Wednesday, June 30, 2021

प्रेत

प्रेत 

जब वह जन्मा तो वासनाओं का प्रेत था। 
जो दार्शनिक और विचारक यह कहते हैं कि वह जन्म के समय निश्छल और पवित्र था वह झूठ कहते हैं और वह यह भी झूठ बोलते हैं कि उसको प्रेत उसके समाज ने बना दिया क्योकि यह समाज ही था जिसने उसके अंदर के आदमी की हत्या कर दी थी वरना वह आदमी से विकसित होकर ईश्वर भी बन सकता था।

दरअसल हम सब वासनाओं के प्रेत ही जन्मते है लेकिन शीघ्र ही हमारा सामना समाज द्वारा रचित महाप्रेत, ईश्वर से होता है जिसकी तुष्टि के लिए हमे अपने प्रेत के एक बहुत बड़े हिस्से की बलि चढ़ानी होती है और यह बचा हुवा हिस्सा ही आदमी कहलाता है। 
महाप्रेत को तुष्ट करना हमारी बाध्यता है क्योकि उसके तुष्ट होने के बाद ही समाज हमे स्वीकार करता है और हमे समाज की जरूरत है।
समाज की अपनी वासनाएं है लेकिन उन्हें वह प्रेत कहना पसंद नही करता बल्कि वह अपनी वासनाओं को ईश्वर कहता है। उसने इस शब्द से एक माया रच रखी है ताकि उसके प्रेत के आगे बाकियों के प्रेत उन्हें पापी और छोटे दिखें जिससे उनके प्रेतों का बलिदान करवाया जा सके।

चूंकि आदमी भी प्रेत है और ईश्वर भी अतः इन्हें मात्र भटकते रहना है और ये बस भटकते ही रहते हैं।

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Monday, June 28, 2021

शैतानी पागलपन

जब तक जगत के केंद्र में ईश्वर था, मनुष्यों को चीजें स्पष्ट थी। उन्हें लगभग हर चीजों का अर्थ मालूम था--जगत, जीवन, मृत्यु, आंनद, पीड़ा---
फिर बुद्धि ने उसके व्यक्तित्व का अतिक्रमण कर लिया और यह अतिक्रमण होना ही था क्योकि पूर्व में उसे जो अर्थ मालूम थे वह उसके अनुभव से मेल न खाते; उसके स्वयम के द्वारा रचित तत्त्व  और उसके अपने अनुभव में लगातार एक द्वंद चलता रहता। इस द्वंद के विश्लेषण से मानवीय चेतना ने देखा कि वास्तव में जगत के केंद्र में तो ईश्वर है ही नही और उसने उद्घोष कर दिया कि वह स्वयम अर्थों की कसौटी और मापदंड है। मनुष्यो ने अपने पूर्व के केंद्र ईश्वर को पृष्ठभूमि में भेजना प्रारम्भ कर दिया और केंद्र में स्वयम को स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया। 
मानवों में से कुछ कवि ह्रदयों ने इस केंद्र की वस्तु के प्रतिस्थापन्न को रूमानी नाम भी दिये-पुनर्जागरण, मानववाद--! 

समस्या यह थी कि मनुष्य काफी सीमित था-वह न तो सर्वव्यापी था, न सर्वशक्तिमान, न सर्वकालिक, न अनश्वर और शाश्वत और न ही वह  आवश्यकता पड़ने पर कार्य-कारण की मेखला को तोड़ कर चमत्कार आदि ही पूर्व के केंद्र, ईश्वर की भांति कर सकता था-- बल्कि उसकी बुद्धि ने उसे दिखाया था कि वह एक बहुत बड़े स्कीम का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है, एक बहुत बड़े मशीन का एक छोटा सा अमहत्वपूर्ण हिस्सा और वह बड़ी मशीन उसके बिना भी वैसे ही क्रियात्मक है। 

मनुष्यों में से कुछ ने अपनी स्थिति स्वीकार करते हुए उस वृहत मशीन पर चिंतन करना प्रारम्भ किया लेकिन यह क्या--इस मशीन का भी कोई अर्थ नही है--यह मशीन तो असल मे मशीन है ही नही--यह तो अराजकता, अतार्किकता की एक बहुत बड़ी गठरी है जो फट चुकी है और उसकी अराजकता और अतार्किकता रिस रिस कर चूती रहती है--!

