मुझमे शंकर के ब्रह्म की हड्डी
खराब हो गई है
अपने ही भार के कारण।
केवल गति?
मैं, एक मनोवैज्ञानिक कंस्ट्रक्ट?
लाप्लासों, तुम भी झूठे हो।
जलती है मेरी चमड़ी
जलता है मेरा मन
साक्षी हूँ इस वेदना का
अणु-परमाणु घिरा तो है मुझमे,
मैं की इस चेतना से।
हाँ,एक कण उछला
नाद के साथ
आत्मा या ब्रह्म नही
भ्रम तो कतई नही
दाएँ से भी आदमी
बाएं से भी आदमी
आदमी, जिसे सुख भी होता है
आदमी, जिसे दुख भी होता है।
यही मेरा सत है।
मेरी चेतना में अनुभवरूपी
जिब्रील द्वारा उतारा गया।
खराब हो गई है
अपने ही भार के कारण।
केवल गति?
मैं, एक मनोवैज्ञानिक कंस्ट्रक्ट?
लाप्लासों, तुम भी झूठे हो।
जलती है मेरी चमड़ी
जलता है मेरा मन
साक्षी हूँ इस वेदना का
अणु-परमाणु घिरा तो है मुझमे,
मैं की इस चेतना से।
हाँ,एक कण उछला
नाद के साथ
आत्मा या ब्रह्म नही
भ्रम तो कतई नही
दाएँ से भी आदमी
बाएं से भी आदमी
आदमी, जिसे सुख भी होता है
आदमी, जिसे दुख भी होता है।
यही मेरा सत है।
मेरी चेतना में अनुभवरूपी
जिब्रील द्वारा उतारा गया।
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