Wednesday, December 4, 2019

क्या पूर्वमान्यता निष्कर्ष नही बन जाते?

वस्तुवाद/रियलिज्म विज्ञान की पूर्वमान्यता है निष्कर्ष नही:

एक अंधा व्यक्ति था। उसके हाथ एक आधे किलो की वस्तु लग गई। उसने यह बस मान लिया कि यह सोना है।
उसने ढाई सौ ग्राम सोने की कीमत बाजार में पता की। उसने यह गणना की कि यदि उसके पास उतने पैसे होते तो वह 5 वर्ष तक बिना कुछ किए जी सकता था। उसे किसी ने यह भी बताया था कि यदि वह 200 ग्राम सोने से बगल वाले गांव के वैद्य से औषधि बनवा ले तो 5 वर्षो में उसकी आँखों की ज्योति वापस आ जाएगी। उसने यह भी पता किया कि सोने के 200 ग्राम की उस औषधि बनवाने का मूल्य 50 ग्राम सोने के बराबर है और वैद्य रुपयों की जगह सोना भी स्वीकार कर लेता है।
अंधा बाज़ार पहुंचा और उसने अपनी सोना मानी चीज का आधा हिस्सा बेच दिया जिससे उसे कुछ रुपए मिले। वह वैद्य के घर भी गया और वैद्य तत्काल मान गया कि वह इस वस्तु के 200 ग्राम से एक औषधि बना देगा जिसके बदले में वह 50 ग्राम वस्तु रख लेगा।
ठीक पांचवे वर्ष उस अंधे का पैसा भी समाप्त हो गया और उस औषधि के कारण उसकी आँखों की रौशनी भी वापस आ गई।
तब तक वह वैद्य और वह जिसने उससे वह वस्तु खरीदी थी दोनों मर चुके थे अतः वह उनसे नही पूछ सकता कि वह चीज सोना थी या नही।

लेकिन वह वस्तु सोना थी कि नही? क्या अंधे की पूर्वमान्यता सोने में उपस्थित अर्थक्रियात्मकता के चलते निष्कर्ष नही बन गई?

क्या सनमुच हम कह सकते हैं कि वस्तुवाद विज्ञान की पूर्वमान्यता है निष्कर्ष नही?
विज्ञान की पूर्वमान्यताएँ है कि
■ जगत हमसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान है,
■ जगत को जाना जा सकता है,
■ जगत में नियमबद्धता है तथा ये नियम ज्ञेय हैं।
इन पूर्वमान्यताओ से हम प्रारम्भ कर यदि आज तक जगत को जान ही रहे हैं, इसके नियमो को भी जान पा ही रहे हैं और वो हमारे लिए काम करते हों तो भले ही यह कहा जाय कि इन पूर्वमान्यताओ की स्थापना में "आस्था की छलांग" इम्प्लाइड है लेकिन वह पूर्वमान्यताएँ क्या स्वयम वैज्ञानिक निष्कर्ष नही बन रही हैं?
हमने कोई किसी पूर्वमान्यता के साथ उस मान्यता की स्थापित सीमा में कोई अनुसन्धान प्रारम्भ किया। मान लिया की अब अब तक उस मान्यता पर आधारित जितने भी निष्कर्ष है वह प्रेडिक्टिव पावर रखते हैं। स्थापित निष्कर्षों की भी आपस मे संगति है। अभी तक कोई ऐसा ऑबर्जवेशन नही मिला जिसकी व्याख्या इन पूर्वमान्यताओ कि पृष्ठभूमि में न हो सके तो फिर यह पुरमान्यताएँ स्वयम भी क्या निष्कर्ष नही बन जातीं?

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