Sunday, January 16, 2022

भाषाविज्ञान

झरखण्ड की जनजातीय भाषओं के संदर्भ में भाषोत्पत्ती विषयक अनुकरणात्मक सिद्धांत का अध्ययन-----1

चेतना सर्वथा नवीन अ-भूत, अभौतिक, आध्यात्मिक तत्व हो या पंचभूतों से उतपन्न प्रकृति का ही एक रूप किंतु चेतना प्रकृति की ही अनुकृति कर संस्कृति का निर्माण करती है।
मनुष्य यद्यपि अन्य पशुओं की भांति पूर्व से प्रदत्त जगत, विश्व मे निवास नही करता और अपने लिए एक नवीन जगत की सृष्टि करता है, यह नवीन जगत प्रकृति की ही अनुकृति होती है।
अनुकृति का यह उत्पाद सभ्यता और संस्कृति है किंतु यह अनुकृति सर्वदा प्रकृति का यथा-रूप चित्रांकन भी नही है, इस अनुकृति में प्रकृति की विकृति को मनुष्यो द्वारा न्यून करने का भी प्रयास किया जाता है और इसलिए यह अनुकृति होते हुए भी समाकृति नही बल्कि संस्कृति है।

ब्रह्मांड में जीवन का होना एक अद्भुत घटना है और उससे भी अधिक घटना चेतना का होना या उतपन्न हो जाना, किन्तु इन सबमे जो सबसे अद्भुत घटना है वह है भाषा का जन्म।
भाषा, चलायमान, विकासमान, प्रसवधर्मिणी प्रकृति की, में या द्वारा एक प्रकार से अबतक की सबसे उच्च और जटिल घटना है और सौभाग्य से मानवीय सत्ता इससे युक्त है।
प्रायः  पश्चिम में 'ज्ञान' होने के अनिवार्य शर्तो में बोध को भाषा मे बंधना आवश्यक होता है--उनकी स्थापना है जो भाषा मे अभिव्यक न हो सके वह ज्ञान नही है; पशुओं को बोध है किंतु ज्ञान नही।
पश्चिम की ज्ञान विषयक इस स्थापना का
अनुकरण करते हुए भारत के भी कई नवीन दार्शनिक ज्ञान को संवेदन-बुद्धि--भाषा की त्रयी के रूप में स्वीकार करते हैं।
इन दार्शनिकों की समस्या यह है कि वह भाषा को मात्र वाक के बैखरी रूप में परिभाषित करते हैं और इनकी दृष्टि मध्यमा, पश्यंती और परा वाक् तक नही जाती।

ऋग्वेद का कथन है कि चार प्रकार के वाक हैं-- 
परा, पश्यंती और मध्यमा अव्यक्त वाणी है जो मनुष्य के अंदर गुह्यरूपेण विद्यमान रहती है जबकि वैखरी प्रकट वाणी है।

चत्वारि वाक्‌ परिमिता पदानि
तानि विदुर्व्राह्मणा ये मनीषिण:
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति
तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥
ऋग्वेद १-१६४-४५

आशय यह है कि भाषा को मात्र वैखरी से परिभाषित करना न्यायोचित नही।

खैर, मेरा उद्देश्य समकालीन न्यूरोलिंग्विस्टिक्स की दिशा और ऋग्वेद की उन तीन गुप्त वाणियो के मध्य सहमति, असहमति या सम्वाद दिखाना नही है बल्कि वैखरी के संदर्भ में ही भाषा की उतपत्ति के विषय मे अनुकरणात्मक सिद्धांत के पक्ष में सप्रमाण तर्क पुष्टि करना है और इसके लिए मैंने विशेषकर झारखण्ड की जनजातीय भाषाओं को चुना है जिन्होने जनजातीय होने के कारण अनुकरणात्मक ध्वनियों को विकसित भाषाओं की तरह अलंकार नही बनाया है बल्कि उनको सामान्य अभिव्यक्ति के लिए संरक्षित रखा है।