हा--! कहीं कोई अर्थ नही, कहीं कोई मूल्य नही, कहीं कोई उद्देश्य नही--हर ओर एक शून्यता, एक  रिक्तता, एक मूल्यहीनता, एक निराशा-- और मनुष्य की चेतना अवसाद से भर गई।

मनुष्यों में से दार्शनिको ने इस अवस्था को निहिलिज्म का नाम दिया।

इस रिक्तता, इस शून्यता, इस अर्थहीनता ने जब मानवीय चेतना को अवसाद से भर दिया तो इससे उभरने के लिए मनुष्यो ने अपने को फिर से परिभाषित करने का प्रयास किया लेकिन पिछली बार की तुलना में अब उनकी मनुष्य की नई परिभाषा में मनुष्य का अस्तित्व पहले था, उसका सार बाद में; अब मनुष्य का कोई पहले से बना बनाया सार नही था जिसकी ओर गति मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाती थी बल्कि अब आरंभ ही मनुष्य से होता जो अपने सार का निर्माण करता और यह सार निर्माण ही उसके जीवन की सार्थकता थी--अर्थात एक मूल्यहीन, अर्थहीन और अराजक जगत में मनुष्यों द्वारा अपने मूल्य, अर्थ और व्यवस्था की तलाश और अब महसूस किया  गया कि मनुष्य स्वतंत्र होने को अभिशप्त है।

परन्तु यदि समग्र जगत ही अर्थहीन और निरुद्देश्य है तो क्या मनुष्य का जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है जब कि वह तो खुद इस अराजकता और अतार्किकता की बहुत बड़ी गठरी के एक बहुत ही छोटे कोने में बहुत ही अमहत्वपूर्ण तरीके से पड़ा हुवा है--यह प्रश्न तो, बावजूद मनुष्य के अस्तित्व को उसके सार का पूर्वगामी मानने के, जस का तस मुँह बाए खड़ा है।
लेकिन समस्या यह भी है मनुष्य अपने जीवन का अर्थ ढूंढ़ने से बाज नही आता-सम्भवतः यह अर्थ तअलाशने की प्रवृति उसके जीवन के साथ ही ऐसी गुंथी हुई है कि वह इसे अलग नही कर सकता।

मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद को  एब्ज़र्ड के  नोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।
एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है और जब सब कुछ अर्थहीन है लेकिन मानव अर्थ खोजने को विवश है तो मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।

मनुष्य क्या करे जबकि वह  अपने जीवन के अर्थ ढूंढ़ने को विवश भी है और कहीं कोई अर्थ भी नही है---
तीन रास्ते हैं--
-----आत्महत्या

-----आस्था की छलांग लगाते हुए देश-काल से या
देश से या काल से अतीत  किसी अपरीक्षित 
सत्ता में विश्वाश करते हुए उसे उद्देश्य बनाकर जीना और इसी संदर्भ में जीवन के अर्थ की व्याख्या कर डालना लेकिन तब यह तो फिर आत्महत्या ही हुई--एक बौद्धिक और दार्शनिक आत्महत्या।

------इसको स्वीकार करते हुए कि जीवन और जगत का कोई अर्थ नही है और फिर भी हम उसका अर्थ ढूंढते है, के साथ इस बात से भी विद्रोह करते रहना और जीते जाना, हालांकि कुछ इस स्वीकार्यता और विद्रोह को शैतानी पागलपन भी कहते है, तब भी।

Thursday, June 24, 2021

ईश्वर और संसार

ईश्वर और संसार

समय के उस पार जब हममें से कोई नही था और हमारी दुनिया भी नही थी तब केवल वह था। वह न तो ईश्वर था न शैतान, न जड़ न चेतन हालांकि वह वेदना और आनन्द का सम्मिलित रूप था, उसमें चित भी था और अचित्त भी, वह सत भी था और असत भी। 
अपने आरंभ से ही वह महानिद्रा में सोया हुवा था फिर एक दिन उसकी नींद खुल गई-अब वह जाग गया था लेकिन जाग्रत अवस्था मे वह क्या करे?
उसने दूर-दूर तक देखा लेकिन हर जगह वह खुद को ही पाता था-उसकी दृष्टि बहिर्मुखी होने के बावजूद अंतर्मुखी थी। उसने देखा वह चित्त भी है और अचित्त भी, आनन्द भी और वेदना भी, जन्म भी और मृत्यु भी, अच्छा भी और बुरा भी। अपने अंदर असत, अचित्त और वेदना देखकर वह बेचैन हो उठा अतः उसने अपने भीतर के असत, अचित्त और वेदना को इकट्ठा करना प्रारम्भ किया। जब उसके अंदर के समस्त असत, अचित्त और वेदना इकट्ठे हो गए तो उसने इनको अपने से निकाल कर एक गठरी बनाई और उस गठरी को समय के उस पार फेंक दिया।
अब समय के एक तरफ ईश्वर था और दूसरी ओर संसार।

