आदमी को अपने भीतर के ओरांग ओटान को बाहर लाने का मौका चाहिए। ओरांग ओटान जो नीति-अनीति नहीं जानता; कोपरनिकस, गैलेलियो और आइंस्टीन से उसे क्या मतलब?
सभ्यता के नाम पर हमने अपने भीतर के ओरांग ओटान को दबाया तो है ही। वह तो बाहर आने का बहाना ढूंढेगा ही।
अब हर कोई तो "मुक्तिबोध" नही हो सकता न जो अपने भीतर के ओरांग ओटान को कलम थमा दे।
लेकिन कलम थमाने पर भी क्या हुवा?
ओरांग ओटान की चेतना जागी और उसने सत चित आनंद की जगह सत चित वेदना लिख दिया।
हमारा बड्डपन, हमारी विशालता क्या इतनी छोटी है कि हम एक दिन उस ओरंग ओटान को नहीं दे सकते?
क्या हमारी सभ्यता इतनी कमज़ोर है, संस्कृति इतनी नाज़ुक है कि बस एक दिन उसका अपने अतीत से सामना हो जाए और वह ऑफन्डेड फील करती है?
तर्क वितर्क नहीं करूंगा और न ही अहम को पुष्ट करने की कोई इक्षा है लेकिन इतना ज़रूर कहुंगा की आप जो तर्क देंगे दरअसल वह बुद्धि प्रपंच आपके अपने अंदर के ओरंग ओटान की रक्षा है।
लेकिन ओरंग ओटान आता रहेगा।
देखिए न अगर मैं नाख़ून बढ़ा लूँ, प्रकृति प्रदत्त एक मात्र हथियार तो आप कहेंगे कैसे जंगलियों, जानवरों सा नाख़ून बढ़ा लिया है लेकिन वही अंगुलियां मनिक्युर करवाके जब पिस्तौल की ट्रिगर को छूती है तो क्या अद्भुत आनंद आता है(नीत्से का विल टू पावर)!
ओरांग ओटान आता रहेगा!!!
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