अराजक कहा न अपने विचोरों को अराजकतावाद। पियरे-जोसेफ प्रूदों पहले स्वघोषित अराजक विचारक थे यद्यपि इसकी जड़ें रूसो की समतामूलक स्वतंत्रता तक जाती हैं। रूसो और प्रूदों में एक और समानता यह है कि दोनों ही औपचारिक शिक्षा से वंचित स्व-शिक्षित/प्रशिक्षित दार्शनिक थे। रूसो और यूटोपियन समाजवादियों की ही तरह प्रूदों का भी जीवन और विचार अपनी विसंगतियों तथा तरविरोधों के बावजूद काफी रोचक है लेकिन यहां विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं है। साधारण गरीब परिवार में पले प्रूदों ग्रामीण समाज की पारंपरिकता को आदर्श मानते थे तथा नारियों के बारे में भी उनके विचार रूसो की ही तरह प्रतिगामी थे। 1940 में उन्होने संपत्ति क्या है? उन्होने समाज में स्वस्फूर्त व्यवस्था का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इस सवाल का जो उत्तर उन्होंने दिया कि सम्पत्ति चोरी है, वह रूसो के असमानता पर विमर्श में पहले ही मौजूद है। संपत्ति के चलते असमानता को सब बुराइयों की जड़ बताने के बाद रूसो कहते हैं कि कानून ने डकैती को कानूनी अधिकार में तब्दील कर दिया।  वे व्यवहारिक रूसोवाद से ऊपर न उठ सके, यद्यपि रूसो को वे जेनेवन नौटंकीबाज कहते थे। प्रूदों वैसे किसी भी लेखक के बारे में प्रशंसा का कोई शब्द नहीं बोलते थे। मार्क्स की सर्वहारा केंद्रित सोच का मजाक बनाते हुए उन्होने गरीबी का दर्शन लिखा। इसका सार यह था कि लोगों को उपयोगी मूल्य चाहिए लेकिन बाजार व्यवस्था उन्हें विनिमय मूल्य प्रदान करता है। वे छोटे-छोटे उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच वस्तु के निर्माण में लगे श्रम के आधार पर विनिमय के हिमायती थे। मार्क्स ने उसके जवाब में कालजयी पुस्तक, दर्शन की गरीबी लिखा जो मार्क्सवाद के विकास में मील का पत्थर है। प्रूदों एवं अन्य प्रमुख अराजक चिंतकों, खास कर बकूनिन और क्रोपोत्किन के विचारों के बारे में बाकी चर्चा अगले लेख में,  प्रथम इंटरनेसनल के विमर्शों और गतिविधियों की चर्चा के साथ की जाएगी।
इंटरनेसनल की स्थापना में कम्युनिस्टों (क्रमशः मार्क्स और ब्लांकी के समर्थक) के अलावा अराजकतावादियों की भूमिका अहम थी। इस धारा के विचारकों और नेताओं में फ्रांस के प्रूदो और रूस के बकूनिन तथा क्रोपोत्किन प्रमुख थे. दूसरी कम्युनिस्ट, मार्क्स और एंगेल्स जिसके प्रमुख विचारक और नेता थे। अराजकतावादी दर्शन का मूल, प्रूदों के एक उद्धरण से समझा जा सकता है, ‘मेरे ऊपर शासन के लिए हाथ रखने वाला अत्याचारी और लुटेरा है, उसे मैं अपना दुश्मन घोषित करता हूं’। मार्क्सवाद की ही तरह अराजकतावाद भी राज्यविहीन समाज की स्थापना का पक्षधर है लेकिन अराजकतावाद राज्य को समाप्त करने का हिमायती था साम्यवाद उन हालात का जिन पर राज्य टिका है, वह अपने आप बिखर जाएगा। उसी तरह जैसे मार्क्सवाद धर्म को नहीं समाप्त करना चाहता बल्कि उन हालात का जो धर्म की जरूरत पैदा करते हैं, धर्म अपने आप अप्रासंगिक हो जाएगा। मार्क्स और एंगेल्स तथा अराजकतावादियों में तमाम मुद्दों पर दार्शनिक और राजनैतिक मतभेद थे लेकिन ऐतिहासिक जरूरतों और शोषण-दमन से मुक्त समतामूलक समाज के साझे मकसद के चलते दोनों साथ आए और कामगरों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना से साबित किया कि मजदूरों की अंतर्राष्ट्रीयता महज सैद्धांतिक नहीं व्यावहारिक भी है। अराजकतावाद की चर्चा इसके 3 प्रमुख क्रांतिकारी चिंतकों – प्रूदों, बकूनिन और क्रोपोत्कीन के विचारों तथा कामों की चर्चा के बगैर अधूरी रह जाएगी, जो अगले लेख में की जाएगी।

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वामपंथ
(छह)

वाम की चौथी और प्रमुख धारा·मार्क्सवाद है।
मार्क्सवाद: वर्ग-संघर्ष की राजनीति
मार्क्स एक क्रांतिकारी बुद्धिजीवी थे जो पूंजीवादी विकास के शोषण-दमनकारी व्यवस्था को बदलना चाहते थे जिसके लिए पूंजीवाद के गतिविज्ञान के नियमों की वैज्ञानिक समझ जरूरी थी। इसकेलिए उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवादी उपादान का अन्वेषण किया। यहां ऐतिहासिक या द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर विस्तृत चर्चा की गुंजाइश नहीं है। लेकिन चूंकि रूसी क्रांति के बाद मार्क्सवाद और वर्ग संघर्ष क्रांतिकारी सोच के पर्याय बन गए इसलिए कुछ प्रमुख अवधारणाओं और निष्कर्षों पर चर्चा जरूरी है। मार्क्स का अनुमान था कि क्रांति विकसित पूंजीवादी देशों से शुरू होगी जहां पूंजीवाद विकास चरम पर होगा तथा पूंजीवादी अंतर्विरोध परिपक्वता के चरण में। क्रांतिकारी परिवर्तन में दो कारक होते हैं, आंतरिक और वाह्य। पूंजीवादी अंतरविरोधों की परिपक्वता यानि पूंजीवाद का संकट आंतरिक कारक है तथा सत्ता पर काबिज़ होने को वर्गचेतना से लैस सर्वहारा का संगठन, वाह्य। दर्शन की दरिद्रता (पॉवर्टी ऑफ फिलॉस्फी) में मार्क्स लिखते हैं, “आर्थिक हालात ने देश लोगों को मजदूर बना दिया। पूंजी के आग़ाज ने इस जनसूह के लिए एक सी स्थियां तथा साझे की हित को जन्म दिया। इस तरह यह जनसमूह पहले से ही पूंजी के विरुद्ध अपने आप में एक वर्ग है, लेकिन अपने लिए नहीं। संघर्ष के दौरान, जिसके कुछ ही चरणों की चर्चा की है, यह समूह संगठित होकर अपने लिए वर्ग बन जाता है. जिन हितों की यह रक्षा करता है वे वर्ग हित हैं। लेकिन वर्ग के विरुद्ध संघर्ष राजनैतिक संघर्ष है”।
ऐतिहासिक भौतिकवाद इतिहास को समझने का वह वैचारिक दृष्टिकोण है जो “सभी प्रमुख ऐतिहासिक परिघटनाओं का कारण और निर्देशक शक्तियों की उत्पत्ति समाज के आर्थिक विकास में; उत्पादन पद्धति में परिवर्तनों और विनिमय और परिणाम स्वरूप विभिन्न वर्गों में समाज का विभाजन और वर्ग संघर्ष में निरूपित करता है” (फ्रेडरिक एंगेल्स,समाजवाद: वायवी और वैज्ञानिक). ऐतिहासिक भौतिकवाद दर्शन नहीं बल्कि तथ्यपरक विज्ञान है, या यों कहें कि तथ्यपरक प्रमेयों का समुच्च है. जर्मन विचारधारा में मार्क्स स्पष्ट करते हैं कि यह प्रणाली न तो किसी दार्शनिक विचारधारा पर आधारित है न ही किसी स्थापित हठधर्मिता पर बल्कि परिस्थियों की जांच के आधार पर प्रमाणित सटीक विवरण पर आधारित है। दूसरे शब्दों में, यह उन परिकल्पनाओं पर आधारित है जिन्हें तथ्य-तर्कों के आधार पर प्रमाणित किया जा सके। मार्क्स, राजनैतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा में एक योगदान की बहुचर्चित प्रस्तावना में लिखते हैं कि उत्पादन का सामाजिक रिश्ता, समाज की आर्थिक संरचना की बुनियाद है “जिस पर कानूनी और राजनैतिक अधिरचनाएं खड़ी होती हैं और जिसके मुताबिक सामाजिक चेतना का एक निश्चित स्वरूप का निर्माण होता है”। दूसरी तरफ उत्पादन के सामाजिक संबंध “समाज की भौतिक उत्पादन शक्तियों के विकास के खास चरण पर निर्भर होता है जो कानूनी, राजनैतिक और बौद्धिक प्रक्रियाओं का निर्धारण करता है”। जैसे जैसे उत्पादन शक्तियों का विकास होता है, वे उत्पादन संबंधों के विकास में मौजूदा उत्पादन संबंधों से टकराती हैं. “तब सामाजिक क्रांति का एक युग शुरू होता है”। यह द्वंद्व समाज को विभाजित करता है और, जैसे जैसे यह द्वंद्व लोगों की चेतना में बैठने लगता है, लोग संघर्ष से इस द्वंद्व का “उत्पादक शक्तियों के पक्ष में समाधान करते हैं”। इस निर्णायक के बीज पुराने समाज में ही अंकुरित हो चुके रहते हैं। पूंजीवीदी उत्पादन प्रणाली का निर्माण सामंती उत्पादन संबंधों के खंडहर पर हुआ। मार्क्स के अनुसार, यह अंतिम वर्ग समाज होगा और समाज में प्रागैतिहासिक समानता स्थापित होगी.
दो पेज के दस्तावेज, थेसेस ऑन फॉयरबाक  में मार्क्स कहते हैं कि सत्य वही जो तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित हो। “मनुष्य की चेतना भौतिक परिस्थियों का परिणाम है और बदली चेतना बदली परिस्थितियों की”। लेकिन परिस्थितियां खुद-ब-खुद नहीं बदलतीं, उसके लिए “सचेत मानव प्रयास करना पड़ता है”। इस तरह यथार्थ भौतिक परिस्थियों और चेतना का द्वंद्वात्मक युग्म है। ऐतिहासिक भौतिकवाद पर चर्चा यहीं समाप्त करते हुए, दो शब्द द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर।
मार्क्स अपने समय की दो स्थापित धाराओं को चुनौती देते हैं और उनको जोड़कर एक नया सिद्धांत देते हैं। हेगेल का मानना था कि यथार्थ पूर्णतः या काफी हद तक विचारों से निर्मित है और दृष्टिगोचर जगत विचारों के अदृश्य जगत की छाया मात्र है। मार्क्स द्वंद्वात्मक उपादान के लिए हेगेल का आभार व्यक्त कर इसे आदर्शवाद कह कर खारिज करते हैं। उन्होंने कहा कि हेगल ने वास्तविकता को सर के बल खड़ा किया है उसे सर के बल खड़ा करना है. ऐतिहासिक रूप से वस्तु विचार के बिना रह सकती है लेकिन विचार वस्तुओं से ही निकलते हैं, आलमान से नहीं। न्यूटन के गुरुतवाकर्षण के सिद्धांत से सेबों का गिरना शुरू नहीं हुआ बल्कि सेबों का गिरना देख कर उनके दिमाग में उसका कारण जानने का विचार आया। सेबों के गिरते देखकर ‘क्या’ सवाल का उत्तर दिया जा सकता है, ‘क्यों’ का नहीं।  वैज्ञानिक युग का भौतिकवाद विचारों को सिरे से खारिज करके कहता है भौतिकता ही सब कुछ है, जिसे मार्क्स मशीनी भौतिकवाद कह कर खारिज करते हैं। संपूर्ण यथार्थ वस्तु और विचार से मिलकर बनता है। द्वद्वात्मक भौतिकवाद के नियम हैं: 1. यथार्थ वस्तु और विचार का द्वंद्वात्मक युग्म है. 2. निरंतर क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तन समयांतर में गुणात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन का पथ प्रशस्त करता है. 3. जिसका भी अस्तित्व है उसका अंत निश्चित है जो पूंजावाद के बारे में भी लागू होता है।
मार्क्स-एंगेल्स कम्यनिस्ट घोषणा पत्र के शुरू में ही लिखते हैं कि समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है और कम्युनिस्ट पार्टियों का इतिहास 200 साल से कम। कहने का मतलब यह कि वर्ग समाज में शोषण-उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध सभी आंदोलन वर्ग संघर्ष के ही हिस्से हैं. जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है कि मार्क्स का आकलन था कि क्रांति विकसित पूंजीवादी देश में होगा जहां प्रचुरता का बंटवारा मुद्दा होगा। लेकिन मार्क्स ज्योतिषी नहीं थे। मार्क्स के विकास के चरण के सिद्धांत से इतर मार्क्सवाद की विचारधारा की पहली क्रांति रूस में हुई जहां पूंजीवाद लगभग अविकसित था और सामंती उत्पादन संबंध सजीव थे। औद्योगीकरण के अभाव में किसानों और कारीगरों की संख्या अधिक थी और औद्योगिक सर्वहारा की बहुत कम। किसानों की लामबंदी के लिए ‘जो जमीन को जोते बोए वह जमीन का मालिक होए’ का नारा दिया गया। यहां क्रांति के विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं है, जिसकी चर्चा अगले लेखों में की जाएगी। ईयच कार की बॉल्सेविक क्रांति और जॉन रीड की जिन दस दिनों ने दुनिया हिला दी कालजयी कृतियां इसका सटीक लेखा-जोखा प्रदान करती हैं। इस शताब्दी की शुरआत में लिखी गई ज़ीज़ेक की पुस्तक ऐट द गेट ऑफ रिवल्यूसन में अप्रैल-सितंबर 1917 के दौरान लेनिन द्वारा लिखे पत्रों और पंफलेट्स का संकलन भी काफी सूचनाप्रद है।
प्रथम इंटरनेसनल के बाद से मार्क्स और मार्क्सवाद समाजवादी विमर्श के केंद्र में रहे हैं, इसलिए मार्क्सवाद पर अलग से एक चर्चा वांछनीय है, जो आगे के लेखों में की जाएगी। इस लेख का समापन प्रथम इंटरनेसनल के गठन से करना प्रासंगिक होगा।
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टुशुु, टुशुमनी और एक परम्परा का मिथकीकरण