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ईश्वर-अनीश्वर--1

ईश्वर-अनीश्वर--1

इस जगत में कुछ भी पूर्ण नही है, प्रकृति भी नही क्योकि प्रकृति की विकृति का सुधार ही तो संस्कृति है और इस सुधार के द्वारा मनुष्य प्रकृति को पूर्णता प्रदान करने का प्रयास करता है और सबसे बड़ी बात की इन सब का रचयिता ईश्वर भी  पूर्ण नही है--वह दरअसल कभी पूर्ण था ही नही--उसकी अपूर्णता उसे हमेशा परेशान करती है और अपनी अपूर्णता से ईश्वर डरता है और मात्र वह डरता ही नही है बल्कि वह अपूर्णता को छुपाने के लिए हम मनुष्यों से झूठ बोलता है, हमे धोखा भी देता है। हमे धोखा देने के निमित उसने हमारे बीच अपने जासूस भेज रखे हैं जो हमारे बीच उसकी पूर्णता के झूठ का प्रचार करते हैं--उसकी पूर्णता के गीत और काव्य लिखते है।
इन जासूसों ने सदियों से राजाओं, महाराजो, नगरसेठों और धनवानों और शक्तिशालियों की बुद्धि के ऊपर कब्जा कर रखा है क्योकि उन्हें मालूम है कि यदि ईश्वर की पूर्णता के झूठ का बने रहना है तो इन लोगो को अपने जाल में फंसाए रखना जरूरी है--और देखिए राजाओं, महाराजाओं, नगरसेठ आदियों ने उसके झुठ को छुपाने के लिए असंख्य मंदिरों का निर्माण भी किया है जहाँ धन है, वैभव है, ऐश्वर्य है, पूर्णता का एहसास है लेकिन असल मे जो लोग नही देख पाते वह यह है कि वहाँ धोखा है।

ईश्वर की अपूर्णता का नाम अनीश्वर है। अनीश्वर ईश्वर के समान ही शाश्वत और अनश्वर है लेकिन ईश्वर के समान वह न तो सृष्टि की रचना करता है और न ही  उसके समान सचेतन सृष्टि में कोई हस्तक्षेप करता है लेकिन चूंकि अनीश्वर ईश्वर में ही मौजूद है अतः जहाँ भी ईश्वर उपस्थित जाता है वह स्वमेव उपस्थित है--ईश्वर के झूठ और धोखों में भी-ईश्वर के जासूसों द्वारा रचित काव्यो और गीतों में भी और राजाओं, महाराजाओं और नगरसेठों द्वारा बनाए गए मंदिरों में भी।

Wednesday, June 23, 2021

तत्त्वमीमांसा-1

अस्तित्व--ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता की त्रयी समेकित रूप से अस्तित्व की रचना करती है- इस अस्तित्व के बारे में चिंतन ही अधिभौतिकी है। 
वस्तुतः अस्तित्व हमारे सारे ज्ञान, हमारे सारे निर्णय, हमारे सम्पूर्ण अनुभव और हमारे सारे रागों में आरम्भ से ही उपस्थित है, बल्कि यह अस्तिव ही इन सारी चीजों का आधार है जिसपर हमारी कला, वाणिज्य, गणित और विज्ञान आदि खड़े होते  है ---इस आधार, तत्त्व, को पकड़ना ही अधिभौतिकी या तत्त्वमीमांसा है।
भारतीय परम्परा में ---
आत्मा ही वह तत्त्व है,
ब्रह्म ही वह तत्त्व है।
अतः आत्मा ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही आत्मा।

