Wednesday, December 4, 2019

एकेश्वरवाद, मार्ग और मतिग्रस्ति

●एकेश्वरवाद, मार्ग और मतिग्रस्ति:
अब्राहमीय एकेश्वरवाद के सापेक्ष यदि भारतीय एकेश्वरवाद को रखें तो यह इसे अन्य कई मार्गों की भांति केवल एक मार्ग के रूप में स्वीकार करता है, क्योंकि "ईश्वर एक है", इस कथन का अभिप्राय भारतीय तथा अब्राहमीय परम्परा में गुणात्मक रूप से अलग है। जहाँ अब्राहमीय परम्परा में "एक" अलगाव और यूनिकनेस का भाव व्यक्त करता है वहीं, भारतीय परम्परा "एक" शब्द के अंदर सबको समाहित कर लेती है।
भारतीय परंपरा में एकेश्वरवाद की वैचारिक स्तर पर जगत के विविध घटनाक्रमो में एक सामान्य सिद्धान्त ढूंढ़ने के क्रम में एक आंतरिक निष्पत्ति है। मैक्सम्यूलर इसे बहुदेववाद से एकाधिदेववाद तथा एकाधिदेववाद से एकेश्वरवाद की स्थापना, इस क्रम में स्वीकार करते हैं। वैदिक युगीन मानव ने घटनाक्रम के अलग-अलग कारणों की जगह उनमे एक आदि कारण का अन्वेषण प्रारम्भ किया। यह प्रवृति शीघ्र ही "एकाधिदेववाद" या "हिनोथीइज्म" के रूप में अभिव्यक्त हुई। मैक्सम्यूलर ने इसे एकत्व की दिशा में जाने की सहज प्रवृति की अचेतन अभिव्यक्ति मानते हुए इसे बहुदेववाद और एकेश्वरवाद के मध्य विकास की एक निश्चित व्वयस्था माना।
प्रो● एम●हिरियन्ना लिखते हैं, "यह माना जा सकता है कि यह 'अवसरवादी सर्वेश्वरवाद', जैसा कि मैक्सम्यूलर के "हिनोथीइज्म" को नामान्तर से कहा गया है, सब मिलाकर पिछले समय के नाना देवताओं के स्थान पर अकेले ईश्वर में विश्वास पैदा करने में सहायक हुआ" 【भारतीय दर्शन की रूपरेखा, पृष्ठ 37】

अब्राहमीय परम्परा में एकेश्वरवाद की स्थापना का क्रम यह नही रहा है। यहाँ एकेश्वरवाद का सन्दर्भ अपेक्षाकृत सामाजिक अधिक रहा है तथा कई परिस्थितियों में इसे वाह्य रूप से अथवा समझौते के रूप में आरोपित किया गया है।
याहवा यहूदी धर्म के देवता हैं। प्रारम्भ में यह एक जनजातीय देवता थे जो जनजातियों के आपसी संघर्ष में इनके माध्ययम से उस जनजाति की, जिसके यह देवता थे, अपने मे उत्कृष्टता के विश्वास को, याहवा के एकमात्र स्वामित्व या लॉर्डशीप के द्वारा व्यक्त किया गया है।
जनजातियों द्वारा शासन तंत्र और राज्य के विकास के साथ यह उनके एकमात्र राष्ट्रीय देवता बन गए और तत्कालीन मौजूद अन्य जनजातियों के देवताओं की विशेषताओं और गुणों का इनमे विलय कर दिया गया।
तौहीद इस्लामी एकेश्वरवाद की अभिव्यक्ति है। शिर्क, तौहीद की प्रतिपक्षता है। इस्लामी शरीअत की शब्दावली में शिर्क का अर्थ अल्लाह के साथ उस के स्वामित्व, इबादत या नाम और गुणों में कोई साझीदार या सदृश बनाना है। शिर्क इस्लाम मे घोरतम पाप है।
क़ुरान में आया है, "अल्लाह त'आला अपने साथ शिर्क किए जाने को माफ़ नही करेगा, और इसके अतिरिक्त जिसे चाहेगा क्षमा कर देगा और जो अल्लाह के साथ शिर्क करे उसने अल्लाह पर भारी आरोप गढ़ा 【सुरतुन निसा :48】

सम्भवतः अरब समाज की तत्कालीन परिस्थितियों में एकेश्वरवाद की यह व्याख्या और आरोपण एक ऐतिहासिक बाध्यता रही हो लेकिन, तत्कालीन ऐतिहिसिक परिस्थितियों का हल आज के समाज पर आरोपण समय और इतिहास को ही नकार देना है। यह इनकार प्रायः अब्राहमीय धर्मो में एकेश्वरवाद के प्रति मतिग्रस्ति उतपन्न करता है जिसका परिणाम अब्राहमीय धर्मो के आपसी टकराहट के साथ-साथ उनके साथ भी टकराहट में परिलक्षित होता है जो अहल-ए-किताब नही हैं।

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