 


■एक

झारखण्ड के पारसनाथ से छतीसगढ़ के सरगुजा तक और बंगाल के मिदनापुर से उड़ीसा के मयूरभंज तक उनके हिन्दू पहचान के परत को यदि आप उघाड़ते है तो आपको एक ऐसे लोग मिलेंगे जिनकी अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक विशिष्टता है। इस विशिष्टता का आधार है धान; इस विशिष्टता का आधार है पथरीली ज़मीन को अपने पसीने से सींच कर धान पैदा करने की कूवत।
जी हाँ मैं कुडमियों की बात कर रहा हूँ। वर्तमान में कुड़मी हिन्दू धर्म के अंतर्गत एक अन्य पिछड़ी जाति के रूप में परिभाषित है लेकिन उनके शब्दो में उनकी यह पहचान उनकी संस्कृति-परम्परा के लिए घातक है।
और इसलिलिए आज अपनी इस विशिष्ट सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान को बचाए रखने के लिए वह सरकार से खुद को अनुसूचित जनजाति के रूप में परिभाषित करने के लिए लामबन्द हो रहे हैं।
ध्यातव्य हो की ब्रिटिश राज के 1865 के इंडियन सक्सेसन एक्ट के अंतर्गत ये नोटिफाइएड ट्राइब के रूप में परिभाषित थे।
पुनः 1913 में इनकी पहचान एक आदिम जनजाति की थी लेकिन 1950 की जनगणना में उन्हें जनजातीय श्रेणी से बाहर कर दिया गया।
सन 2004 में झारखण्ड सरकार ने उन्हें अन्य पिछड़े वर्ग की श्रेणी से हटाकर जनजाति की श्रेणी में रखने की अनुसंशा की।
झारखण्ड सरकार अपनी अनुसंशा को यथार्थ रूप कब देती है यह तो समय बताएगा फिलहाल हम इनकी संस्कृति, इनकी परम्परा को समझने का प्रयास करने के क्रम में सर्वप्रथम टुशु पर्व की बात करते हैं।

टुशु पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है, उसके साथ एक मिथक किसी काल क्रम में जोड़ दिया गया कि यह टुशुमनी नामक एक कुड़मी कुमारी कन्या के प्रणोत्सर्ग की याद के रूप में मनाया जाता है।
इस मिथक का कुड़मी समाज के द्वारा विरोध किया जाता है । उनका कहना है कि यह मिथक उनके इतिहास को विकृत करने का एक षड्यंत्र है क्योंकि यह कथा की 'एक दैवीय आभा युक्त कुड़मी कन्या थी जिस पर बाहर देश का कोई राजा मुग्ध हो गया और अपने स्मिता की रक्षा करने के लिए उस कन्या ने अपने दामोदर/ स्वर्णरेखा नदी के कूद कर प्रणोत्सर्ग कर दिया' उनकी विशिष्ट पहचान मिटाने के उद्देश्य से है।

सम्भवतः कुडमियों द्वारा पथरीली-पठारी ज़मीन को खेती योग्य बनाई गई भूमि थी। उसकी दैवीय आभा, उस जमीन की उर्वरा शक्ति। बहरी राजा किसी बाहरी की इस भूमि पर गिद्ध दृष्टि और प्रणोत्सर्ग उस भूमि की रक्षा के लिए कुडमियों को कमर कसने का सन्देश लेकिन, जब कुड़मी समाज के एक प्रबुद्ध व्यक्ति से बात हुई तो उन्होंने बताया कि यह मिथक कुड़मी समाज के अंदर से आई ही नही है। इस मिथक का जन्म किसी अन्य समाज ने किया है ताकि इस परम्परा की प्राचीनता को खत्म कर इसे मुगल आक्रमण के आस पास स्थापित किया जा सके।
अब यदि यह मिथक कुड़मी समाज के अंदर से उत्तपन्न नही है तो मेरी इस मिथक को व्याख्या करने की दृष्टि स्वतः ख़ारिज हो जाती है।

एक फोकलोर और कल्चर के अध्येता को प्रथम दृष्टया यह लग सकता है कि दिव्य आभा से युक्त कुड़मी कन्या,  बाहरी राजा, आकर्षण, विवाह का प्रस्ताव, प्रणोत्सर्ग द्वारा एक जमीन के प्रति, (उस जमीन के प्रति जो पथरीली और उबड़ खाबड़ थी और जिसको आज के कुडमियों के पुरखों ने अपनी मेहनत से खेती योग्य बनाया) लगाव पैदा करते हुए इस मिथक के माध्ययम से भावात्मक अपील की गई है कि अपनी टुशुमनी के प्रति जागरूक बनो अन्यथा बाहरी राजा की गिद्धदृष्टि के कारण हर टुशुमनी को अपनी जान देंनी पड़ेगी।

लेकिन नही कहानी कुछ और है और यह कहानी कुड़मी, धान की खेती और उनकी धान के इर्द गिर्द विकसित एक अपनी और विशिष्ट पहचान देने की शृंखला में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और कुड़मियो कि इस विशिष्ट पहचान के साथ न्याय होनी चाहिए●●●●●


Monday, January 20, 2020

Ish Mishra सर द्वारा. ( पाठ 1 से 10 )


पाठ 1

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद 1

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को मार्क्सवाद का दर्शन कहा जाता है जिसका मार्क्सवाद के विज्ञान, ऐतिहासिक भौतिकवाद के साथ पारस्परिक पूरकता और पुष्टि के संबंध है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का एक नियम है कि प्रकृति की संरचना द्वंद्वात्मक है तथा उसकी गति वस्तु तथा विचार की द्वंद्वात्मक एकता से संचालित होती है। इस द्वंद्वात्मक युग्म में प्राथमिकता वस्तु की होती है। वस्तु से विचार पैदा होता है, विचार से वस्तु नहीं। वस्तु विचार के बिना रह सकती है तथा ऐतिहासिक रूप से विचार की उत्पत्ति वस्तु से होती है। 

इब्ने इंशा ने ‘उर्दू की आखिरी किताब’ में लिखा है कि न्यूटन ने सेब तोड़ने के लिए गुरुत्वाकर्षण नियम का आविष्कार किया। अच्छा, स्वस्थ, व्यंग्य लिखना सबके बस की नहीं है। इब्ने इंशा शायरी भी व्यंग्य में ही करते हैं, “हक अच्छा पर हक के लिए कोई और लड़े तो और अच्छा” पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह, जियाउल को जनता को उनका यह नेक संदेश खतरनाक लगा। हर फासीवादी या तानाशाह विचारों से डरता है, खासकर उनकी व्यंग्य या कार्टून में अभिव्यक्ति से। वह नरपिशाच इतना घबरा गया कि इब्ने इंशा में जेल में ठूंस दिया, करो अब शायरी। शायरी तो वे तब भी करते रहे, लेकिन जेल की तकलीफों ने ज़िंदगी कम कर दी। ‘राष्ट्रवाद’ के रहस्य उजागर करने के राष्ट्र-द्रोह में हबीब जालिब का भी वही हश्र हुआ। वे लोगों से कह रहे थे, “हिंदुस्तान भी मेरा है, पाकिस्तान भी मेरा है/दोनों ही देशों में लेकिन अमरीका का डेरा है” ; “न मेरा घर है खतरे में न तेरा घर है खतरे में/ वतन को कुछ नहीं खतरा, निजाम-ए-जर है खतरे में”; और तो और, “गर फिरंगी का दरवान होता..................... वल्लाह, सदर-ए-पाकिस्तान होता”। टेक्स्ट के बीच में लंबे फुट के लिए मॉफी।

न्यूटन के नाम पर इब्ने इंशा याद आ गए, जिया का डर बेबुनियाद नहीं था। अरे भाई सेब तो अनादि काल से गिरते रहे हैं। सेब के गिरने की भौतिक घटना (वस्तु) को गिरते देख न्यूटन के दिमाग में सवाल आया क्यों? और वे वस्तुओं के ऊर्ध्वाधर पतन के कारणों की खोज में लग गए। तमाम प्रयोगों के जरिए उन्होंने गुरुत्वाकर्षण के नियमों का आविष्कार किया, जिससे हम किसी भी निश्चित मात्रा की किसी ऊंचाई से गिरने के किसी भी विंदु पर उसके वेग, त्वरण, गतिज ऊर्जा तथा तद्जनित बल की बिल्कुल सही सही गणना कर सकते हैं। न्यूटन के नियमों के पहले सेब गिरने की भौतिक घटना (वस्तु) की व्याख्या में महज क्या? सवाल का जवाब दे सकते थे, क्यों?; कैसे?; और कितना? का नहीं। यह अपूर्ण यथार्थ था, न्यूटन के नियमों ने उसे संपूर्णता प्रदान की। दूसरे शब्दों में कहें तो यथार्थ वस्तु और विचार का मिलन है, जिसे मार्क्सवादी शब्दावली में, द्व्वंद्वात्मक एकता कहते हैं। विचार और वस्तु एक दूसरे के पूरक हैं।

थेसेस ऑन फॉयरबाक में मार्क्स लिखते हैं, चेतना भौतिक परिस्थितियों का परिणाम है और बदली हुई चेतना बदली हुई परिस्थितियों की। लेकिन न्यूटन के गति के नियम के अनुसार बिना वाह्य बल के कोई वस्तु हिलती भी नहीं। भौतिक परिस्थितियां आपने आप नहीं बल्कि मनुष्य के चैतन्य प्रयास से बदलती हैं। अतः इतिहास की गति का निर्धारण भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक चेतना की द्वंद्वात्मक एकता से होता है, किसी ईश्वर, पैगंबर, अवतार की इच्छा या कृपा-दुष्कृपा से नहीं।

मनुष्य ईश्वर की रचना नहीं है, ईश्वर मनुष्य की रचना है। विकास के हर चरण में मनुष्य अपनी खास ऐतिहासिक परिस्थितियों, खास ऐतिहासिक जरूरतों के हिसाब से अपने शब्द; मुहावरे; कहावतें; किंवदंदियां; उपमा-अलंकार; अतिशयोक्तियां अफवाहें; धर्म और ईश्वर की अवधारणाओं की रचना करता है। चूंकि ईश्वर की अवधारणा मनुष्य-निर्मित, ऐतिहासिक अवधारणा है, इसीलिए देश-काल के परिवर्न के साथ इसका स्वरूप बदल जाता है। पहले ईश्वर गरीब और असहाय की मदद करता था अब उसकी करता है जो खुद अपनी मदद कर सके। (सामाजिक डार्विनवाद)।

....... जारी

26.02.2017

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विद्रोह रचनाशीलता की शर्त है; संघर्ष निर्माण का फर्ज है

पाठ 2

मार्क्सवाद क्या है? 2

स्वतंत्रा और मार्क्सवाद 1

पूर्वकथ्य:

पहली क्लास में प्रतिक्रियाओं, सवालों और बहस से प्रोत्साहित हो मुझे लगा कि क्लास ज्यादा नियमित होनी चाहिए। इस पोस्ट पर कुछ लंबे उत्तर मैं अलग से पोस्ट कर देता हूं, उसे भी क्लास का हिस्सा माना जाए। मैं गदगद हूं। विषय पर आने के पहले बता दूं मैं क्यों गदगद हूं? इसका जवाब मैं एक अनुभव से देता हूं। वैसे टेक्स्ट के पहले फुटनोट नहीं होना चाहिए, फिर भी। 1990 के दशक के अंतिम सालों की बात है। मैं मयूरविहार में रहता था, मोटरसाइकिल से चलता था। 9 बजे से एमए की एक क्लास थी जो हफ्ते में 2 ही दिन होती थी। रास्ते में बारिस शुरू हो गयी, रास्ते में कई जगह रुकने की गुंजाइश थी लेकिन समय नहीं था। वैसे भी चोट लगने वाली धार की बारिस न हो तो बाइक में कोई कष्ट नहीं होता। उम्मीद के प्रतिकूल क्लास खचाखच भरी देख बहुत प्रसन्नता हुई रूसो और उपयोगिता वादियों की प्रसन्नता की तुलनात्मक अवधारणाओं पर क्लास थी। पंखे के नीचे शर्ट सूखती रही, पढ़ाने में मजा आता रहा। कुछ करने में आपको मजा आने लगे तो समझिए काम अच्छा हो रहा है। मैंने क्लास के अंत में उन्हें बताया कि यही फर्क है स्व के न्यायबोध को स्व के स्वार्थबोध पर तरजीह देने की प्रसन्नता की रूसोवादी अवधारणा में और खाओ-पिओ-मस्त रहो की उपयोगितावादी अवधारणा में। एक शिक्षक के स्व का न्यायबोध बोधगम्य भाषा में विद्यार्थियों को समझाना और पढ़ने को प्ररित करना। इलाहाबाद के प्रयागराज प्रोफेसरों को क्लास न लेने में सुख मिलता है, यह सुख उपयोगितावादी है। मैं अगर सोफर ड्रिवेन बीयमडब्लू में आता और क्लास खाली या आधी मिलती तो शायद, सुख की जगह दुख मिलता। द्वंद्वात्म भौतिकवाद पर अगली क्लास की तैयारी जब तक करूं, सोचा 2012 में मार्क्सवाद और आजादी के अंतर्विरोध के सवाल के जवाब के रूप में छ साल पहले का लेक्चर दे दूं। मार्क्सवाद और आजादी एक अहम विषय है, इसलिए इस पर अलग से 4-5 क्लासेज की जरूरत पड़ेगी। तब तक कॉपी-पेस्ट: 