●●●●●●

जोई पिंडे सोई ब्रह्माण्डे, ऐज एबव सो बिलो, लाईक प्रोड्यूस लाईक, अनुकृति से प्रकृति यह विश्वास आज भी हमे प्रकृति के रहस्यों को खोलने और उसे प्रकृति को अपने पक्ष में करने में काम आता है और यही विश्वास आदिम मनुष्यो के बीच उपस्थित होकर मानवजाति की समस्त विशिष्टता का बीज भी बनता है।
यही विश्वास "दूध खाने से मवाद (पस) बनता में है। यही विश्वास "पीलिया के समय हल्दी से परहेज" करने में है, यही विश्वास काले बादलों को काले मुर्गा की बलि चढ़ाने में है, यही विश्वास लाल मिट्टी पर स्थापित ग्राम देवता को लाल मुर्गा चढ़ाने में है। अपने मौलिक रूप में यही विश्वास "अयमात्मा ब्रह्म" में भी है।
यही विश्वास "माना" में है, यही विश्वास "बोंगा" में है, यही विश्वास यम को काले रूप में कल्पित करने में है, यही विश्वास ग्रह नक्षत्रों से मनुष्य का भाग्य पढ़ने में है। 
इस मूल विश्वास का मूर्तकरण मनुष्य के समस्त व्यापारों में लक्षित होता है--प्रकृति का अनुकरण मानव की बहुत ही मूल भावना और इम्पल्स है--इसी इम्पल्स ने भाषा को भी जन्म दिया है और इसी कारण भाषा का जन्म सम्भवतः "ओंटोमोपिया" से हुआ है।

धड़-धड़, फड़-फड़, घड-घड, हड़-हड़ यही हमारे प्रारम्भिक शब्द थे बच्चे भी पों-पों, सु-सु, ला-ला,  पीं-पीं करके भाषा सीखते हैं।

मैंने अपनी बिटिया में एक चीज नोटिस की है--वह जब मुझसे बहुत जुड़ाव महसूस करती है तो मुझे पापा-सापा-लापा-ढापा कहती है।
उल्लू-मुल्लू-लुल्लु करने में उसको आनन्द आता है। मैं भी उसके साथ यह खेल खेलता हूँ ताकि समझ सकूँ की उसको इसमे आनंद क्यो आता है (आनन्द तो मुझे भी आता है) 
मुझे लगता है कि उसकी लापा--सापा--झापा मनुष्यो और उनकी भाषा के बारे में एक कहानी कह रही है।
यह लापा--झापा--पापा--रापा असल मे मनुष्यो के अंदर प्रकृति को एक्सप्लोर करने वाली इंस्टिक्ट है--यही आरम्भिक कविता है।

●●●●●

ड़ भयावह/कड़ा आदि होने के कारण पुल्लिंग भावयुक्त ध्वनि है जबकि ल मृदुल होने के कारण स्त्रीलिंग भावयुक्त।

ड़ का अक्सर ल बनते दृष्टिगत हुवा है किंतु ल का ड़ होना दृष्टिगोचर नही होता।
सम्भवतः ड़ और ल की यह भाषाई प्रवृति मानवीय चेतना का प्रकृति के संग सम्बन्धो की कथा भी कहती है।

आरम्भ में प्रकृति मनुष्य के लिए भयावह थी रौद्र रूपा, मनुष्यो को भूख, प्यासादि मिटाने के लिए भटकना पड़ता था---उस स्थिति में वह झरनों से कल-कल ध्वनी नही सुन सकता। उस समय उसे कड़-कड़ ही सुनाई देगा किन्तु कालांतर में मनुष्यों ने कल-कल भी सुना। 
कड़कड़ाहट ही किलकारी बनी और यह तब हुवा होगा जब वह शिकारी, संग्राहक की भूमिका से कृषक की भूमिका में आया होगा।
अब उसके पास खेती के पश्चात खाली समय था, लीजर था और वह कल कल को महसूस कर सकता था।
सम्भवतः ळ ध्वनि उस संक्रमणकाल की ध्वनि है जब ड़ ल में परिवर्तित हो रहा था।
एक छोटे बच्चे को देखिए वह प्रायः ड़ का उच्चारण ल करता है--घोड़ा--धोला, पड़--पल--
पानी पल लहा है।
कृषि की उतपत्ति के साथ सम्भवतः प्रकृति के सामने हम बालरूप धर सकते थे और हमने यहाँ ड़ को ल सुनना और कहना आरम्भ कर दिया।

