प्रोफेसर वृहस्पति सैमुअल अपनी कक्षा में विद्यार्थियों को साहित्य पढा रहे हैं। उन्होंने पुस्तक खोली और आज उन्हें जिस पाठ को पढ़ाना है उसका नाम "देवता" है।
प्रोफेसर सैम्युल का मानना है कि अतीत में मनुष्य पाखंडी थे। एक तरफ तो वह अमर होना चाहते थे लेकिन दूसरी तरफ वो अमरता से डरते थे। अतीत के मनुष्य अपनी कथाओ में, अपने मिथकों में, अपने पुराणों में अमर हुए पात्रों को शापित बना देते थे ज्यों मृत्यु जीवन से बेहतर हो और तभी चाहे वह अश्वत्थामा हो, वांडरिंग ज्यू हो या सलोमी हो, अमरता इनका अभिशाप है।
प्रोफेसर सैम्युल का यह भी कहना था कि अतीत के मनुष्य मात्र पाखंडी ही नही बल्कि उनके अंदर दोहरा व्यक्तित्व, एक स्प्लिट पर्सनैलिटी थी क्योंकि तब मनुष्य मृत्यु से डरकर अमरत्व की कामना भी करते थे और अमरत्व से डरते भी थे। वह अपने मे से किसी के अमर हो जाने से घबरा भी जाते और कोई अमरता की चाहत न रखे इसके लिए मिथक भी रचते थे। लेकिन फिर वो अमरता की चाह भी रखते। अमरता की उनकी चाहत उनके द्वारा रचित उनके देवताओं में अभिव्यक्त होता था लेकिन विडम्बना की देवता उनमे से नही होता।
प्रोफेसर ने लेक्चर प्रारम्भ किया:
"हमने जेनेटिक स्तर पर मृत्यु की उसमे मौजूद सूचना को हमेशा जवान और युवा रहने की सूचना से परिवर्तित कर अतीत के उन मनुष्यो के पाखण्ड को ही मात्र खत्म नही किया बल्कि देवत्व की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए एक ऐसे मनुष्य का सृजन कर लिया है जिसका व्यक्तित्व उन अतीत के मानवो की भांति विभक्त नही है।
और हाँ, देवता अपनी प्रजाति नही बढ़ाते, वो स्वयम अमर होते हैं।"
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