आप लाख कोशिश करें इतिहास का उपयोग करके ऐतिहासिक गति का एक सामान्य नियम बना ही नही सकते। इतिहास अतीत की घटनाओं के अध्ययन तक तो ठीक है लेकिन इसमें प्राकृतिक विज्ञानों की प्रेडिक्टिव पावर नही होती अतः इतिहास भविष्य में ऐसा या वैसा करवट लेगा कहना मात्र दुराग्रह है।
मार्क्सवाद भी इस दुराग्रह से पीड़ित है और जब वह इतिहास के भविष्य को प्रेडिक्ट करता है तो भविष्य पुराण ही बनता है।
दुनिया का कोई भी धर्म लीजिए और उसके सापेक्ष मार्क्सवाद को रखिए।
ईश्वर से सन्निकटता या आदिम साम्यवाद के रूप में एक महान अतीत दोनों में है। उस महान अतीत से हटकर एक ट्रब्यूलेंट वर्तमान दोनों में है: धर्मो में भी मार्क्सवाद में भी। इस ट्रब्यूलेंट वर्तमान से मुक्ति के रूप में एक महान भविष्य भी दोनों में है: धर्मो में ईश्वरीय साम्राज्य के रूप में और मार्क्सवाद में साम्यवाद की स्थापना के रूप में।
धर्मो की अपनी किताबें है साम्यवाद की अपनी बाईबल: दास कैपिटल।
धर्मो के अपने पैगम्बर है साम्यवाद के अपने।
धर्मो ने अपने तरीके से खून खराबे किए हैं मार्क्सवाद ने अपने।
पारलौकिकता को हटा दिया जाय तो मार्क्सवाद भी तो मुझे धर्म ही लगता है। एक ऐसा धर्म जिसमे परम्परागत धर्म की एक विशेषता पारलौकिकता को छोड़कर उसकी सारी विशेषताएं मौजूद हैं।
भविष्य में साम्यवाद की स्थापना होगी क्या यह कथन अफीम के नशे के बाहर का है?
आप साइंटिफिक डेटर्मीनिज़्म का हवाला देते हुए कहेंगे कि हां यह अफीम का नशा नही है बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म है लेकिन तब से यही तो कह रहा हूँ कि आज वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म की अवधारणा ही ध्वस्त हो चुकी है। अब तो हम विज्ञान के उस रूप को जान चुके हैं जहाँ समान प्रयोग समान निष्कर्ष नही देते। 17 वी शताब्दी का वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म स्वयम विज्ञान के हाथों ध्वस्त हो चुका है और मार्क्सवाद अभी तक उस वैगयानिक डितरमिनिज़्म की ही बात करता है।
मार्क्सवाद भी इस दुराग्रह से पीड़ित है और जब वह इतिहास के भविष्य को प्रेडिक्ट करता है तो भविष्य पुराण ही बनता है।
दुनिया का कोई भी धर्म लीजिए और उसके सापेक्ष मार्क्सवाद को रखिए।
ईश्वर से सन्निकटता या आदिम साम्यवाद के रूप में एक महान अतीत दोनों में है। उस महान अतीत से हटकर एक ट्रब्यूलेंट वर्तमान दोनों में है: धर्मो में भी मार्क्सवाद में भी। इस ट्रब्यूलेंट वर्तमान से मुक्ति के रूप में एक महान भविष्य भी दोनों में है: धर्मो में ईश्वरीय साम्राज्य के रूप में और मार्क्सवाद में साम्यवाद की स्थापना के रूप में।
धर्मो की अपनी किताबें है साम्यवाद की अपनी बाईबल: दास कैपिटल।
धर्मो के अपने पैगम्बर है साम्यवाद के अपने।
धर्मो ने अपने तरीके से खून खराबे किए हैं मार्क्सवाद ने अपने।
बर्ट्रेंड रसेल के अनुसार मार्क्स को मनोवैज्ञानिक रूप से समझने के लिए निम्न शब्दकोश प्रयोग किया जाना चाहिए:
याहवा: द्वंदात्मक भौतिकवाद
मसीहा: मार्क्स
इलेक्ट: सर्वहारा
चर्च: कम्युनिस्ट पार्टी
ईसा के द्वितीय आगमन: क्रांति
नर्क: पूंजीवादियों की सज़ा
Yahweh=Dialectical Materialism
The Messiah= Marx
The Elect=The Proletariat
The Church=The Communist Party
The Second Coming=The Revolution
Hell=Punishment of the Capitalists
The Millennium=The Communist Commonwealth
याहवा: द्वंदात्मक भौतिकवाद
मसीहा: मार्क्स
इलेक्ट: सर्वहारा
चर्च: कम्युनिस्ट पार्टी
ईसा के द्वितीय आगमन: क्रांति
नर्क: पूंजीवादियों की सज़ा
Yahweh=Dialectical Materialism
The Messiah= Marx
The Elect=The Proletariat
The Church=The Communist Party
The Second Coming=The Revolution
Hell=Punishment of the Capitalists
The Millennium=The Communist Commonwealth
पारलौकिकता को हटा दिया जाय तो मार्क्सवाद भी तो मुझे धर्म ही लगता है। एक ऐसा धर्म जिसमे परम्परागत धर्म की एक विशेषता पारलौकिकता को छोड़कर उसकी सारी विशेषताएं मौजूद हैं।
भविष्य में साम्यवाद की स्थापना होगी क्या यह कथन अफीम के नशे के बाहर का है?
आप साइंटिफिक डेटर्मीनिज़्म का हवाला देते हुए कहेंगे कि हां यह अफीम का नशा नही है बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म है लेकिन तब से यही तो कह रहा हूँ कि आज वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म की अवधारणा ही ध्वस्त हो चुकी है। अब तो हम विज्ञान के उस रूप को जान चुके हैं जहाँ समान प्रयोग समान निष्कर्ष नही देते। 17 वी शताब्दी का वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म स्वयम विज्ञान के हाथों ध्वस्त हो चुका है और मार्क्सवाद अभी तक उस वैगयानिक डितरमिनिज़्म की ही बात करता है।
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