मार्क्सवाद व्यक्तिगत आज़ादी का विरोधी नहीं, सभी की वास्तविक व्यक्तिगत आज़ादी का घोर हिमायती होने के ही चलते उदारवादी आज़ादी के भ्रम को तोड़ता है क्योंकि व्यक्ति के स्वायत्त अस्तित्व की अवधारणा एक भ्रम है, कोई भी व्यक्ति गुलाम या मालिक व्यक्ति के रूप मे नहीं बल्कि समाज में, समाज के द्वारा, समाज के स्थापित संबंधों के तहत, समाज के अभिन्न रूप के रूप में वह गुलाम या आज़ाद होता है. व्यक्ति सदा स्वार्थपरक होकर निजी इच्छाओं की पूर्ति को ही जीवन का उद्देश्य मनाता है, यह भी एक पूंजीवादी विचारधारात्मक दुष्प्रचार है. यह आज़ादी औरों से सहयोग की नहीं अलगाव की, दूसरों की आज़ादी की बेपरवाही की, बेरोक-टोक लूट और संचय की अजादी है. सवाल उठाता है क्या किसी परतंत्र समाज में कोई निजी रूप स स्वंतत्र हो सकता है? निजी स्वंत्रता समाज की स्वतंत्रता से जुड़ी है. आज़ाद होना चाहते हैं तो समाज को आज़ाद करें. मेरे विचार से मार्क्सवाद का मूल मंत्र है कि आज़ाद होना चाहते हो तो आज़ाद समाज का निर्माण करो, व्यक्तिगत आज़ादी सामाजिक आजादी का अंग है। 

“किसी भी समाज में श्रमशक्ति और रचनाशीलता को लूटना और खसोटना कह के” मैंने कभी नहीं संबोधित किया. बल्कि सारी समस्ययायें और एलीनेसन श्रमशक्ति और रचनाशीलता पर स्वाधिकार के क्षरण से होता है. श्रमशक्ति के फल पर और अंततः श्रमशक्ति पर खरीददार –पूंजीपति का अधिकार होता है. कोई भी श्रमिक कितना भी अधिक वेतन पाता हो संचय नहीं कर सकता, संचय के भ्रम में रहता है, संचय तो सिर्फ पूंजीपति ही कर सकता है. श्रम-शक्ति को उपभोक्ता सामग्री के दर्जे से मुक्ति दिलाना और उसे रचनाशीलता के रूप मे सम्मानित करना मार्क्सवाद का मकसद है. जी हाँ स्वायत्त अस्तित्व की धारणा विशुद्ध भ्रम है. ऐतिहासिक विकास के दौरान मनुष्य अन्य मनुष्यों के साथ अपनी इच्छा से स्वतन्त्र सम्बन्ध स्थापित करता है. मार्क्सवाद मनुष्य के behavioral aspect को नकारता नहीं बल्कि चेतना के रूप में उसकी वैज्ञानिक व्याख्या करता है. ऐतिहासिक भौतिकवाद, जिसे मार्क्सवाद का विज्ञान कहा जाता है, निरंतर शोध और अन्वेषण के जरये तथ्यों-तर्कों पर आधारित प्रमाणित और सत्यापित किए जा सकने वाले प्रमेयों का समुच्चय है. सत्य किसी पूर्वाग्रह/पोंगापंथ/ईश्वर की इच्छा या मार्क्स के वक्तव्य पर नहीं आधारित है, सत्य वही जो प्रमाणित किया जा सके. विकास के हर चरण की भौतिक परिस्थियां और तदनुसार समाजीकरण के अनुसार मानव चेतना का निर्माण होता है और बदली चेतना बदली भौतिक परिस्थियों का परिणाम है. लेकिन परिस्थियां स्वयं नहीं बल्कि सचेत मानव प्रयास से बदलती हैं. अतः सत्य भौतिक स्थितियों एवं चेतना का द्वंदात्मक संश्लेषण है.

28.02.2012

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संघर्ष और निर्माण

विषय: मार्क्सवाद क्या है?

पाठ 3

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद 2

 द्वद्वात्मक भौतिकवाद पर पहले पाठ के कुछ सवालों के जवाब अगली क्लास के लिए छोड़  दिया था, यह पाठ उन्ही सवालों से शुरू करता हूं। एक मित्र ने पूछा जड़ वस्तु से विचार कैसे पैदा हो सकता है? 

 पाठ 1 में बताया गया था कि विचार हवा से नहीं आते भौतिक वस्तुओं के इंद्रियबोध पर चिंतन से। इमा (मेरी छोटी बेटी), बहुत छोटी थी (3 साल के कम), जिद कर बैठी की उसे फल खाना है। जो भी फल तो “अमरूद नहीं फल”; अंगूर नहीं फल” ........ बड़ी समस्या? मैं उसे लेकर फल लेने निकल पड़ा। एक ठेले पर रसभरी बेचने वाला दिख गया, उसने शायद रसभरी खाया नहीं होगा। मैंने कहा भाई यह एक “झोंपा फल दे दो”, और फल खाकर वह चुप हो गई। अगर रसभरी के बारे में अंगूर की तरह जानती होती, तो मैं क्या खिलाता? फल नाम की कोई ठोस वस्तु तो होती नहीं। फल वस्तु नहीं बल्कि वस्तु का अमूर्त विचार है। अगर आम, अमरूद जैसी विशिष्ट समानधर्मा वस्तुओं का विचार है। यानि सार्वभौमिक, अमूर्त विचार एक खास तरह की विशिष्ट वस्तुओं का सामान्यीकरण (जनरलाइजेसन) है। विशिष्ट से सामान्य की व्युत्पत्ति को आगमात्मक (इंडक्टिव) और सामान्य से विशिष्ट की व्युत्पत्ति को सिद्धांत की निगमात्मक पद्धति कहते हैं। (यह सामान्य जानकारी जानकारों के लिए नहीं है।) यह उदाहरण मैं प्लेटो के विचारलोक का सिद्धांत पढ़ाते समय देता हूं। इमा उसका अब रॉयल्टी मांगती है, मैं उसकी नाजायज मांग मानता नहीं यह अलग बात है। 

पिछले दोनों पाठों में मार्क्स के ‘थेसेस ऑन फॉयरबाक’ के हवाले से बताया गया है कि यथार्थ वस्तु और विचार की द्वंदवात्मक एकता है। इस द्वंद्व को भी न्यूटन के गति के सिद्धांतों से समझा जा सकता है। गति का न्यूटन का दूसरा (शायद, फीजिक्स की किताब छुए 44 साल हो गए) नियम है कि स्थिर वस्तु को गतिमान बनाने के लिए या गतिमान वस्तु को रोकने के लिए वाह्य बल की जरूरत होती है। वस्तु का विचार अस्तित्व में आने के बाद वाह्य बल बन जाता है और इतिहास और वस्तु तथा विचार के निरंतर द्वंद्व से इतिहास आगे बढ़ता है। लते हैं – प्रगतिशील और प्रतिगामी। इतिहास की गाड़ी में रिवर्स गीयर नहीं होता, लेकिन खतरनाक अस्थाई यू टर्न्स आ सकते हैं। लेकिन इतिहास अंततः आगे ही बढ़ता है, पाषाणयुग से साईबर युग तक मानव विकास की यात्रा इसका चश्मदीद गवाह है। 

 गति के न्यूटन के  तीसरे सिद्धांत के अनुसार, हर क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया होती है। प्रतिक्रिया वस्तु की यथास्थिति में बने रहने की जड़ता की होती है, यानि वस्तु के आंतरिक प्रतिरोध की। यथास्थिति की जड़ता की प्रतिक्रिया से अधिक विचारों के प्रगतिशील वाह्य बल लगते हैं तो इतिहास आगे बढ़ता है, वरना अस्थाई जड़ता में जकड़ जाता है। विचार तो अमूर्त है, उसकी मूर्त अभिव्यक्ति मानव के चैतन्य प्रयास में होती है। लौकिक यथास्थिति वस्तु है जिससे निकले विचार वस्तु को बदलने का प्रयास करते हैं। यथास्थिति (वस्तु) से बरकरार रखने  में विशेषाधिकार प्राप्त तत्वों के निहित स्वार्थ जुड़ जाते हैं क्योंकि उन्हें अपने विशेषाधिकार किसी-न-किसी तर्क से समुचित लगते हैं जो इसे बदलने के चैतन्य मानव प्रयासों का विरोध करेंगे। इसी क्रिया-प्रतिक्रिया में उतार चढ़ाव के साथ इतिहास आगे बढ़ता है। मसलन विश्वविद्यालय व्यवस्था प्रोफेसरों की आजीविका का साधन है, इसमें बदलाव का वे विरोध करेंगे। आइए एक और परिचित उदाहरण लेते हैं। हिंदू शब्द ऊंची-नीची जातियों के एक समुच्चय की अभिव्यक्ति है। जातिवाद (यथास्थिति – वस्तु) से विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के निहित स्वार्थ जुड़े हैं, वे इसे बरकरार रखने की कोशिस करेंगे और इसकी विसंगतियों से अवगत जातियां और लोग इसे बदलने की। हमारे छात्र जीवन से अब तक क्रिया-प्रतिक्रिया की यह यात्रा यहां तक पहुंची है कि जहां दलित को अछूत माना जाता था वहां कोई सार्वजनिक मंच से नहीं कह सकता कि वह जात-पांत में विश्वास करता है कितना बड़ा जातिवादी क्यों न हो। वही हाल पित्रिसत्तात्मकता (मर्दवाद) का है। हमारे छात्रजीवन में लोग लड़कों को पढ़ने बार भेजते थे लड़कियों को नहीं। मैंने पहले पाठ के एक सवाल के जवाब में मैंने बताया था कि मुझे अपनी बहन को पढ़ाने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ी थी। लड़की ज्यादा पढ़कर क्या करेगी? कलेक्टरी थोड़े ही करानी है आदि-आदि। लड़कियों की आजादी को लेकर लोगों के दिमाग में एक अजीब अमूर्त भय था (आज भी है)। लेकिन जेंडर समानता के विचार, लड़कों के समान लड़कियों के शिक्षा के अधिकार के विचार और पितृसत्तामक सामाजिक ढांचे के द्वंद्वात्मक क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप आज किसी का साहस नहीं है कि कहे वह बेटा-बेटी में फर्क करता है। एक बेटे के लिए 5 बेटियां भले पैदा कर ले। यह स्त्रीवाद की सैद्धांतिक विजय है। 

उपरोक्त परिचित मिशालों से द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दो नियम निकलते हैं। पहला, परिवर्तन प्रकृति का स्थाईभाव है। निरंतर, क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तन एक अवस्था के बाद क्रांतिकारी, गुणात्मक परिवर्तन की तरफ बढ़ते हैं। मार्क्सवादी शब्दावली में व्यवस्था के अंतर्विरोध परिपक्व हो जाते हैं और क्रांतिकारी गुणात्मक परिवर्तन का पथ प्रशस्त करते हैं। वैसे तो कोई भी परिवर्तन विशुद्ध मात्रात्मक नहीं होता।  स्त्री प्रज्ञा और दावेदारी; दलित प्रज्ञा और दावेदारी का उफान क्रमिक, मात्रात्मक परिवर्तन के ज्वलंत उदाहरण हैं। क्रांति कारी गुणात्मक परिवर्तन तो क्रमशः मर्दवाद और जातिवाद से विनाश के बाद ही होगा। 

आज की क्लास बहुत लंबी हो गयी। मॉफी चाहता हूं। ऊपर जिक्र कर ही दिया तो दूसरे नियम का परिचय दे दूं, विस्तृत चर्चा अगली क्लास में। यह वाद-प्रतिवाद-संवाद (थेसिस-एंटीथेसिस-सिंथेसिस) का चर्चित नियम है। दो विपरीतों के निषेध तीसरा तत्व पैदा होता हैं जो दोनों से भिन्न होता है लेकिन दोनों के तत्व इसमें होते हैं। इसे केमिस्ट्री के हाइड्रोक्लोरिक एसिड (एसिटिक) और सोडयम हाइड्राक्साइड की रासायनिक क्रिया के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।
HCl + NaOH=NaCl+H2O
दो विपरीत रासायनिक गुणों वाले तत्व पारस्परिक निषेध की क्रिया से तीसरे बिल्कुल भिन्न तत्व पैदा करते हैं। शरीर को हानिकरक दो विपरीत तत्वों की द्वंद्वात्क एकता से तीसरा तत्व बना जो जीवन के लिए अनिवार्य है। 

हेगेल और मार्क्स के बारे में एक अच्छा सवाल एक साथी ने पूछा है, उसका जवाब अगली क्लास में, दर-असल तभी क्लास शुरू होगी परिभाषा के साथ, समाज-विज्ञान में परिभाषा अनिवार्य है। वैसे क्लास भूमिका (ओरियंटेसन लेक्चर) से छोटा भी हो सकता है। 

वर्चुअल दुनिया का यह क्लास लंबा हो गया, अब वास्तविक दुनिया के क्लास की तैयारी कर लूं। पहली स्त्री दार्शनिक, मेरी वॉलस्टोनक्रॉफ्ट (1759-1797) के सेक्स और नैतिकता पर विचार पढ़ाना है। मैंने वॉलस्टोनक्रॉफ्ट की जीवनी पर अपना एक लेख (अंग्रेजी में) शेयर किया था, फिर कर दूंगा, यदि कोई साथी हिंदी अनुवाद का समय निकाल सकें तो आभारी रहूंगा।

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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद 
पाठ  7             

पेरिस की सर्वहारा क्रांति (1871) की 
147वीं सालगरह पर

कई दिनों से पाठशाला में औपचारिक क्सास नहीं हुई। ऐतिहासिक और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की जारी चर्चा को मुल्तवी करते हुए, आज का लंबा लेक्चर, पेरिस कम्यून पर। आज के दिन, 18 मार्च 1871 को पेरिस के मजदूरों ने, विश्व गणतंत्र के नारे के साथ सर्वहारा के स्वशासन की स्थापना की जो सर्वहारा की तानाशाही का पहला प्रयोग था। 