दर्शन ब्रह्मांड की व्याख्या नही करता बल्कि यह जगत और संसार की व्याख्या करता है। ब्रह्मांड विशेष दृष्टि का विषय है जिसको बौद्धिक प्रक्रियाओं द्वारा अनुभव में प्राप्त जगत और संसार से निगमित किया जाता है। ब्रह्मांड मूल्यों के साथ संयुक्त होकर जगत है और जगत जन्म- मृत्यु आदि घटनाओं से ऊपजे भाव सुख-दुख आदि द्वारा  के साथ संयुक्त होकर संसार का निर्माण करता है। एक दार्शनिक को संसार और जगत से मतलब रहता है, ब्रह्मांड वैज्ञानिक का विषय वस्तु है लेकिन  एक दार्शनिक को मात्र संसार से ही मतलब नही होता बल्कि वह ब्रह्मांड में पूर्व से उपस्थित तत्त्व या सत्ता को भी पकड़ने की कोशिश करता है और उसका यही प्रयास व्यवस्थित होकर तत्त्वमीमांसा के रूप में उभरता है। 
ध्यातव्य है कि वह तत्त्वमीमांसा ज्यादा सफल और फलीभूत मानी जाएगी जिसने तत्त्व के साथ संसार की भी व्याख्या कर दी।
यहाँ  मानव की बात न कि जाय तो मात्र अस्तिव और तत्त्व की बात करना बेमानी होगी---ज्ञेय और ज्ञान से ज्ञाता को अलग किया ही नही जा सकता हालांकि विज्ञान में ज्ञाता को इब्से अलग करना  वैज्ञानिक दृष्टि विशेष की बाध्यता भी होती है और आवश्यक शर्त भी- तर्क विश्लेषण करती है, अस्मद-युष्मद रचती है और भावना संश्लेषण करती है। तर्क में द्वैत का जन्म होता है और भाव मे अद्वैत का। और मनुष्य इसी तर्क-भावना के द्वंद का नाम है बल्कि इस द्वंद को पार कर जाना, इसे ट्रांसेड कर जाना ही मनुष्य होना है---और इसी द्वंद्व के पार वह मुक्ता जिसे तत्त्व कहते हैं मानवीय मुट्ठी में पकड़े जाने के लिए पड़ा हुवा है।

---जारी।

हमारी भाषा और उसका विरोधाभास

हमारे भाषा की रचना भी बड़ी विचित्र है-यह गुढ़ कथनों को अभिव्यक्त कर एक विरोधाभास में फंस जाती है, निषेध करती है तो वह निषेध ही विधेय बन जाता है, अज्ञेयता का प्रतिपादन करे तो अज्ञेय ज्ञेय बनकर झाँकने लगता है, शून्यता का प्रतिपादन करे तो स्वयम भाव के बारे में बात करती प्रतीत होने लगती है, सापेक्षता का निष्कर्ष स्थापित करे तो स्वयम एक निरपेक्ष भाव और प्रतिज्ञप्ति रचती प्रतीत हो रही होती है। 
एक कथन, एक भाव, एक विचार लीजिए:
"हमे जगत के अनुसंधान में निष्पक्ष होना चाहिए और किसी मत मतांतर की पुष्टि तुष्टि से बचना चाहिए" 
सामान्यतया वैज्ञानिक दृष्टि इस विचार को व्यवहार में उतारकर ऑब्जेक्टिव होने का दावा प्रस्तुत करती है किंतु उपरोक्त विचार की हमे जगत के अनुसंधान में-----पुष्टि तुष्टि से बचना चाहिए, स्वयम में एक मत है और इस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि भी निष्पक्ष कहॉ रह पाती है?

वस्तुतः जो चार्ज, जो आक्षेप दार्शनिक स्थापनाओं पर भाषा की इस विचित्रता के कारण लगाए जाते हैं उनको वैज्ञानिक दृष्टि और मान्यताओं पर भी उसी आग्रह के साथ लगाया जा सकता है।

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मेरी लघुकथाएँ


 【एक】
   राजा

उस राज्य की सबसे सुंदर स्त्री के सौंदर्य के चर्चे होते थे।  दूर देश के कवि उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे ताकि उनकी कविता श्रृंगार और विरह के अब तक अनछुए पक्षो को शब्दों में बांध सके। कुछ दीवानों ने तो उस स्त्री के लिए सम्राट के महल में, जहाँ वह रहती थी और उसका मनोरंजन करती थी, छुपकर प्रवेश करने की कोशिश भी की थी और फिर सम्राट के सजग सैनिकों द्वारा पकड़े गए थे और सम्राट के क्रूर जल्लादों द्वारा चौराहे पर काट डाले गए थे।