फाड़---सील-- देखिए कैसे फाड़ने में ड़ है और सिलने में ल

कड़ा--मुलायम (फिर दो ध्रुवो ओर ड़ और ल)
कठोर--मृदुल

तेजी से भिड़ गए, प्यार से मिल गए

ड़ अंत टैबू शब्दो की भी व्याख्या है किंतु सार्वजनिक रूप से लिख नही सकता।

और सबसे जबरदस्त---
भोजपुरी में कब्ज को कड़ा बन्हाना या कंड़ेरी बंधना कहते हैं जबकि डायरिया को मल पड़ना।
यहाँ भी ड़ का ल देखिए!

●●●●●

अविकसित चेतना की अवस्था मे मनुष्यों को वह कड़-कड़ कड़कता प्रतीत होता और मनुष्य उससे भय खाता किन्तु लाखो वर्ष उसके साथ रहने के पश्चात मनुष्यो की आत्मा ने यह अनुभूत कर लिया था कि वह मात्र कड़-कड़ नही बल्कि कल-कल भी है। 
अब यह कड़कड़ाहट कल-कल कलरव और किलकारी भी थी। 
उसकी चेतना में ड़ का ल की ओर विकास हो चुका था और अब वह इन दो ध्वनियों के भेद का अंतर भी समझने और अनुभूत करने लगा था।
ड़ का ल बन जाना एक अद्भुत घटना थी।
ड़ रुद्र अथवा रौद्रा की ध्वनि थी तो ल कल्याणकारी पालक शक्ति की यद्यपि ये दोनों शक्तियां उसी में अवस्थित हैं।

मनुष्य ने क्रीं क्रीं से क्लीं क्लीं होते हुए अब लं को भी ढूंढ ही लिया और यह मूलाधार में स्थापित है।

बीज, बिंदु, मूल: परा
मृदुल दो कोपले; पश्यंती
डाली-डाली पुष्प: मध्यमा
फल, विविधाकार, विविधप्रकार: वैखरी
साहित्य, काव्य, विज्ञान: पकवान-मिष्टान्न।
●●●●●●

कर्ण-कंठ के प्रयाग में
वाक-श्रोत की वेदी पर
पराध्वनिवाहिनी वह विराजमान 
बीज, बिंदु, मूल 
जो भी नाम-रूप दो
योगिनी, देवी, शक्तिमूला
हाकीनी-डाकिनी, श्रोत-वाक् को 
सींचती वही वज्रगोगिनी
स्फोट-विस्फोट से व्यक्त शब्दब्राह्मी
व्याकरण के मुण्डमाल-आभूषण
लघु-मस्तक को विदीर्ण करती
जोड़ती अल्पप्राण से महाप्राण 
यही मुक्ति, यही निर्वाण।

●●●●●●

खान-खण्ड-खनखन-कनक

खखुवाईल, भुखाईल,
कन्द, कण, कन के चक्कर मे,
खनलस, खन, खन, खनना से।
खन-खन खनलस खान, 
खाई, खण्डरा-खोह।
लिहले खखु सोना जोह।
खखु बो अब कंगन खनकावतारी,
झुमुक़ा झमकावतारी झम झम, झम-झम।
पैजनिया बजावतारी छम छम छम छम!
खखु की खन खन, खखु बो के खन-खन,
खनक भी, कनक भी, खखुवन की।

खखु सब रेसो का पिता है।

●●●◆◆◆
प्रकृति पूजा और आकृति पूजा एक है-

रक्तवर्णा मोहिनी
दिव्य, आभामयी
पंचभूतों को थामती
फूंकती उनमें प्राण
बिंदु स्वरूपा
य र ल व ह को 
यं रं लं वं हं 
बनाती, पालती
महामाय, सृष्टिधाय
दोहाय, दोहाय, दोहाय
लज्जा गौरी नमो नमः
नमो नमः नमो नमः।
●●●●●●●

बड़ के बीच रेंड़ी, मरिहें स पांड़े दू एंड़ी
होजा अब उड़न छू, अब होजा उड़न छू
राम जी के चिरई रामे जी के खेत
दोसरो देस मिली भर भट पेट।

बातोर बातोर , भय, डर लगता है
हे बोहोगहोड़, शीर्षवाल, श्री मुकुटधारी 
तुम्हारे कपाल पर मेरी खोपड़ी का मुकुट है
तुम्हारे भाल पर मेरे रक्त का तिलक।
मेरे हाड़ का धनुष, मेरी जिव्हा की प्रत्यंचा
मेरे श्रृंग, दन्त, नख के तुम्हारे तीर-भाले
मेरी खाल की ढम ढम ढोलक,मृदंग, नगाड़े
है न पाँड़े? है न पाँड़े? है न पाँड़े?