पेरिस कम्यून
सर्वहारा की तानाशाही की पहली मिशाल
ईश मिश्र
 आज के दिन, 18 मार्च, 1871, पेरिस के मजदूरों की सशस्त्र क्रांति के बाद सर्वहारा के जनतांत्रिक स्वशासन, पेरिस कम्यून की स्थापना से दुनिया भर की पूंजीवादी ताकतें सकते में आ गयी तथा सनातनी राष्ट्रीय बैर भूल कम्यून के बर्बर दमन में एक हो गए। कम्यून का भी मकसद विश्व गणतंत्र का था। इतिहास की पहली सफल सर्वहारा क्रांति के बाद, पूंजीवादी राज्य मशीनरी को ध्वस्त कर स्थापित सर्वहारा राज्य की पहले पहली मिशाल, पेरिस कम्यून पर क्रांति के भागीदारों और समकालीनों से लेकर आज तक  बहुत लिखा जा चुका है। मार्क्स ने  इंटरनेसनल की जनरल कौंसिल की तरफ से जारी फ्रांस में गृहयुद्ध (सिविल वार न फ्रांस) में इसकी सटीक और विस्तृत, वैज्ञानिक व्याख्या और समीक्षा है। फिर भी कम्यून की संक्षिप्त चर्चा के बिना, बात अधूरी रह जाएगी। कुछ इतिहासकारों ने इसे रूसो के सामूहिक इच्छा (जनरल विल) के सिद्धांत के औद्योगिक युग में रूपांतरण बताया तो कुछ ने वास्तविक सहभागी जनतंत्र की मिशाल। बकूनिन और अनके अराजक अनुयायियों ने इसे राज्यविहीन अराजक समाज के अभियान के कदम के रूप में देखा और एंगेल्स ने सर्वहारा की तानाशाही की जीवंत मिशाल के। कम्यून के ज्यादातर नेता इंटरनेसनल के सदस्य थे, जिनमें ब्लांकी और प्रूदों के अनुयायियों की संख्या काफी थी। जो भी हो पेरिस कम्यून मजदूरों की की पीढ़ियों के लिए मजदूर क्रांति का संदर्भ-बिंदु और प्रेरणा श्रोत बना हुआ है।

 क्रांति पर मार्क्स के विचारों को समझने के दो प्रमुख श्रोत हैं – कम्यनिस्ट घोषणा पश्र और फ्रांस में गृह युद्ध। घोषणा पत्र 1848 की क्रांति के पहले लिखा गया था और भविष्य के अनुमानित वर्गसंघर्ष की रूपरेखा पेश करता है। घोषणापत्र के आक्रामक तेवर की जगह फ्रांस में गृह युद्ध में दो क्रांतियों के अनुभव की परिपक्ता है। यह तब लिखा गया जब वर्ग-संघर्ष का विकास इस स्तर हो चुका था कि इसने कम्यून की एक नई अवधारणा को जन्म दिया। न तो किसी यूटोपियन समाजवादी ने, न ही भौतिकवादी मार्क्स और एंगेल्स ने ही इसकी कल्पना की थी। र्मार्क्स और एंगेल्स 1872 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र के नए संस्करण की भूमिका में इस बात का संज्ञान लेते हुए स्वीकार करते हैं, “1848 के बाद पूंजीवाद के विकास की विराटता और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग के बेहतर और विस्तारित संगठनों के परिदृश्य तथा फरवरी क्रांति और खासकर पेरिस कम्यून के अनुभवों को देखते हुए जिसमें सर्वहारा पूरे दो महीने सत्ता पर अधिकार बरकरार रहा; कुछ मायनों में यह (घोषणापत्र का) पुरातन पड़ गया है। कम्यून ने एक बात खास तौर पर साबित किया कि मजदूर वर्ग पहले से मौजूद राज्यतंत्र पर कब्जा करके उसका उपयोग अपने उद्देश्य नहीं कर सकता”। राज्यतंत्र को विघटित करना ही पड़ेगा। इस बात को 1971 मे जनरल कौंसिल के अपने दो संबोधनों तथा फ्रांस में गृहयुद्ध में मार्क्स ने और भी स्पष्ट किया है। इसीलिए मार्क्सवाद कोई स्थिर विचारधारा नहीं, दुनिया को समझने-बदलने का गतिमान विज्ञान है। 20 साल बाद 1891 में फ्रांस में गृह युद्ध के नए संस्करण की भूमिका में एंगेल्स लिखते हैं, “हाल के दिनों में कई टुटपुजिया सामाजिक जनतंत्रवादी, सर्वहारा की तानाशाही जैसे शब्दों का हौव्वा खड़ा करने में लगे हैं। ठीक है आप जानना चाहते हैं कि सर्वहारा की तानाशाही कैसी होती है? पेरिस कम्यून देखिए, वह सर्वहारा की तानाशाही थी”।

कम्यून के इतिहास, मार्क्स और एंगेल्स तथा अराजकतावादी एवं उदारवादी बुद्धिजीवियों की इसकी व्याख्याओं की व्यापक समीक्षा की यहां गुंजाइश नहीं है, लेकिन कम्यून के उदय की पृष्ठभूमि; मजदूरों की सशस्त्र क्रांति; मार्क्स के कम्यून नेताओं के नाम संदेश; कम्यून की गलतियों और अमानवीय बर्बरता से दमन पर एक सरसरी निगाह डालना लाजमी है। सोवियत संघ के प्रोग्रेस प्रकाशन से प्रकाशित पेरिस कम्यून (1971) में संकलित  1870 में फ्रांस-जर्मनी (प्रैंको-प्रसियन) युद्ध पर इंटरनेसनल में मार्क्स के संबोधन; जनरल कौंसिल द्वारा जारी फ्रांस में गृहयुद्ध; और इसकी तैयारी के प्रारूपों;  मार्क्स एंगेल्स के तत्कालीन लेखों, पत्रों, पूंजीवादी प्रेस तथा संगठनों के दुष्प्रचार के जवाब, कम्यून के उदय-पतन की प्रामाणिक कहानी बयान करते हैं और क्रांतिकारियों की गलतियों की समीक्षा। मार्क्स युद्ध पर अपने पहले संबोधन की शुरुआत इंटरनेसनल में अपने उद्घाटन संबोधन के उद्धरण से करते हैं कि किस तरह शासक वर्ग राजनैतिक सत्ता पर आए संकट से निपटने के लिए युद्धोंमादी राष्ट्रवाद का माहौल बनाकर रक्तपात में समाज की संपदा नष्ट करते हैं। यह आज भी उतनी सही है, जितनी तब थी। “इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि विभिन्न वर्गों के संघर्षों का फायदा उठाकर सत्त्ता हड़पने और समय-समय पर विदेशी युद्धों द्वारा उसे बरकरार रखने वाला नैपोलियन बोर्नापार्ट शुरू से ही इंटरनेसनल को अपना सबसे खतरनाक दुश्मन मानता है। जनमत संग्रह की पूर्वसंध्या पर उसने फ्रांस में अंतर्राष्ट्रीय कामगर संघ (इंटरनेसनल) को उसकी हत्या की साजिश रचने वाला गुप्त संगठन संगठन बताकर, देश भर में इसके पदाधिकारियों की धर-पकड़ का आदेश जारी कर दिया। ........... ........ 

दरअसल वे फ्रांसीसी जनता से खुलेआम जोर-शोर से मतदान के बहिष्कार की जोर-शोर से अपील कर रहे थे क्योंकि मतदान का मतलब है देश में तानाशाही और दूसरे देशों से युद्ध का समर्थन है”।
बोनापार्ट के कुशासन और उसके सैनिकों के अनाचार तथा बैंकरों, कारखानेदारों और व्यापारियों की लूट से जनअसंतोष चरम पर था। इंटरनेसनल के कार्यक्रम और प्रचार मजदूर असंतोष को दिशा दे रहे थे। बोर्नापार्ट युद्ध का माहौल बना रहा था और इंटरनेसनल के नेता और कार्यकर्ता युद्धोंमाद के विरुद्ध जनमत तैयार कर रहे थे। फ्रांस की गरिमा के तथा ‘शत्रु’ जर्मनी से अपनी जमीन वापस लेने के नाम पर जब 15 जुलाई 1870 को बोर्नापार्ट ने युद्ध की घोषणा की तो इसकी चारों तरफ निंदा हुई। इंटरनेसनल की फ्रांसीसी इकाई ने “सभी देशों के कामगरों” के नाम 12 जुलाई को घोषणापत्र जारी किया। “राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए, राष्टीय सम्मान के यूरोपीय संतुलन के नाम पर एक बार फिर दुनिया के अमन-चैन पर खतरे घने बादल मड़राने लगे हैं। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन के कामगर साथियों! आइए हम एकजुट होकर युद्ध के विरुद्ध आवाज बुलंद करें। …….. यह युद्ध वर्चस्व या सल्तनत का युद्ध है। कामगरों की टृष्टि से यह एक आपराधिक बेहूदगी है। ....” कई शहरों में मजदूरों ने शांति मार्च आयोजित किया। इंटरनेसनल की जर्मन इकाई के कार्यकर्ताओं ने भी युद्ध का विरोध किया। नतीजतन जब दोनों ही देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं तब वहां के मजदूर एक दूसरे को शांति-संदेश भेज रहे थे। युद्ध और युद्ध विरोधी अभियानों की विस्तृत चर्चा की गुंजाइश नहीं है। इसका बोनापर्ट की पराजय से शर्मनाक अंत हुआ। 2 सितंबर 1870 को देश की पूर्वी सीमा, सेडान में बोनापार्ट की सेना की पराजय के बाद बिस्मार्क की सेना ने ‘सम्राट’ को उनके 100,000 सैनिकों के साथ बंदी बना लिया। पेरिस की सड़कों पर नारे लगाते, नाचते-गाते कामगरों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। यह जनसैलाब राजशाही के अंत और गणतंत्र की स्थापना की मांग कर रहा था।
तथाकथित गणतंत्रवादी विपक्ष कामगरों के इस आंदोलन से सकते में आ गया लेकिन जनमत के दबाव में उसे मजबूरन गणतंत्र और अंतरिम राष्ट्रीय सुरक्षा की की सरकार की घोषणा करनी ही पड़ी। इस सरकार के प्रमुख पदों पर पूंजीवाद समर्थक गणतंत्रवादी थे। मार्क्स फ्रांस का गृहयुद्ध में लिखते हैं, “जब पेरिस के मजदूरों ने गणतंत्र की घोषणा की तो तुरंत ही पूरे फ्रांस में ऐसी निर्विरोध घोषणाएं हुईं। मौके की ताक में बैठे कुछ बैरिस्टर होटल द विल्ले (संसद) पर काबिज हो गए, थियर उनका नेता था और थ्रोचू जनरल। .............. हड़पी हुई अपनी सत्ता की वैधता के लिए पेरिस के प्रतिनिधित्व का अप्रासंगिक हो चुका जनादेश ही काफी समझा”। मार्क्स ने उपरोक्त लेख में सरकार के मंत्रियों के वक्तव्यों के हवाले से बताया है कि सरकार तो समझौता करना चाहती थी लेकिन लोगों और नेसनल गार्ड की देशभक्ति के बुलंद जज्बे को देखते हुए, हिम्मत न कर सकी उल्टे शगूफा छोड़ दिया, “न तो एक इंच जमीन छोड़ेंगे, न ही जर्मनों को किले की एक ईंट ले जाने देंगे”, और जर्मन सेना ने पेरिस पर  घेरा डाल दिया। 

“आश्चर्यजनक हलचलों के बीच, जबकि मजदूरों के असली नेता अब भी बोनापार्ट की जेलों में थे, जर्मन सेना पहले ही पेरिस की तरफ कूच कर चुकी थी, पेरिस ने इस शर्त के साथ बागडोर संभाला कि उसका द्देश्य महज राष्ट्रीय सुरक्षा था। लेकिन पेरिस की सुरक्षा मजदूर वर्ग को हथियारबंद कर प्रभावशाली बल में संगठित किए बगैर नहीं हो सकती, युद्ध अपने आप उन्हें प्रशिक्षण दे देगा। लेकिन हथियारबंद पेरिस का मतलब था क्रांति को हथियारबंद करना”। पूंजीवाद के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस सरकार को जर्मनों से ज्यादा खतरा हथियारबंद मजदूरों से था। उनसे निपटने की तैयारी का उसे समय चाहिए था। उसे लगता था कि लंबी घेराबंदी के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव से मजदूरों का क्रांतिकारी जज्बा ठंडा पड़ जाएगा। सरकार एक तरफ राष्ट्रोंमादी लफ्फाजी कर रही थी दूसरी तरफ बिस्मार्क से गुप्त वार्ता। लेकिन नेसनल गार्ड के  रूप में संगठित पेरिस के 200,000 हथियारबंद मजदूरों की जनसेना ने पेरिस की सुरक्षा का दायित्व अपने हाथों मेंले लिया। नगर की सुरक्षा सुनिश्चित कर, हथियार डालने से इंकार कर, अपने ही शासकों पर तान दिया और धरती पर पहले सर्वहारा राज्य को जन्म दिया। तबसे कहीं भी किसी भी शासकवर्ग ने मजदूर वर्ग को हथियारबंद करने की गलती नहीं की। 

युद्ध अक्सर, खासकर, पराजय की स्थिति में, क्रांतिकारी परिस्थितियां पैदा करता है। युद्ध से लोगों की रोजमर्रा की दिनचर्या तहस-नहस हो जाती है। सरकार के कर्त्ता-धर्ताओं; परजीवी राज्य मशीनरी; सेना; मीडिया तथा सत्ता के अन्य स्तंभों के क्रियाकलापों के परीक्षण में लोगों की निगाहों का पैनापन कई गुना बढ़ जाता है। संसद में बहुमत पूंजीवादी गणतंत्रवादियों और बोनापार्टवादियों यानि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों का था। लोगों ने कुछ दिन राष्ट्रीय एकता के नाम पर सरकार का समर्थन किया लेकिन धीरे-धीरे असंतोष फिर फैलने लगा। मजदूर वर्ग जब क्रांति की तैयारी कर रहा था तब यह गिरोह प्रतिक्रांति की।