उस राज्य के सबसे ज्ञानी व्यक्ति के भी देश विदेश हर जगह चर्चे थे और सम्राट ने उसे सरस्वती-पुत्र की उपाधि भी दे रखी थी। वह समस्त शास्त्रों और समस्त विद्याओं का ज्ञाता था तब भी उसकी ज्ञान पाने की भूख मिटती ही नही थी।

सम्राट अपने सिंहासन के बाएं उस सौंदर्यवान स्त्री को अपने बाएं तथा ज्ञानी को दाएं बिठाकर शासन चलाता। 

एक दिन ज्ञानी और सौन्दर्यवती एक दूसरे पर आसक्त हो गए किंतु वह सम्राट से मन ही मन डरते भी थे अतः उनके मन मे इस विचार ने जन्म लिया कि सौंदर्य और  ज्ञान मिलकर शासन क्यो न करे, आख़िर हमे इस सम्राट की आवश्यकता क्या है! और यह विचार विद्रोह में बदल गया। 
ज्ञानी ने अपने ज्ञान से सबसे घातक विष तैयार किया जिसे उस सौन्दर्यवती स्त्री ने धोखे से सम्राट को उस रात शराब की प्याली में शराब ढालने वक्त मिला दिया। 

अगली सुबह सम्राट के सिंहासन के अगल-बगल की जगह खाली थी, पता चला कि कल रात ज्ञानी ने एक विष बनाया था जिसका उसने स्वयम पर प्रयोग किया   और उस विष की बेचैनी में उसने उस सौन्दर्यवती को मार दिया तथा स्वयम भी उस विष के प्रभाव से मर गया।

सिंहासन पर बैठे सम्राट की आँखों मे कोई पश्चाताप नही था बल्कि उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने पर संतोष का भाव दिखता था जो इस बात की चुगली थी कि वह बलवान है।
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【दो】

पतित

अपने अंतरंग वार्तालाप के क्षणों में नदी ने सागर से इठलाते हुए उस चट्टान के बारे में बताया: एक अभागा पत्थर था जो बाकी पत्थरो से टूट कर मुझमे गिर गया लेकिन मुझे तो सागर में मिलना था इसलिए मैंने उस पत्थर पर थोड़ी अठखेलिया कर लीं। और दोष मेरा भी नही है क्योंकि यदि मैं उस पर अठखेलिया ना करती तो वो मेरा बहाव रोक देता लेकिन मुझे तो सागर में मिलना है।
सागर अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता से बोला: पत्थरो की यही नियति है। मैं कई युगों से उनकी यह नियति देख रहा हूँ।

वही बगल में सागर और उस नदी की आंखों से अदृश्य उनकी बातें एक पतित देवदूत ने सुन लिया।
उसे अपनी और उस चट्टान की नियति एक दिखी--दोनों ही तो पतित थे; दोनों ही ने विद्रोह किया था; आह, दोनों ही ने तो सपने देखे थे!
तभी उस पतित देवदूत को स्मरण हुवा कि उसके पास तो स्वप्न विधाता ने भेजे थे और हाथ जोड़ते हुए यह मिन्नत की थी कि इस स्वप्न को देखो ताकि तुम पतित बनो--तुम पतित बनो क्योकि मेरी बनाई दुनिया अभी अपूर्ण है; मैं इसमें पुण्य डालना चाहता हूँ; मैं इसमें मुक्ति डालना चाहता हूँ; मैं इसमें धवल श्वेत रंग भरना चाहता हूँ लेकिन तब पुण्य के लिए पाप होना ज़रूरी है, धवल श्वेत रंग के लिए गहन तम का कालापन होना ज़रूरी है; मुक्ति के लिए मूल पाप का होना ज़रूरी है।
तो क्या इस पत्थर से भी विधाता ने प्रार्थना किया था, पतित देवदूत ने स्वयम से प्रश्न किया।

उधर सबसे ऊपर के आकाश में रहनेवाले जगत के सृष्टिकर्ता ने प्रयोगवश अपनी शब्दावली से पतित शब्द को मिटा दिया क्योकि वह देखना चाहता था कि इस शब्द के बगैर मानवता बनी रह सकती है कि नही।

पतित शब्द के मिटते ही विधाता का अस्तित्व भी वाष्पीकृत हो गया!