बड़ के बीच रेंड़ी, मरिहें स पांड़े दू एंड़ी
होजा अब उड़न छू, अब होजा उड़न छू
राम जी के चिरई रामे जी के खेत
दोसरो देस मिली भर भट पेट।
बातोर बातोर , भय, डर लगता है

●●●●●●
भाषा के बिजड़े, बोली के बिहिन

पशुओं की भगदौड़ सुनो जी
धड़-धड़, धड़-धड़, धड़-धड़ धड़-धड़
वृक्षोँ के सुनो  मीठे गीत
खड़-खड़, खड़-खड़,खड़-खड़, खड़-खड़
बादल की गर्जन तो देखो
घड़-घड़ घड़-घड़, धड़ धड़ाक, 
तड़ित त्वरित गति से कहती
तड़-तड़, तड़-तड़, तड़, तड़ाक
नदियाँ बहती मस्ती में
हौले हौले कल-कल कल-कल
झरने गिरते झूम झूम के
झर-झर, झर-झर, झल-झल, झल-झल
पानी मे जब पत्थर गिरते
छप-छप, छप-छप, छपक-छपाक
लेकिन धरती पर गिरते तो
धम-धम, धम-धम, धमक-धमाक

अनगढ़, अगढ़, अक्खड़, फक्कड़, रुखड़े
यही बोली के बिहिन, भाषा के बिजड़े
यही भाषा के बीज रे, यही भाषा के बीज रे!

●●●●●●●

भोजपुरी संस्कृत से ही उत्तपन्न है भले संस्कृत से भोजपुरी और भोजपुरी से संस्कृत का सम्बंध टू वे रहा लगता है-----
संस्कृत काल क्रम में अपभ्रंश बनकर भोजपुरी बनती है और भोजपुरी का उन भाषाओं से सम्पर्क होता है जो संस्कृत से उतपन्न नही हैं।
दोनो में आदान प्रदान होते हैं और भोजपुरी द्वारा संस्कृत-वाह्य शब्दो को संस्कृत तक पहुंचाया जाता है जिनका संस्कृतकरण होता है और संस्कृत उनको आत्मसात कर अपनी शब्दावाली में उनको स्थान देती है और यह शब्द पुनः अन्य संस्कृत की भाषाओं को प्राप्त होते हैं। 
यह टू वे क्रिया मात्र भोजपुरी के साथ ही नही बल्कि संस्कृत से उतपन्न समस्त भाषओं और बोलियों के साथ सम्भत: रहा है।
सम्भवतः भोजपुरी के कुछ शब्द इस अर्थ में संस्कृत से प्राचीन इसलिए हैं या प्रतीत होते हैं कि संस्कृत-वृत वाह्य भाषा से पहली बार उनको भोजपुरी और ऐसी ही संस्कृत अपभ्रंशों ने ही आत्मसात किया।
बहुत से दुर्जन और सज्जन भी इसी कारण समग्र प्राकृत को ही संस्कृत से पूर्व का घोषित कर देते हैं।

●●●●●

संस्कृत को जो मैंने समझा है--
यह वास्तव में एक भाषा कम एक प्रक्रिया, एक पद्धति, एक विज्ञान, एक तकनीक, एक विधि, एक प्रविधि अधिक है जो समग्र दिशाओं से आने वाली ध्वनियों और उनके आपसी सम्बन्धो को सुसंस्कृत अथवा भाषाविज्ञान के उत्कृष्ट नियमो से बांध देती है और फिर उन्हें यह तराशी हुई चीज वापस कर देती है।

और हमलोग बवाल में फंसते हैं कि संस्कृत पहिले की, तमिल की, भोजपुरी की संथाली, मूल बात देखते ही नही।

शेष-----

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...