Wednesday, December 4, 2019

ब्राह्मण, दलित, हिन्दू, मुसलमान●●●●

क्या हममें इतनी साहस नहीं बची है कि हम अपने इतिहास के वस्तुनिष्ट स्वरुप को स्वीकार कर सकें?
इतिहास मे  कुछ स्वर्णिम होगा तो कुछ स्याह भी हो सकता है। स्याह को स्वर्णिम दिखाने की ज़बरदस्ती हमारे अपरिपक्वता को दर्शाता है। (हलाकि शायद इतिहास मात्र इतिहास होता है, न स्वर्णिम न स्याह)
निजी अनुभव से समझाने की कोशिश करता हूँ।
"सेक्स" का मेरे बालपन में समाज, अग्रजों द्वारा बहुत गंदे कार्य के रूप में परिचय कराया गया। अब जब उस वक़्त मैंने ये जाना की सेक्स से ही बच्चे पैदा होते हैं तो मेरा मन इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मेरे माता पिता ऐसी घिनोनी हरकत कर सकते हैं।
मन में अवसाद भर गया और मैंने अपने लिए मिथकों की रचना शुरू कर दी जिनको मैं अपने बालपन के मित्रों को सुनाता फिरता।
उन मिथको का आशय मात्र यही होता था कि मेरे माता पिता ने मेरे जन्म के लिए कोई "घिनौनी हरकत" नहीं की है।
बहरहाल, उम्र बढ़ी, ज्ञान बढ़ा, चेतना बढ़ी और इस क्रम में जाना की "घिनौनी हरकत" का शब्द दरअसल एक झूठ था, एक बकवास, एक गलत जानकारी।
उसमे न कुछ स्याह था न कुछ स्वर्णिम।

क्या हम इतिहास को भी मात्र इतिहास नहीं रहने दे सकते ?

ब्राह्मण, दलित, हिन्दू, मुसलमान●●●●
प्राकइतिहास मे तो मोनोगैमी थी ही नही, एक स्त्री कई पुरुषों से रमण करती थी और एक पुरुष कई स्त्रियों से। यहाँ तो ब्राह्मण-दलित-हिन्दू-मुसलमान का समीकरण ही उल्टा पुल्टा हो जाता है।

आज मोनोगैमी है लेकिन कल क्या होगा कौन जाने?

शायद कल को कोई इस इतिहास को स्वीकार न कर पाए कि उनके पूर्वज इस काल मे मोनोगेमस थे। शायद उन्हें इसकी स्वीकरोक्ति में शर्म आए और वह एक ऐसे झूठे इतिहास की रचना करे जिसमे यौन व्ययहार तत्कालीन मानक के अनुरूप हो।

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...