प्रतिक्रियावादियों की यह सरकार अपनी जनविरोधी नीतियों से पेरिसवासियों, खासकर मजदूरों और नेसनल गार्ड के सदस्यों को लगातार उकसाती रही। कुछ नेसनल गार्डों के का भत्ता  रोक दिया  गया और उन्हें “काम में क्षमता” प्रमाणित करने को कह गया। शहर के घेरे से बहुत लोग बेरोजगार हो गए थे। भुखमरी तो नहीं भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए थे। सभी बकाया किराया और कर्ज 48 घंटे में जमा करने का फरमान जारी हो गया, जिससे छोटे-मोटे व्यापारियों पर दिवाएपन का खतरा मड़राने लगा। फ्रांस की राधानी पेरिस से वर्साय स्थांतरित कर दी गयी। इन और इन सी अन्य जनविरोधी नीतियों ने गरीबों को दरिद्र बना दिया लेकिन इन्ही की प्रतिक्रिया स्वरूप मध्यवर्ग की सामाजिक चेतना का जनवादीकरण हुआ। थियर की प्रतिक्रियावादी सरकार को उखाड़ फेंकना ही पेरिस की मुक्ति का रास्ता था। जुझारू प्रदर्शन शुरू हो गए और मजदूर वर्ग ने विद्रोह का ऐलान कर दिया -- थियर जैसे तथाकथित गणतंत्रवादी और राजशाही समर्थक गद्दारों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई। प्रसियन सरकार के समक्ष समर्पण और राजशाही के पुनरुद्धार के खतरों ने आग में घी का काम किया। नेसनल गार्ड क्रांति के अग्रदूत बन गए। 215 बटलियनों के प्रतिनिधियों ने ‘नेसनल गार्डों के महासंघ की केंद्रीय कमेटी’ का चुनाव हुआ। केंद्रीय कमेटी की सत्ता तुरंत सर्वमान्य हो गयी और थियर सरकार द्वारा नियुक्त कमांडर को इस्तीफा देना पड़ा। जर्मन सेना शहर के एक कोने में 2 दिन डेरा डालकर वापस चली गयी।

 थियर सरकार की फौरी चिंता पेरिस के हथियारबंद मजदूर थे। मजदूरों के अधिकार में तोपों का होना पूंजीवाद के लिए “कानून-व्यवस्था” की समस्या थी। दुनिया के सभी प्रतिक्रियावदियों की आंख की किरकिरी बन गया हथियारबंद पेरिस। थियर ने नियमित सेना के 20 हजार सैनिक भेजा तोपों पर कब्जा करने जो उन्होंने आसानी से कर लिया लेकिन उनके पास उन्हें ले जाने का इंतजाम करते, धीरे-धीरे वे मजदूरों की भीड़ से घिरते गये। नेसनल गार्ड्स भी पहुंच गए। भीड़, सैनिक, नेसनल गार्ड सब गड्ड-मड्ड हो रहे थे। सेना के कमांडर ने भीड़ पर गोली चलाने का हुक्म दिया लेकिन सैनिकों ने गोली चलाने से इंकार कर दिया। कई सैनिक नेसनल गार्ड्स को गले लगा रहे थे। क्या अद्भुत दृश्य रहा होगा। कमांडतर लॉकमते और नेसनल गार्ड के पूर्व कमांडर क्लेमांत थॉमस को गिरफ्तार कर लिया गया जिन्हें क्रुद्ध सैनिकों ने मार दिया। थॉमस ने 1848 की क्रांति में मजदूरों पर गोली चलवाई थी। इस परिघटना में केंद्रीय कमेटी की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन परिस्थिति ने उसे सरकार की स्थिति में बैठा दिया। थियर और उसके मंत्रियों की हालत खराब हो गयी। सैनिक हुक्म मानने की बजाय सोचने लगे यानि विद्रोह कर दे, यह बात उन्होने सपने भी नहीं सोचा था। भयभीत हो आनन-फानन में पेरिस से वरसाय भाग गया और सेना तथा प्रशासनिक कर्मियों को शहर खाली कर देने का हुक्म दे दिया। थियर का पीछा कर उसकी बची-खुची सेना को भी नष्ट करने के प्रस्ताव को केंद्रीय कमेटी ने नहीं माना। बाद में देखने पर लगता है कि यह एक ऐतिहासिक गलती थी। दरअसल केंद्रीय कमेटी ज्यादातर सदस्यों में सैद्धांतिक परिपक्वता का अभाव था और वे अपनी ऐतिहासिक भूमिका लिए तैयार नहीं थे। 

पेरिस में अब नेसनल गार्ड सरकार की स्थिति में था तथा केंद्रीय कमेटी ने सारे सामरिक स्थानों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। मजदूरों के निहत्था करने की सरकार की नाकाम कोशिस के बाद पेरिस के मजदूरों और वारसाय में छिपी सरकार के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। “18 मार्च की भोर कम्यून जिंदाबाद के नारों की गर्जना से हुई”। केंद्रीय कमेटी द्वारा जारी घोषणापत्र में कहा गया, “शासक वर्गों की नाकामियों और गद्दारियों को देखते हुए, पेरिस का सर्वहारा समझ गया है कि वक्त आ गया है कि सार्वजनिक मसलों को संचालन वह अपने हाथ में ले ले। ……….. वह समझ गया है कि यह उसका परम कर्तव्य और असंदिग्ध अधिकार है कि वह सरकारी सत्ता पर काबिज हो अपनी भाग्य का विधाता वह स्वयं बने”। 
केंदीय कमेटी, क्रांति के जज्बे के प्रसार के बजाय अपने लिए पहला काम तय किया कम्यून का चुनाव कराना। क्रांति की निरंतरता की बजाय कीमती समय चुनाव के प्रबंधों में लगा दिया और थियर बिस्मार्क से मिलकर प्रतिक्रांति की तैयारी करता रहा और सैन्यशक्ति और मनोबल बढ़ाता रहा। केंद्रीय कमेटी को लगा कि उनके पास शासन का वैध जनमत नहीं था। 90 सदस्यीय, निर्वाचित कम्यून में अधिकतर क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े लोग थे और ब्लांकी के अनयायियों मार्क्सवादियों को मिलाकर लगभग एक-चौथाई इंटरनेसनल के सदस्य। जोशो-खरोश  से ओत-प्रोत, कार्रवाई को सदा उद्यत ब्लांकी के अनुयायियों के पास स्पष्ट सैद्धांतिक समझ का अभाव था, कम्यून के पतन के बाद, बचे-खुचे ब्लांकीवादी मार्क्सवाद की तरफ उद्यत हो गये थे। ब्लांकी स्वयं एक प्रांतीय जेल में थे। वरसाय में थियर सरकार से वार्त्ता में कम्यून ने अपनी कैद से तमाम पादरियों की रिहाई के बदले सिर्फ ब्लांकी की रिहाई की मांग की थी, लेकिन पूंजी का दलाल थियर तो वार्त्ता में विषयांतर के लिए उलझा रहा था जिससे कम्यून के खिलाफ सारे प्रतिक्रियावादियों को लामबंद कर सके। निर्वाचित चंद दक्षिणपंथियों किसी-न-किसी बहाने इस्तीफा दे दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया गया जब पता चला कि वे पुलिस के मुखबिर या जासूस थे। मार्क्स ने एटींथ ब्रुमेयर में लिखा था कि पूर्ववर्ती क्रांतियों ने राज्य-मशीनरी को नष्ट करने की बजाय उन्हें मजबूत किया और फ्रांस में गृहयुद्ध में लिखते हैं, “मजदूर वर्ग पहले से ही मौजूद राज्य मशीनरी पर मात्र कब्जा करके उसे अपने वर्गीय हितों के निये प्रयोग नहीं कर सकता। चूँकि उसकी राजनैतिक गुलामी का हथियार कभी उसकी मूक्ति का यंत्र नहीं बन सकता"। 

सत्ता संभालते ही कम्यून ने राज्य मशीनरी के सारे विशेषाधिकार खत्म कर दिए; किराया और कर्ज की अदायगी पर अप्रैल तक के लिए रोक लगा दी; बंद कारखाने कामगरों के नियंत्रण में शुरू किए गये; रात्रिकालीन काम को न्यूनतम करने तथा गरीब और बीमार के भरण-पोषण सुनिश्चित करने के प्रावधान बनाए। कम्यून ने घोषित किया कि उसका उद्देश्य समाजवादी आदर्श का प्रसार और “पूंजीपतियों के फायदे के लिए मजदूरों का आपसी अराजक प्रतिस्पर्धा का अंत करना है”। 

 नेसनल गार्ड में भर्ती शारीरिक रूप से सक्षम हर व्यक्ति के लिए खुली थी और जैसा ऊपर बताया गया है, उसकी संरचना पारदर्शी तौर पर जनतांत्रिक थी। खुद को लोगों से अलग-थलग और ऊपर समझने वाली सेना तथा पुलिस को अवैधानिक करार कर, भंग कर दिया गया। चर्च को राज्य से अलग कर धर्म को निजी मामला घोषित किया गया और चर्चों की बेशुमार संपत्ति जब्त कर ली गयी। प्रशासनिक अधिकारी, आम मजदूर के समान वेतन पर काम करने वाले कम्यून द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि थे, जिन्हें वापस बुलाया जा सकता था। बेघरों के लिए सार्वजनिक भवनों और भगोड़ों के अधिगृहित घर अधिगृहित किए गए। शिक्षा, प्रेक्षागृह और ज्ञान तथा संस्कृति के सारे केंद्र सार्वजनिक रूप से सभी को सुलभ करा दिए गये। विदेशी कामगरों को तुरंत ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूरों के सार्वभौमिक गणतंत्र’ के सदस्य के रूप में मान्यता दी गयी। गौरतलब है कि कम्यून के निर्वाचित सदस्यों में भी कई प्रवासी थे। सामाजिक जीवन के तमाम पहलुओं को ‘साझे हित’ में व्यवस्थित करने के लिए दिन-रात हजारों लोगों की सभाएं लिए होने लगीं। कम्यून और नेसनल गार्ड की छत्र-छाया में विकसित हो रही व्यवस्था का चरित्र निस्संदेह समाजवादी था। कम्यून की भयानकतम गलतियों में वार्साय की जवाबी हमलों को नजर अंदाज करना और केंद्रीय बैंक पर कब्जा करने की मार्क्स की सलाह को न मानना था जो थियर को कम्यून को कुचलने की तैयारी के लिए लाखों फ्रैंक मुहैया कराता रहा। लेनिन के नेतृत्व में 1917 में यह गलती बॉल्सेविकों ने नहीं दुहराया, सबसे पहले उन्होने ने बैंकों और प्रसारण संस्थानों को कब्जे में लिया था। 

1848 में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा था कि यूरोप के सिर पर कम्युनिज्म का भूत मड़राता रहता है और 1871 में पेरिस कम्यून के रूप में वह भूत उन्हें साक्षात दिख गया। यूरोप के प्रतिक्रियावादी खेमें में बौखलाहट मच गयी। मार्क्स ने कम्यून को अपने संदेश में स्पष्ट किया था कि पेरिस के बाहर अड्डा जमाए प्रशियन सैनिक या तो थियर की मदद करेंगे या खुद कम्यून पर हमला कर देंगे। मार्क्स यह स्पष्ट समझ रहे थे कि सर्वहारा की इस क्रांति को पुख़्ता करने के लिए ज़रूरी है कि पेरिस की कामगारों की सेना पेरिस में प्रतिक्रान्ति की हर कोशिश को कुचलकर, बिना रुके वर्साय की ओर कूच कर जाना चाहिए था। वर्साय में ही थियेर सरकार के साथ ही पेरिस के सभी धनपशुओं ने शरण ले रखी थी। उस समय थियर की कमान में मात्र 27 हजार हतोत्साहित सानिक थे और सर्वहारा की फौज में एक लाख नेशनल गार्डस। पेरिस की नकल पर कई और कम्यून बने थे। वार्साय पर झंडा गाड़ने के बाद क्रांति को देशव्यापी बनाया जा सकता था। लेकिन किसी ऐतिहासिक मिशाल; सैद्धांतिक परिपक्वता; ठोस, संगठित नेतृत्व; ठोस स्पष्ट कार्यक्रम के अभाव और घेराबंदी की अफरा-तफरी में, पेरिस का मजदूर जमीनी हकीकतों के संदर्भ में, सर्वहारा के हित में नये समाज के गठन की प्रक्रिया में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा था। इसीलिए, लगता है, कम्यून क्रांति को पुख्ता किए बिना क्रांति के बाद के समाज के ताने-बाने में फंस गया। छोटी मोटी झड़पों में वारसाय सेना द्वारा कुछ कम्युनार्डों को पकड़कर कत्ल कर देने की घटना के बाद, नेसनल गार्ड के दबाव में कम्यून ने वरसाय पर 3 मोर्चों से हमला करने का फैसला लिया। 

अपनी सामरिक कमजोरी को जानते हुए, थियर कम्यून से वर्तालाप का नाटक कर रहा था, और जैसा कि मार्क्स को पूर्वाभास था, कम्यून को कुचलने के लिए बिश्मार्क से गुप-चुप सौदे बाजी। और अंततः जब पुनर्गठित सेना के साथ पेरिस पर भारी तोपों के साथ हमला बोला तो राजनैतिक और सामरिक अनुभव और अंतर्दृष्टि की कमी के चलते, सर्वहारा की फौज को लड़ते हुए पीछे हटना पड़ा और एक सप्ताह तक पेरिस पर बमबारी होती रही, इसे इतिहास में काला सप्ताह नाम से याद किया जाता है। सेना का चरित्र वैतनिक हत्यारों सा होता है, थियर की सेना किसी विदेशी सेना का नहीं, अपनी विद्रोही जनता का। इसके बाद प्रतिक्रियावादियों ने सड़कों पर दमन का जो तांडव किया वह बेमिशाल है। पेरिस लाशों से पट गया। लगभग 30 हजार क्रांतिकारियों ने शहादत दी, जिसमें बच्चे-बूढ़े-महिलाएं सब थे। कम्युनार्ड लड़े तो भूतपूर्व बहादुरी से लेकिन सामरिक योजना में अपरिपक्वता के चलते 28 मई को 2 महीने का कम्यून पराजित हो गया। सशस्त्र दस्ते जून में पेरिस की सड़कों पर गस्त करते रहे और किसी को भी कम्यून के सहयोगी के संदेह में गोली मार देते थे। कम्यून के पतन के बाद सभी देशों में इंटरनेसनल के सदस्यों और शाखाओं पर दमन बढ़ता रहा और संगठन में टकराव, जिसके नतीजतन संगठन दो फाड़ हो गया और अंततः विघटित।

