मुझे नही लगता कि मुझे इस प्रश्न के उत्तर देने की आवश्यकता है क्योंकि यह आपकी दर्शन विषयक निरक्षरता को दिखाता है। बकवास और वाग्जाल! प्रश्न तो मैंने भी किया था कि बिग बैंग ही क्यो नही बकवास है, आखिर यह क्यो होना चाहिए था और एक तथ्य-मूल्य के संजाल बनने की, विकसित होने की आवश्यकता ही क्या थी?
मुझे मल्यायलम समझ मे नही आती अतः यह भाषा बकवास है ऐसा कह देना मेरी मानसिक और बौद्धिक दिवालियापन है:
बहरहाल बकवास का उल्टा #सार्थकता ले सकते हैं क्योंकि सार्थकता बकवास का निषेध है। प्रश्न है कि सार्थकता क्या है? हम किसे सार्थक कहें?
सार्थकता की यदि सन्धि करें तो यह "स:" उपसर्ग और "अर्थ" शब्द में "ता" प्रत्यय संयुक्त करने पर बना है। "ता" प्रत्यय स्थिति का सूचक है तथा "स:" उपसर्ग का अर्थ "के साथ" होता है। इस प्रकार सार्थकता, अर्थ के साथ उपस्थित रहने की स्थिति है।
क्या दर्शन में अर्थ के साथ उपस्थित रहने की शक्ति है?
अपनी जटिलता और दुरूहता के कारण दर्शन की कोई एक परिभाषा देना मुश्किल है। कभी इसकी परिभाषा #दृश्यते_वस्तु_यथात्मयम_अनेन_इति_दर्शनम है तो
कभी #शब्दे_निष्णात_परे_निष्णात कभी #विज्ञानों_का_विज्ञान (बेकन), कभी #भाषा_को_स्पष्ट_करने_का_शास्त्र ( विश्लेषणात्मक दर्शन), कभी #द्वितीय_स्तर_का_अंवेक्षण तो कभी #जगत_को_बदलने_की_विधि (मार्क्सवाद) रहा है।
इन सबके मध्य जो एक साम्यता ढूंढी जा सकती है वह यह है कि #दर्शन_किसी_विषय_के_तह_तक_विचार_करने_की_कला है। आप प्रश्न करेंगे कि इससे क्या हो जाएगा तो यह प्रश्न मेरे लिए उतना ही फालतू है जितना मेरा यह प्रश्न कि " आप जी क्यो रहे हैं" जी के क्या कर लीजिएगा?
दर्शन जीवन और जगत को समग्रता में समझने का प्रयास है। यह #एक्ज़मींड_लाइफ जीने के लिए एक विधि है क्योंकि एक असंतुष्ट सुकरात होकर मरना एक सन्तुष्ट सुवर होकर मरने से बेहतर नही होता।
विज्ञान बनाम दर्शन, विज्ञान बनाम दर्शन की आपकी समझ भी इस बात को दिखाती है कि न तो आपको विज्ञान के तह के बारे में समझ है और न ही दर्शन की।
जगत विज्ञान, दर्शन, इतिहास आदि में नही विभक्त है। कांत के नुयमोना की यदि बात न भी करें तो फिनोमिना जो है वह है इसे हम अपनी बौद्धिक कोटियों और चेतना द्वारा प्रदत फ्रेमवर्क में समझते हैं। यह विज्ञान, दर्शन, गणित आदि आदि हमारी चेतना द्वारा निर्मित कोटिया हैं और समग्रता की समझ के लिए हर कोटि का एक निश्चित कार्य और सीमा है।
विज्ञान, विज्ञान, विज्ञान
क्या विज्ञान अपनी आलोचना और समीक्षा के अभाव में विज्ञान बना रह सकता है? नही, इसके अभाव में यह शीघ्र ही एक डॉगमा मे तब्दील हो जाएगा। विज्ञान की पूर्वमान्यताओ, इसके फ्रेमवर्क, इसकी प्रविधि आदि की निरंतर समीक्षा और आलोचना कौन करता है?
दर्शन, विज्ञान का दर्शन।
और यहाँ आखिर में:
Science is the captured territory; and behind it are the those secure regions in which knowledge and art build our imperfect and marvellous world. Philosophy seems to stand still, perplexed; but only because she leaves the fruits of victory to her daughter's the sciences, and herself passes on, divinely #discontent, to the uncertain and unexplored.
(Will Durant, The Story of Philosophy)
द्रष्टव्य है कि दर्शन में अर्थ के साथ उपस्थित रहने की शक्ति है।
■अत: दर्शन बकवास और वाग्गजाल नही है।
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