Wednesday, December 4, 2019

प्रकृति और पुरुष का सृजन

वर्जनाएँ,
पीड़ा, वेदना,
आत्मा नीलाभ,
गांठ गांठ हलाहल।
अकस्मात!
आत्मिक आमंत्रण
प्रकृति का।
लाल हरे रंगों में,
उन्मत्त रेचित वृत्तियाँ,
मीठी सी प्यास,
अपनेपन की घूँट,
तुम्हारी हंसी, तुम्हारी ठिठोली,
मन की भाषा,
चुपके से तुम बोली:
जीवन का मधुपर्व 'आज'।
कवि का करुण राग,
या समर भूमि?
हलाहल से संघर्ष,
माटी का उत्कर्ष,
महामानव का बीजवपन,
संकल्प की सृष्टि,
मेरा सृजन!
पुरुष, मेरा सृजन!!

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