कम्यून की विसंगतियों और कार्यक्रमों की सैद्धांतिक अस्पष्टता, प्राथमिकताओं के गलत चुनाव के कारण समय और ऊर्जा की बर्बादी आदि कमियों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, उपरोक्त पेरिस कम्यून इसकी समीक्षा का तत्कालीन, प्रामाणिक और वैज्ञानिक समीक्षा है। मजदूरों के पहले अल्पजीवी राज्य के उत्थान-पतन और पतन की एक संक्षिप्त समीक्षा के साथ इस चर्चा को समाप्त करते हैं। मार्क्स ने 18 मार्च के पहले ही कहा था कि तत्कालीन, प्रतिकूल परिस्थियों में सत्ता पर कब्जा करना एक “दुस्साहसिक भूल होगी”। लेकिन इतिहास में स्वफूर्तता की अपनी भूमिका होती है। पेरिस के मजदूर महज अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि शोषण, वर्गविभाजन, सैन्यवाद और राष्ट्रोंमाद से मुक्त “एक सार्वभौमिक गणतंत्र” की। 1871 की तुलना में आज गहराते पूंजीवादी संकट के संदर्भ में विकसित और विकासशील औद्योगिक देशों में क्रांति की परिस्थियां ज्यादा अनुकूल हैं, लेकिन पहले इंटरनेसनल जैसे क्रांतिकारी संगठन की नामौजूदगी से शासकवर्ग संकट से विषयांतर के लिए नस्लोंमाद; धर्मोंमाद; राष्ट्रोंमाद का सहारा ले रहा है। आज जरूरत ऐसे समाज की ठोस बुनियाद तैयार करने की है जिसके लिए पेरिस के सर्हारा स्त्री-पुरुषों ने कुर्बानियां दीं। कम्यून, अल्पजीविता के बावजूद एक समाजवादी समाज बनाने का ईमानदार प्रयास था और क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर बन गया तथा भविष्य की क्रांतियों का संदर्भविंदु। 
18.03.2018

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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद
 पाठ  8     
टॉपिक:  द्वंद्वात्मक भौतिकवाद 
5
इसके पहले द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को दृष्टांतों से समझाने की कोशिस की गयी है, अब परिभाषा पर बात करके फिर एराध दृष्टांत से यह अध्याय खत्म किया जाये। 

किसी भी नई चिंतन धारा का उदय और विकास उस समय के ऐतिहासिक संदर्भ में प्रचलित चिंतन धाराओं के सापेक्ष होता है। उस समय यूरोपीय दार्शनिक गगन में दो प्रमुख चिंचनधाराएं प्रचलित थीं, हेगेल का द्वंद्ववाद और फॉयरवाक का भौतिकवाद। मार्क्स उन्हें चुनौती देते हैं; खारिज करते हैं; उनका कायाकल्प कर,  उनकी द्वंद्वात्मक एकता स्थापित कर, जोड़कर एक नया सिद्धांत देते हैं, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद। हेगेल का मानना था कि यथार्थ पूर्णतः या काफी हद तक विचारों से निर्मित है और दृष्टिगोचर जगत विचारों के अदृश्य जगत की छाया मात्र है। मार्क्स द्वंद्वात्मक उपादान के लिए हेगेल का आभार व्यक्त कर इसे आदर्शवाद कह कर खारिज किया। उन्होंने कहा कि हेगल ने वास्तविकता को सर के बल खड़ा किया है उसे पैर पर खड़ा करना है। विचार से वस्तु की उत्पत्ति नहीं, वस्तु से विचार की उत्पत्ति होती है। ऐतिहासिक रूप से वस्तु विचार से पहले से विद्यमान होती है तथा ऐतिहासिक रूप से विचार वस्तुओं से ही निकले हैं, निर्वात से नहीं। न्यूटन के गुरुतवाकर्षण के सिद्धांत से सेबों का गिरना शुरू नहीं हुआ बल्कि सेबों का गिरना देख कर उनके दिमाग में उसका कारण जानने का विचार आया। सेबों के गिरते देखकर ‘क्या’ सवाल का उत्तर दिया जा सकता है, ‘क्यों’ का नहीं। क्यों, कैसे, कब और कितना का जवाब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से मिलता है। यथार्थ की संपूर्णता का निर्माण सेब गिरने की घटना (वस्तु) और न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम (विचार) की गतिशील द्वंद्वात्मक सम्मिलन से होता है।  

फॉयरबॉक का वैज्ञानिक युग का भौतिकवाद विचारों को सिरे से खारिज करके कहता है भौतिकता ही सब कुछ है, जिसे मार्क्स मशीनी भौतिकवाद या प्रतीकात्मक (मेटाफरिकल) भौतिकवाद कह कर खारिज करते हैं। मार्क्स थेसेस ऑन फॉयरबाक में फॉयरबॉक से सहमति जताते हुए लिखते हैं कि मनष्य की चेतना उसकी भौतिक परिस्थितियों का परिणाम है और बदली हुई चेतना बदली हुई परिस्थितियों की। लेकिन न्यूटन के गति के नियम के अनुसार बिना वाह्य बल के कोई वस्तु हिलती भी नहीं। भौतिक परिस्थितियां आपने आप नहीं बल्कि मनुष्य के चैतन्य प्रयास से बदलती हैं । अतः इतिहास की गति का निर्धारण भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक चेतना की द्वंद्वात्मक एकता से होता है, किसी ईश्वर, पैगंबर, अवतार की इच्छा या कृपा-दुष्कृपा से नहीं। 

इस तरह हम देखते हैं मार्क्स ने सत्य की व्याख्या की अपने समय की प्रचलित दो प्रमुख परस्पर-विरोधी चिंतनधाराओं: हेगेले का द्वंद्वाद तथा फॉयरबाक के भौतिकवाद संदर्भविंदु बनाया; ललकारा तथा खारिज किया; उनकी द्वंद्वात्मक एकता से सत्य की एक नई व्याख्या की चिंतनधारा, नए दर्शन का उद्घाटन किया – द्वंद्वात्मक भौतिकवाद। हेगेल के द्वंद्वाद को उन्होंने आदर्शवादी करार दिया क्योंकि वस्तु पर विचार की प्राथमिकता के साथ यथार्थ को सिर के बल खड़ा किया था। विचार से वस्तु नहीं बनती बल्कि वस्तु से विचार निकलते हैं। ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया बल्कि मनुष्य ने ईश्वर की अवधारणा गढ़ी। उन्होंने वस्तु को ही संपूर्ण सत्य मानने वाले फॉयरबाक के भौतिकवाद को प्रतीकात्मक कह कर खारिज किया कि विचारों के बिना वस्तु प्रकृति की गतिशीलता के प्रकृति के विरुद्ध जड़ता में जकड़ी रहेगी। वस्तु अर्ध सत्य है, उसके विचारों से द्वंद्वात्मक मिलन से सत्य बनता है। 
एंगेल्स ने लुडविग फॉयरवाक और जर्मन दर्शन का अंत में लिखा है, “किसी भी अन्य दार्शनिक कथन की संकीर्ण सरकारों ने इतनी प्रशंसा नहीं की और न उतने ही संकीर्ण उदारवादियों ने इतनी निंदा जितनी की हेगेल के निम्न कथन की:
‘जो भी वास्तविक है, वह विवेकसम्मत है; और जो भी विवेकसम्मत है वह वास्तविक है’।
प्रकारांतर से यह निरंकुश शासन, पुलिसिया सरकार, ... और सेंसरशिप को समर्पित दार्शनिक मंगलकामना है। … लेकिन वे हर वजूददार चीज को वास्तवुक नहीं मानते थे। हेगेल के लिए वास्तविकता उसी का गुण है जो वास्तविक है।

‘अपने विकास क्रम में वास्तविकता आवश्यकता बन जाती है’
एंगेल्स ‘मियां की जूती मियां के सिर’ कहावत चरितार्थ करते हुए हेगेल के ही द्वंद्ववाद विपरीत, क्रांतिकारी निष्कर्ष निकालते हैं। “रोम गणतंत्र वास्तविक था और उसकी जगह आया रोम साम्राज्य भी वास्तविक था। 1789 में फ्रांस की राजशाही इतनी अवास्तविक यानि अनावश्यक हो गयी कि महान क्रांति को उसे ध्वस्त करना पड़ा। राजशाही अवास्तविक हो गई थी और क्रांति वास्तविक, अतः विवेकसम्मत” । कहने का मतलब जिसका भी अस्तित्व है उसका अंत निश्चित है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर संक्षिप्त चर्चा लंबा विषयांतर हो गया। उपरोक्त चर्चा के निष्कर्ष स्वरूप हम पाते हैं कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के निम्न नियम हैं:
 1. यथार्थ (सत्य) वस्तु और विचार का द्वंद्वात्मक युग्म है, जिसमें प्राथमिकता विचारों की है। इस नियम को ऊपर, वस्तुओं के ऊर्ध्वाधर पतन (वस्तु) और न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम की द्वंद्वात्मक एकता के द्वांद्वात्मक एकता से सत्य की संपूर्णता के निर्माण के उदाहरण से दर्शाने की कोशिस की गई है। वस्तु और विचार की द्वंद्वात्मक एकता की प्रक्रिया, या दूसरे शब्दों में दोनों की एक-दूसरे पर क्रिया-प्रतिक्रिया की निरंतरता ही पाषाणयुग से साइबरयुग तक मानव इतिहास की यात्रा की संचालक शक्ति रही है। मार्क्स पूंजीवाद के राजनैतिक अर्थशास्त्र, वर्गीय अंतर्विरोध तथा वर्ग संघर्ष के विश्लेषण में इसी द्वंद्ववाद का इस्तेमाल करते हैं। “अभी तक के समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है” 
 2. प्रकृति की द्वंद्वात्मकता की प्रकृति परिवर्तन की निरंतरता है, जिसके गतिविज्ञान के अपने नियम हैं । सतत क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तन समयांतर में परिपक्व हो, गुणात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन बन जाता। पिछले 40 सालों में भारत में क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तनों के साफ-साफ दिखने वाले उदाहरण हैं: दलित- सशक्तीकरण तथा स्त्री-सशक्तीकरण। स्त्री प्रज्ञा तथा दावेदारी और दलित प्रज्ञा तथा दावेदारी के रथ, मंद गति से शुरू हो त्वरित गति से आगे बढ़ रहे हैं। आज किसी का नैतिक साहस नहीं है कि कहे कि वह बेटा-बेटी में फर्क करता है, एक बेटे के लिए 4-5 बेटियां भले पैदा कर ले। उसी तरह बड़े-से-बड़ा जातिवादी भी सार्वजनिक रूप से नहीं कह सकता कि वह जाति-पांत में विश्वास करता है, बल्कि तमाम मनुवादी किसी दलित के घर टीवी पर प्रचार के साथ भोजन करना प्रायोजित करते हैं। वैसे तो कोई परिवर्तन विशुद्ध मात्रात्मक नहीं होता। यह क्रमशः स्त्रीवाद तथा जातिवाद-विरोध की सैद्धांतिक विजय है, इसीलिए अभी तक यह मात्रात्मक परिवर्तन है। क्रांतिकारी, गुणात्मक परिवर्तन विचारधारा के रूप में क्रमशः मर्दवाद तथा जातिवाद (ब्राह्मणवाद) के विनाश के खंडहरों पर उगेंगे। 
 3. द्वंद्वात्मक समग्रता के दोनों परस्पर-विपरीत के पारस्परिक निषेध से तीसरे उच्चतर की तत्व की उत्पत्ति होती है जो दोनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न होता है लेकिन दोनों के तत्वों को समाहित किए हुए। इस नियम को वाद-प्रतिवाद-संवाद (Thesis, anti-thesis, synthesis) का नियम भी कहते हैं। इसे दो परस्पर विपरीत रासायनिक गुणों वाले, हाइड्रोक्लोरिक एसिड तथा सोडियम हाइड्रॉक्साइड की रासायनिक क्रिया (द्वंद्वात्मक योग) के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।
HCl + NaOH=NaCl+H2O
दो विपरीत रासायनिक गुणों वाले तत्व पारस्परिक निषेध की क्रिया से तीसरे बिल्कुल भिन्न तत्व पैदा करते हैं। शरीर को हानिकरक दो विपरीत तत्वों की द्वंद्वात्क एकता से तीसरा तत्व बना जो जीवन के लिए अनिवार्य है। 1917 की क्रांतिकाकी परिस्थियों ने क्रांतिकारी चेतना पैदा किया क्रांतिकारी परिस्थितियों और क्रांतिकारी चेतना से लैस मनुष्य की द्वंद्वात्मक एकता के परिणामस्वरूप नवंबर क्रांति हुई। 
4.जिसका भी अस्तित्व है उसका अंत निश्चित है, पूंजीवाद अपवाद नहीं हो सकता इसे नियम की बजाय प्रकृति की ऐतिहासिक प्रवृत्ति कहना ज्यादा उचित है।  
22.03.2018
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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद
पाठ 9
टॉपिक:
मार्क्सवाद: एक विज्ञान

मार्क्सवाद क्या है?  

