Wednesday, December 4, 2019

प्रत्ययवाद की उतपत्ति

इंस्टिंक्ट (अंतः प्रेरण) होता है इससे इंकार नही किया जा सकता। यह इंस्टिंक्ट हालांकि अमीबा से लेकर असरफ उल मख़लूक़ात (इस्लाम), सोबरे ऊपर मानुस (चंडी दास) तक में पाई जाती है लेकिन, इसे आत्मा नही कहा जा सकता। इसे आत्मा इसलिए नही कहा जा सकता क्योंकि इसकी जाति है; अंतः प्रेरण का प्रतीत्य है जीवन, और जीवन का उत्पाद है है अतः प्रेरण। जीवन खत्म तो अंतः प्रेरण खत्म।

बहरहाल मैं इस प्रश्न को यहाँ अप्रासंगिक मान कर दरकिनार कर आत्मा और मोक्ष पर आना चाहुंगा लेकिन इसके लिए एक दृष्टान्त का सहारा लूंगा।
यहाँ मैं अमीबा में आत्मा है या नही और उसे वहाँ मोक्ष प्राप्त हो सकता है कि नही इस अनावश्यक प्रश्न पर भी नही आऊँगा हलाकि जब तक जीवन है तब तक आत्मा शरीर में है ऐसा मानने की परम्परा है लेकिन जीवन और आत्मा का यह सम्वन्ध वायरस पर आकर बहुत कॉम्प्लिकेटेड हो जाता है क्योंकि वायरस तो सजीव भी है और निर्जीव भी तो ऐसा नही हो सकता कि उसमें आत्मा हो भी और न भी हो।

दृष्टान्त प्रस्तुत करता हूँ:

कल्पना कीजिए उस काल की जब हम पशुता से अभी अभी ऊपर उठे है और अभी भी हमारी सहज प्रेरण का स्थान हमारी तार्किकता ने नही लिया है।
क्या खाना है और क्या पीना है इसको तो हर पशु यहां तक की जीवन का सरलतम रूप अमीबा भी जानता है क्योंकि यह उसे जीवन के साथ गूंथा हुवा है।

मनुष्यो को भूख लगी है और शिकार पर गए है लेकिन तभी उनसे ताक़तवर जानवरो के झुण्ड ने उनपर हमला कर दिया है; मनुष्यो का झुण्ड प्राण बचाने के लिए भाग रहा है।
भूखे है मनुष्य तब भी भाग रहे है, सहज वृति!

इसी भागने के क्रम में मनुष्यों के उस झुण्ड का वह मनुष्य जिसकी घ्राण शक्ति अन्यो के मुकाबले तीव्र है एक ऐसी चीज को देखता है जो वृक्ष से जुडी दिखाई देती है और  उस चीज के गन्ध से यह स्वयं निर्धारित है कि वह एक खाद्य वस्तु है।

मनुष्यो का झुण्ड कही रुकता है और वह तीव्र घ्राण शक्ति वाला मनुष्य चुकी बुढ़ापे में भागने के कारण मरने को है, अपने साथियों से कहता है कि एक वस्तु है अमुक जगह पर जिससे भूख मिटाई जा सकती है।

वृद्ध की मृत्यु के पश्चात और उन जानवरो के गुजर जाने के बाद मनुष्यो की टोली वहां पहुंचती है और उस वृद्ध के कथनानुसार देखती है कि हाँ कुछ लगा तो है।
मनुष्यो की टोली उस चीज को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाती है लेकिन यह क्या- वह चीज तो पकड़ में ही नही आ रही। यह चीज तो न पत्थर से कट रही है और न ही धात्विक हथियारों से।
इसे तो अग्नि भी नही जला पा रही है।

मनुष्यो की टोली में से कुछ मनुष्य निराश है लेकिन कुछ शब्द प्रमाण को मानते है इसलिए वह प्रयास करना नही छोड़ेंगे।
अब चुकी वह चीज उन्हें मिल नही रही है अतः उस चीज को, स्वयं को और उससे अपने सम्बन्ध को पुनर्परिभाषित करते है: यह न प्राप्त होने वाली चीज वास्तव में हमेशा के लिए भूख खत्म कर देगा-हाँ, हाँ इसीलिए हम इसे पकड़ नही पा रहे इत्यादि इत्यादि (मोक्ष त्रिविध दुःखो का आत्यंतिक विनाश है)
काल बीतता जा रहा है और मनुष्यो ने भूख मिटाने के लिए खेती करना सीख लिया है लेकिन जीवन का असल उद्देश्य तो अब हमेशा के लिए भूख को मिटा देने वाले उस वस्तु को प्राप्त करना है।
वह फल उन्हें अब भी नही मिलेगा क्योंकि वह उस समय से उस वृक्ष की छाया पर लगे फल की छाया को पकड़ने का प्रयास कर रहे हैं। लाख कोशिश कर लीजिए आप उस फल से उतपन्न संवेदना को उसकी छाया छूकर महसूस कर ही नही सकते (यते वाचो निवर्तन्ति अप्राप्य मनसा सह)

नज़र बदल दीजिए आपको आज भी वह वृक्ष और वह फल दिखेंगे लेकिन सावधान, वह घण्टे दो घण्टे के लिए भूख मिटा सकता है हमेशा के लिए नही!

ऐसा कोई शास्त्र, ऐसी कोई विद्या जो भूख को ही खाने की विद्या सिखाती है दरअसल उसकी दृष्टि शायद सही नही है।

हमेशा के लिए, जन्म चक्र से मुक्ति, कर्मफल?
मोक्ष?

क्यों आज दर्शनशात्र की परीक्षाओं में यह प्रश्न आते है कि "मोक्ष की प्रासंगिकता पर चर्चा करें"
कोई यह क्यों नही कहता की पानी प्यास बुझती है इसकी समीक्षा करें?

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