Wednesday, December 4, 2019

एक और अनेक

उस एक ने नानात्व को जन्म दिया●●भौतिकी का एकीकृत सिद्धान्त●●●हम एक कि तलाश क्यो करते हैं? हम बहुत्व में सामान्य किसी एक को पकड़ना ही क्यों चाहते हैं? चाहे मिथकीय फ्रेंकवर्क वो, तत्वमीमांसिय फ्रेमवर्क हो या वैज्ञानिक फ्रेमवर्क, हमारे इस धारणा, एजम्प्शन का कोई वाह्य आधार है जिससे यह जस्टिफिकेशन दिया जा सके कि नानात्व एकत्व से निःसृत होता है?
इसका हमारे अंत:प्रेरण, प्रतिभान से निरपेक्ष कोई वाह्य जस्टिफिकेशन नही है फिर चाहे वह मिथकीय एक हो, तत्वमीमांसिय एक हो या वैज्ञानिक एक, हम पूर्ण आत्मविश्वास और डंके की चोट पर यह नही कह सकते कि किसी एक सिद्धान्त की खोज की प्रवृत्ति वास्तव में किसी एक निरपेक्ष सत्य की ओर ले जाती है।
क्या हो यदि हमारी यह सार ढूंढने की प्रवृति, हमारी चेतना, हमारे अस्तित्व में ही गूंथा हो और यह स्वयम विज्ञान की भाषा मे कहें तो इंटेलिजेंट लाईफ के विकास से अनुबंधित हो।
सम्भावना रूप ही, सम्भव है कि हम जिस एकत्व को ढूंढते हैं वह एकत्व हमारी चेतना में रचा जाता है और वह यथार्थ शायद संख्या से भी नही बँधा जा सकता हो।
मुझे प्रतीत होता है कि भौतिकीविदों की "थ्योरी ऑफ एवरीथिंग" के पूर्व उनके द्वारा हमारी चेतना की संरचना की पड़ताल आवश्यक और अपरिहार्य है वरना थ्योरी ऑफ एवरिथिंग मिलने के बावजूद भी इसके मिसनोमर, मिथ्या-नाम बनने की पूर्ण सम्भाव्यता उपस्थित है।

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