जैसा कि इस श्रृंखला की शुरुआत में बताया गया है कि मार्क्सवाद वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार दुनिया को सनमझने और बदलने की एक चिंतनधारा है, जिसका नाम इस धारा के प्रवर्तक, कार्ल मार्क्स (1818-183) के नाम पर पड़ा। वे एक क्रांतिकारी बुद्धिजीवी थे जो पूंजीवादी विकास के शोषण-दमनकारी व्यवस्था को समझना ही नहीं, बदलना भी चाहते थे। उन्होंने बौद्धिक जीवन की शुरुआत में अपने विचारों की क्रांतिकारिता की घोषणा कर दिया था।  “दार्शनिकों ने अन्यान्य तरीकों दुनिया की व्याख्या की है, लेकिन जरूरत इसे बदलने की है”[9]। उनके जीवन काल में ही उनके सिद्धांतों पर आधारित, मार्क्सवाद एक चिंतनधारा बन चुकी था। कई छोटे-छोटे मार्क्सवादी समूह बन चुके थे। मार्क्स की शवयात्रा में कम उपस्थिति के संदर्भ में, अपने अंत्येष्टि भाषण में एंगेल्स ने कहा था कि वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया मार्क्स के पक्ष-विपक्ष में खड़ी होगी। तीन दशक से कम समय में ही बॉलसेविक क्रांति ने इस भविष्यवाणी को सच कर दिया। सारी दुनिया दो खेमों में बंट गई मार्क्स के पक्ष और विपक्ष में -- राजनैतिक और बौद्धिक दोनों अर्थों में। मार्क्स के निधन के बाद 1889 में गठित दूसरे इंटरनेसनल के लगभग सभी घटक मार्क्सवाद को ही अपना वैचारिक श्रोत मानते थे, जैसे भारत की दर्जन से अधिक कम्युनिस्ट पार्टियां मानती हैं। एंगेल्स ने अपने उसी अंत्येष्टि भाषण में यह भी कहा था कि जिस तरह डार्विन ने जीवन के विकास के नियमों की व्याख्या किया उसी तरह मार्क्स ने इतिहास के नियमों की[10]। मार्क्सवाद विज्ञान है तथा मार्क्स विज्ञान को गतिशील मानते थे, इसीलिए यह कोई स्थिर आस्था नहीं गतिशील विचार है, जिसके बौद्धिक संसाधन मार्क्स तथा एंगेल्स की ही रचनाओं के भंडार तक सीमित नहीं है। ज्ञान की ही तरह विज्ञान भी एक निरंतर प्रक्रिया है, मार्क्सवादी परिप्रक्ष्य से अपनी परिस्थिति को समझने और बदलने के प्रयास करने वाले, लेनिन, माओ, भगत सिंह, ग्राम्सी, चे ग्वेयरा आदि की रचनाओं से यह भंडार लगातार संवृद्ध होता रहा है। 

मार्क्स के जीवन के बारे में बहुत लिखा जा चुका है, उस पर चर्चा की यहां न तो गुंजाइश है न जरूरत। एकाध बातों का जिक्र यह रेखांकित करने के लिए जरूरी है कि शासक वर्ग और उनके भोंपू, सदा से ही वैज्ञानिक विचारों से आक्रांत होते रहे हैं और विचारों से भयभीत हो विचारक को कत्ल; दर-ब-दर और कैद करते रहे हैं। सुकरात से शुरू होकर बरास्ते ब्रूनो; गैलीलियो; दिदरो, रूसो; ब्लांकी; मार्क्स; भगत सिंह; ग्राम्सी; चे; ... की मिशालों की ऐतिहासिक निरंतरता है। मार्क्स 1841 में प्राचीन यूनानी प्रकृतिवादी दर्शन पर पीयचडी जमा करने करने के पहले ही सर्वहारा के रूप में इतिहास के नए नायक का अन्वेषण कर चुके थे[11] तथा छात्र जीवन में यंग हेगेलियन के सदस्य के रूप में छात्र-राजनीति में भी सक्रिय थे।एक कहावत है, ‘होवहार विरवान के होत चीकनो पात’। विश्वविद्याय में नौकरी मिलने से रही। कोलोन में एक पत्रिका में नौकरी कर लिया और संपाक बन गए। ‘सत्य वही जो प्रमाणित हो व्यवहार में’[12] लिखने के पहले ही पत्रकार के रूप में प्रमाणित कर सत्य लिखने लगे थे। एक कहावत है, ‘जंह-जंह पांव पड़ैं, संतन कै, तंह तंह बंटाधार’। तो शासकवर्गों के कानों में ‘राष्ट्र की सुरक्षा’ और ‘शांति’ के लिए खतरे की घंटी बजने लगी और अखबार बंद कर दिया गया तथा मार्क्स ने भाग कर फ्रांस में शरण ली। कहने का मतलब, हेगेल के अधिकार के दर्शन की समीक्षा में एक योगदान [1843-44] तथा आर्थिक और दार्शनिक मैनुस्क्रिप्ट (पेरिस मैनुस्क्रिप्ट) [1844] के प्रकाशन के साथ यूरोप के बौद्धिक जगत में क्रांतिकारी लहजे में प्रवेश के पहले ही, 24 साल के एक युवक के कलम का इतना आतंक कि उसका अपनी धरती पर मौजूदगी ही राष्ट्र के लिए खतरा बन गया। वह ताजिंगी इंकिलाब की अलख जलाते दर-बदर भटकता रहा।

1848 तक उनका फ्रांस में भी रहना खतरनाक हो गया और भागकर बेल्जियम गए, जहां उन्होने एंगेल्स के साथ मिलकर कम्युनिस्ट मैन्फैस्टो की रचना की। राष्ट्र की सुरक्षा के खतरे का भूत वहां भी नहीं साथ छोड़ा, उन्हें बेल्जियम भी छोड़ना पड़ा। राज्यविहीन विचारक के रूप में लंदन में बीती। वैसे भी उनका सपना राज्य-विहीन दुनिया का था, व्यक्ति की राज्य विहीनता का नहीं। भूमंडलीय लूट के प्रमुख औजार हैं, राष्ट्र-राज्य की सरकारें, क्रांति भी राष्ट्र-राज्य की भौगोलिक सीमा में ही होगी। युगचेतना की धारा के विपरीत विचार जल्दी पचते नहीं। समकालीन शासक वर्गों तथा उदारवादी और अराजकतावादी बुद्धिजीवियों के कोप-पात्र बन गए। तरह-तरह के कुप्रचार तथा विचारों पर सवाल होने लगे। जिसका वाजिब समझते थे जवाब देते थे, बाकी नजर-अंदाज कर देते थे। अराजकतावादी दार्शनिक, जोसेफ पियरे प्रूधों ने सर्वहारा के नायकत्व की मारक्स की अवधारणा का मजाक उड़ाते हुए, एक किताब लिख मारा, गरीबी का दर्शन[13] जो नवीनता के अभाव में, कोई खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही। मार्क्स ने जवाब में दर्शन की गरीबी[14] लिखा जो एक कालजयी कृति बन गयी। सब रचनाएं अपनी परिस्थितियों को ही संबोधित करती हैं, अतः समकालिक होती हैं, महान रचनाएं, सर्वकालिक, कालजयी बन जाती हैं। इसमें ऐतिहासिक भौतिकवादी उपादान की पहली स्पष्ट झलक मिलती है।

“आर्थिक परिस्थितियों ने आम ग्रामीण जनता को मजदूर बना दिया। पूंजी के प्रभुत्व ने सबकी परिस्थितियां और हित एकसमान कर दिया है। अतः पूंजी की विरुद्ध अधीनता की समान स्थिति को अर्थ में अपने आप में वर्ग है, लेकिन अपने लिए नहीं। संघर्षों के दौरान यह जनसमूह एकता बद्ध रूप से संगठित होता है तथा अपने लिए वर्ग बन जाता है। जिन हितों की यह रक्षा करता है, वर्ग हित बन जाता है”[15]।

‘अपने आप में वर्ग’ से ‘अपने लिए वर्ग’ की यात्रा का वाहन है, वर्गचेतना। वर्ग और वर्ग चेतना पर विस्तृत चर्चा की गुंजाइश तो नहीं है, लेकिन एक अतिसंक्षिप्त विवरण आवश्यक लगता जिसकी कोशिस आगे की जाएगी। इतिहास के विरले चरित्रों के जीवन बहुत रोचक होते हैं। लालच समेटते हुए मार्क्स की जीवनी उनके लेखन काल के शैशवकाल में ही छोड़, मार्क्सवाद की इस लेख के लिए प्रासंगिक, कुछ प्रमुख अवधारणाओं की संक्षिप्त चर्चा के साथ, रूसी क्रांति के मूल विषय पर आते हैं। मार्क्स बुद्धिजीवी-क्रांतिकारी नहीं थे, क्रांतिकारी-बुद्धिजीवी थे। पूंजी लिखना पूरा करने के लिए फर्स्ट इंटरनेसनल की गतिविधियों से समय चुराते थे[16]।       

व्यवस्था बदलने के लिए उसके के गतिविज्ञान के नियमों की वैज्ञानिक समझ जरूरी थी। इसकेलिए उन्होंने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दार्शनिक आधार पर ऐतिहासिक भौतिकवादी उपादान का अन्वेषण किया। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद मार्क्सवाद का दर्शन है तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद इसका विज्ञान। इन पर विस्तृत चर्चा की गुंजाइश नहीं है। लेकिन कुछ प्रमुख अवधारणाओं की संक्षिप्त चर्चा अप्रासंगिक न होगी।

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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद 
पाठ 10
टॉपिक : ऐतिहासिक भौतिकवाद
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 मार्क्सवाद के दर्शन ,द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर कई पाठों के बाद मार्क्सवाद के विज्ञान, ऐतिहासिक भौतिकवाद की एक संक्षिप्त चर्चा वांछनीय है। वैसे इस पर एक पद्यात्मक पाठ (3) हो चुका है।  ऐतिहासिक भौतिकवाद का मूलमंत्र है. अर्थ ही मूल है। यह एक ऐतिहासिक  दृष्टिकोण है जो समाज के आर्थिक विकास को इतिहास के गतिविज्ञान की कुंजी मानता है। इतिहास के सभी कारण-कारक की उत्पत्ति, “उत्पादन पद्धति में परिवर्तनों और विनिमय तथा परिणामस्वरूप विभिन्न वर्गों में समाज का विभाजन और वर्ग संघर्ष में निरूपित करता है” । सत्य वही जो तथ्य-तर्कों के आधार पर प्रमाणित किया जा सके। मार्क्स, राजनैतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा में एक योगदान  की प्रस्तावना के निम्न लंबे उद्धरण में ऐतिहासिक भौतिकवाद का सार है। 
“अपने सामाजिक उत्पादन के दौरान, भौतिक उत्पादन के विकास के विशिष्ट चरण के अनुरूप मनुष्य विशिष्ट संबंधो में बंध जाते हैं, उत्पादन के सामाजिक संबंध, जो अपरिहार्य और अपनी इच्छा से स्वतंत्र होते हैं। इन्ही संबंधों के योग से समाज का आर्थिक ढांचा तैयार होता है, जो वास्तविक बुनियाद है बुनियाद है जो पर कानूनी और राजनैतिक ढांचों का निर्धारण करता है, और जिसके अनरूप सामाजिक चेतना का विशिष्ट स्वरूप होता है। भौतिक जीवन की उत्पादन प्रणाली, सामाजिक, राजनैतिक और बौद्धिक गतिविधियों के सामान्य स्वरूप का निर्धारण करती है। मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना का निर्धारण करता है। विकास के एक खास चरण में समाज की भौतिक उत्पादन की शक्तियों और मौजूद उत्पादन संबंधों, कानूनी भाषा में संपत्ति के संबंधों में टकराव की स्थिति पैदा होती है। मौजूदा उत्पादन संबंध उत्पादक शक्तियों के आगे विकास में बाधक बन जाते हैं। तब शुरू होता है सामाजिक क्रांति का युग। आर्थिक बुनियाद में परिवर्तन से देर-सबेर सभी अधिरचनाओं में तदनुरूप आमूल परिवर्तन हो जाता है। इन परिवर्तनों के अध्ययन में प्राकृतिक विज्ञान की तरह सही सही ज्ञात किए जा सकने वाली भौतिक उत्पादन आर्थिक परिस्थियों और वैझानिक, राजनैतिक, धार्मिक, कला संबंधी, य दार्शनिक – कुल मिलाकर विचारधारात्मक स्वरूप में परिवर्न में, फर्क करना जरूरी है। विचारधारात्मक स्वरूप में परिवर्तन से मनुष्य इन अंतरविरोधों के प्रति जागरूक हो संघर्ष करता है।”

ऐतिहासिक भौतितवाद एक व्यवहारिक विज्ञान है। उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन के आधार पर यह मानव इतिहास का युग निरूपण करता है: आदिम उत्पादन प्रणाली पर आधारित आदिम साम्यवाद का युग; दास उत्पादन प्रणाली का दास युग तथा सामंती प्रमाणी का सामंतवादी युग तथा अंतिम वर्ग समाज, पूंजीवादी उतपादन प्रणाली पर आधारित पूंजीवादी युग जिसके अंत के बाद वर्ग विहील, राज्य विहीन साम्यवादी युग, जो निरंतर सर्वहारा क्रांतियों से आएगा मगर जिसकी समय-सीमा नहीं तय की जा सकती । 

मार्क्स-एंगेल्स कम्यनिस्ट घोषणा पत्र के शुरू में ही लिखते हैं कि समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है और कम्युनिस्ट पार्टियों का इतिहास 200 साल से कम। कहने का मतलब यह कि वर्ग समाज में शोषण-उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध सभी आंदोलन वर्ग संघर्ष के ही हिस्से हैं. जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है कि मार्क्स का आकलन था कि क्रांति विकसित पूंजीवादी देश में होगा जहां प्रचुरता का बंटवारा मुद्दा होगा। लेकिन मार्क्स ज्योतिषी नहीं थे। मार्क्स के विकास के चरण के सिद्धांत से इतर मार्क्सवाद की विचारधारा की पहली क्रांति रूस में हुई जहां पूंजीवाद लगभग अविकसित था और सामंती उत्पादन संबंध सजीव थे। क्रांति की दो शर्तें हैं, क्रांतिकारी परिस्थितियां और सजग-संगठित क्रांतिकारी पार्टी रूस में दोनों का समागम हुआ, और जैसा ऊपर कहा गया है 1917 में ताबड़-तोड़ दो क्रांतियां हुईं, मार्च की बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रांति और नवंबर में सर्वहारा क्रांति।  आबादी में किसानों और कारीगरों की संख्या अधिक थी। किसानों की लामबंदी के लिए ‘जो जमीन को जोते बोए वह जमीन का मालिक होए’ का नारा दिया गया था।

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Sunday, January 19, 2020

अच्छा लेखन या सार्थक संवाद

शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र या एटीमोलॉजी के अलावा उस शब्द का ऐतिहासिक सन्दर्भ भी उस शब्द के भावार्थ को पलटने की एक अच्छी रणनीति है और इसका उपयोग प्रस्तुत शब्द के साथ नकारात्मक भाव सम्बद्ध करने के लिए भी किया जाता है यथा "सेना ऐतिहासिक रूप से भाड़े के हत्यारे-बलात्कारियों का संगठित समूह है" [sic]। "शब्दा: कामधेनव:"और एक अच्छे लेखक को पास इस कामधेनु को दुहने की कला बखूबी होती है। एक अच्छा और पका हुआ लेखक यह जानता है कि विमर्श में प्रयुक्त व्यंजनात्मक और लक्षणात्मक अर्थ की आलोचना से उस शब्द को उसके अविधात्मक अर्थ पर ज़ोर देकर कैसे बचाया जाए।
अब एक शब्द लेते हैं "नक्सली",इस शब्द के साथ आम जनता की जो भावना जुड़ी है वह भावना इस शब्द से अभिव्यक्त होती है बजाय इसके अविधात्मक अर्थ के और इस आंदोलन के नक्सलबाड़ी गाँव मे उतपन्न होने के। 
तुम गधे हो कहने पर यह तर्क देना की मेरा जीन, मेरा फेफड़ा, मेरा रक्त, मेरा गुर्दा आदि गधे के जिन, फेफड़ा, रक्त, गुर्दा आदि से अलग है अतः मैं गधा नही हूँ संवाद की मूल भावना से उस मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा पीछा छुड़ाना है जिसे मनोविज्ञान में डिफेंस बाई इंटेलेक्चुअलाइज़ेशन कहते हैं। और यह डिफेंस, यह बौद्धिककरण सार्थक संवाद को,  सार्थक विमर्श को तत्क्षण रोक देता है। 
प्रश्न यह नही है कि गधे की जीववैज्ञानिक परिभाषा क्या है, प्रश्न यह है कि मुझे गधा क्यों कहा गया। प्रश्न यह नही है कि वामपंथ शब्द की उतपत्ति क्या है बल्कि प्रश्न यह है कि यह शब्द पूरी दुनिया मे एक नकारात्मक शब्द क्यो बन गया।

Saturday, January 18, 2020

मार्क्सवाद: एक आलोचनात्मक चिंतन ●एक

परिवर्तन या शाश्वतता का प्रश्न दर्शनशास्त्र का बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। पाश्चात्य और भारतीय दोनों ही परम्पराओ में परिवर्तन और शाश्वतता का द्वंद उपस्थित है। हेराक्लाइट्स कहते हैं "एवरीथिंग इज़ फ्लक्स" जबकि परमेंआईडीज़ इसके उलट "ओनली बीइंग इज़ रियल" की उद्घोषणा कर परिवर्तन को अयथार्थ और उस सता को जो अपरिवर्तनीय है, यथार्थ स्वीकार करते हैं। भारतीय परम्परा में उपनिषदें यथार्थ के रूप में एक अपरिवर्तनशील नित्य सत्ता को स्थापित करती हैं जबकि बुद्ध परिवर्तन को ही सत्य मानते हैं। बुद्ध हेराक्लाइट्स के साथ सहमत हैं कि "आप एक ही नदी में दो बार डुबकी नही लगा सकते"। 
आधुनिक काल मे यह दो विचार नैतिक सामाजिक क्षेत्र में दो अलग दृष्टियों की सृष्टि करते हैं जिसमे जो सत्ता को अपरिवर्तनीय मानते हैं वह नैतिक जगत में मूल्यों की निरपेक्षता में विश्वास करते हैं जबकि दूसरी मूल्यों की सापेक्षता में विश्वास करती है। साम्यवाद परिवर्तन (द्वंदात्मक भौतिकवाद) में विश्वास करनेवाली वह दार्शनिक दृष्टि है जिसने अपनी पद्धति से तत्वमीमांसिय अलौकिकता को निकाल दिया और भौतिकवाद को अपने दर्शन में केंद्रीय स्थान दिया। अर्थात परिवर्तन में विश्वास करने के बावजुद इसे बुद्ध के निर्वाण, जन्ममरण चक्र आदि पर विमर्श नही करना बल्कि इसे इहलोक के दुःख और उसके निवारण पर ध्यान केंद्रित करना है; त्रिविध दुखो की सत्ता को अस्वीकार कर यह भौतिक दुखो के अंत को ही अपना ध्येय समझता है।
मार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद मानवीय विचारों के इतिहास में इस अर्थ में बिल्कुल एक नवीन बात थी कि इसके पूर्व इस चिंतन पद्धति का एक  इतना सुव्यवस्थित और विस्तृत तंत्र मौजूद नही था; यह पूर्व की यूटोपियन पद्धतियों की तुलना में वैज्ञानिक था।
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भौतिकवाद और द्वंदात्मक भौतिकवाद

भौतिकवाद एक तत्त्वमीमांसिय निष्कर्ष है जिसके अनुसार सत्यता अंततः भौतिक है, जगत का कोई प्रयोजन नही है तथा यह भौतिक नियमो से संचालित है। 
द्वंदात्मक भौतिकवाद सत्यता को देखने का तत्त्वमीमांसिय फ्रेमवर्क के विरुद्ध सत्यता को द्वंदात्मकता में देखने की पद्धत्ति है। 
द्वंदात्मक भौतिकवाद तत्त्वमीमांसा तथा प्रत्ययवाद दोनों के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। 
यह प्रत्ययवाद को अस्वीकार करता है क्योंकि इसकी मान्यता है कि सत्यता अपने मौलिक रूप में चेतन या विचार नही बल्कि भूतद्रव्य है। अपनी इस मान्यता के चलते यह भौतिकवाद की अन्य विशेषताओं को स्वीकार कर लेता है यथा: जगत की प्रयोजनहीनता तथा उसकी यांत्रिकता।
द्वंदात्मक भौतिकवाद तत्त्वमीमांसा या मेटाफिजिक्स के विरुद्ध भी एक प्रतिक्रिया है क्योकि मेटाफिजिकल फ्रेमवर्क में जगत एक इंटीग्रल होल नही बल्कि रैंडम घटनाओ का एक असम्बद्ध जमावड़ा है। द्वंदात्मकता या डायलेक्टिक्स में प्रकृति इसके सभी घटकों की एक गत्यात्मक इकाई है।

Friday, January 17, 2020

नजूमी मार्क्स नही प्रोफेट मार्क्स


दुनिया का कोई भी धर्म लीजिए और उसके सापेक्ष मार्क्सवाद को रखिए।

ईश्वर से सन्निकटता या आदिम साम्यवाद के रूप में एक महान अतीत दोनों में है। उस महान अतीत से हटकर एक ट्रब्यूलेंट वर्तमान दोनों में है: धर्मो में भी मार्क्सवाद में भी। इस ट्रब्यूलेंट वर्तमान से मुक्ति के रूप में एक महान भविष्य भी दोनों में है: धर्मो में ईश्वरीय साम्राज्य के रूप में और मार्क्सवाद में साम्यवाद की स्थापना के रूप में। 
धर्मो की अपनी किताबें है साम्यवाद की अपनी बाईबल: दास कैपिटल।
धर्मो के अपने पैगम्बर है साम्यवाद के अपने।
धर्मो ने अपने तरीके से खून खराबे किए हैं मार्क्सवाद ने अपने।

पारलौकिकता को हटा दिया जाय तो मार्क्सवाद भी तो मुझे धर्म ही लगता है। एक ऐसा धर्म जिसमे परम्परागत धर्म की एक विशेषता पारलौकिकता को छोड़कर उसकी सारी विशेषताएं मौजूद हैं। 
भविष्य में साम्यवाद की स्थापना होगी क्या यह कथन अफीम के नशे के बाहर का है?

आप साइंटिफिक डेटर्मीनिज़्म का हवाला देते हुए कहेंगे कि हां यह अफीम का नशा नही है बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म है लेकिन तब से यही तो कह रहा हूँ कि आज वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म की अवधारणा ही ध्वस्त हो चुकी है। अब तो हम विज्ञान के उस रूप को जान चुके हैं जहाँ समान प्रयोग समान निष्कर्ष नही देते। 17 वी शताब्दी का वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म। स्वयम विज्ञान के हाथों ध्वस्त हो चुका है और मार्क्सवाद अभी तक उस वैगयानिक डितरमिनिज़्म की ही बात करता है।

बुद्ध का दुःख और मार्क्स का दुःख एक नही था। बुद्ध का दुःख तत्वमीमांसिय दुःख था। जरा-मरण का दुख उनके लिए प्रमुख था और उसके लिए उन्होंने प्रमाता के निषेध के रूप में दर्शन का लक्ष्य रखा। मार्क्स के लिए आधिदैविक या आध्यात्मिक दुःख कोई दुख ही नही क्योकि वह मानव को एक भौतिक सत्ता तक सीमित कर देते हैं, उसमे भी वह समग्र भौतिक दुःखो की बात न करके अर्थ विषयक दुख तक ही उनकी दृष्टि सीमित रही। 
वस्तुतः कालांतर में दोनों दर्शन एक दिवा स्वप्न बनकर रह गए और इसीलिए बौद्ध धर्म की तरह ही मार्क्सवाद का भी पतन प्रारम्भ हो गया।
बुद्ध ने कभी भौतिक तत्व को चेतना के ऊपर प्रधानता नही दी और न ही हीनयान या महायान के किसी सम्प्रदाय ने ही। योगाचार तो जगत को चेतनसृष्ट मानता है। सम्पूर्ण भारतीय दार्शनिक वाङ्गमय में चार्वाक को छोड़ दें तो अन्यान्य सभी सम्प्रदाय भौतिकीवाद को द्वितीयक ही मानते हैं। 
बुद्ध और मार्क्स की तुलना भी बेमानी है क्योंकि मार्क्स अपनी परिस्थितियों की उपज थे और बुद्ध अपने। 
परलोक की कल्पना निश्चित रूप से किसी काल की कल्पना थी व्यवहार में विरला ही कोई होगा जो आज भी परलोक में विश्वाश करता होगा। आध्यत्मवादी भी प्रायः अब इहलोक की समस्याओं का हल परलोक में नही ढूंढते। 

विरोध मार्क्सवाद को विज्ञान और मार्क्सवाद में इम्प्लाइड नियतिवाद को लेकर है क्योंकि आज विज्ञान का ही नियतिवाद में विश्वास ध्वस्त हो चुका है, हम प्रॉबबलिटी और केओस डायनेमिक्स की आज बात करते हैं दूसरा यह भी महत्वपूर्ण है कि इन दर्शनों के व्यवहारिक परिणाम क्या रहे। साम्यवाद क्यो पूरी दुनिया मे असफल रहा? साम्यवादी व्ययवस्था जहाँ लागू हुई वहाँ तो कम से कम साम्यवाद के प्रेडिक्शन के अनुरूप समाज स्थापित हो जाने चाहिए थे लेकिन परिणाम उसके उलट रहे। साम्यवादी सरकारें स्वयम तानाशाही बनकर उभरीं और इन सरकारों ने जमकर कत्ले आम भी किए। ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म के अनुसार साम्यवादियो ने अकेले दोनों विश्वयुद्ध में हुई हत्याओ से अधिक कत्लेआम किया।

आप लाख कोशिश करें इतिहास का उपयोग करके ऐतिहासिक गति का एक सामान्य नियम बना ही नही सकते। इतिहास अतीत की घटनाओं के अध्ययन तक तो ठीक है लेकिन इसमें प्राकृतिक विज्ञानों की प्रेडिक्टिव पावर नही होती अतः इतिहास भविष्य में ऐसा या वैसा करवट लेगा कहना मात्र दुराग्रह है।
मार्क्सवाद भी इस दुराग्रह से पीड़ित है और जब वह इतिहास के भविष्य को प्रेडिक्ट करता है तो भविष्य पुराण ही बनता है।

जी इतिहास में दो प्रोफेट मिले हैं जिन्होंने "डूम" की प्रोफेसी की है: एक का नाम यहाँ अप्रासंगिक है क्योंकि उनका उद्देश्य पारलौकिक हो जाता है। दूसरे मार्क्स हैं जो पूंजीवादी व्यवस्था के डुम की प्रोफेसी करते हैं। 
पहले को भी हिंसा से कोई गुरेज नही, मार्क्स भी टेरर की बात करते हैं।

पहले वाले की तरह मार्क्स भी एक दिवास्वप्निल आदर्श: सर्वहारा का अधिनायकत्व की बात करते हैं।

बर्ट्रेंड रसेल लिखते है कि
मार्क्स को मनोवैज्ञानिक रूप से समझने के लिए निम्न शब्दकोश प्रयोग किया जाना चाहिए:
याहवा: द्वंदात्मक भौतिकवाद
मसीहा: मार्क्स
इलेक्ट: सर्वहारा
चर्च: कम्युनिस्ट पार्टी
ईसा के द्वितीय आगमन: क्रांति
नर्क: पूंजीवादियों की सज़ा
इसमें जन्नत को  सर्वहारा का अधिनायकत्व के रूप में जोड़ लीजिए। 

मार्क्स ज्योतिष थोड़े थे, प्रोफेसी करनेवाले प्रोफेट थे।

नजूमी सितारे पढ़ कर भविष्य बताते हैं, मार्क्स ने इतिहास पढ़ कर भविष्य बताने की कोशिश की।

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...