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【तीन】
अखलाक/ नैतिकता
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मजलिस जमी थी, यह रंको की मशहूर चौपाल थी जहाँ उनके बच्चे रंको की तहजीब सीखते। इस मजलिस के सामने जो ऊँची जगह थी वहाँ रखी तख्ती तब से मौजूद है जब से दुनिया मे बादशाहत कायम हुई। दुनिया मे बादशाहत कायम होने के अगले ही दिन वहाँ पहली मजलिस जमी थी। उस तख्त पर उसी दिन एक पहला नासेह बैठा था जिसने रँको को नैतिकता / अखलाकियत की पहली सबक सिखाई थी। 
तब से आज तक यह रवायत कायम थी। रंको की दुनिया का सबसे उम्दा नासेह उस तख्ती पर बैठता, सामने बच्चे बैठते और अखलाकियत कि सबक चलती।

नासेह ने एक दास्तान के ज़रिए सबक पढ़ना शुरू किया:
"एक क्रूर राजा था
था एक ज़ालिम बादशाह!"

कहते हैं कि करामन और कातिबीन हर जगह मौजूद होते हैं। इंसान के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का काम ईश्वर ने दो फ़रिश्तों को दे रखा है। ये फ़रिश्ते इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्म को लिखते हैं। इन फ़रिश्तों को करामन-कातिबीन कहा जाता है। ये फ़रिश्ते जिस रजिस्टर में कर्मों को लिखते हैं उसे नामा-ए-आमाल कहा जाता है। 

इस दिन किसी तरह नामा-ए-आमाल करामन कातिबीन के हाथ से फिसलकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा और किसी ने उसमे लिखी बाते पढ़ लीं। उसमे लिखा था: 
"यह रंको कि कौम के नासेह जो कहते हैं कि एक क्रूर राजा था, एक था ज़ालिम बादशाह, हक़ ये है कि वो बादशाह ज़ालिम हो न हो ये कौम बदअख़लाक़ी ज़रूर है, बिल्कुल बेईमान और भगोड़ी।"
 
आगे एक शेर दर्ज था जिस के नीचे करामन और कातिबीन दोनों के दस्तखत थे---

"तुम भी चाहते तो थे के तेरी ही होती दुनिया
उसकी दुनिया जो हुई, कहते हो ज़ालिम था वो!"
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【चार】
बी ए प्रोफेट ऑनटू दाईसेल्फ

इस समाचार को सुनने के पश्चात की सम्बुद्ध, वह जिन्हें सारे रहस्य ज्ञात हैं, कल इस पगडंडी से गुजरेंगे, सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाने वाला चर्मकार खुशी से झूम उठा--
"मेरी अज्ञानता ने मेरी राह रोक रखी है अतः कल महाज्ञानी से रहस्य को जानूँगा", चर्मकार ने इस प्रकार मन मे विचार और निश्चय किया।

अगली सुबह जब सम्बुद्ध जब उस चर्मकार की अस्थाई दुकान के सामने से गुजर रहे थे तब वह अपनी चटाई से लगभग छलांग लगाते हुए सम्बुद्ध के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया।

हे परमज्ञानी, मैं आपसे एक सत्य, एक रहस्य जानना चाहता हूँ, चर्मकार ने सम्बुद्ध से कांपते हुए कहा।
-मित्र, सत्य ही केवल उत्तर है, कुछ नही बल्कि मात्र सत्य, प्रश्न करो!
-प्रभु, जूतों की कैसे सिलाई करूँ की वह जूते न कभी घिसे, न फटे?
-एक सम्बुद्ध से इस प्रकार के ओछे प्रश्न करने की  तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!! सम्बुद्ध के अनुयायियों ने उनका अपमान समझते हुए क्रोधित होकर कहा।
-लेकिन प्रभु, मेरे लिए इसी प्रश्न का उत्तर सारे रहस्यों की कुंजी है क्योकि आपके पिता, जो इस राज्य के महाराजधिराज थे, ने मेरे पिता को इसी गलती के लिए सजा दी थी कि मेरे पिता ने उनके लिए जो जूते बनाए वह शाश्वत नही थे, कुछ  दिनों के पश्चात उनकी सिलाई खुल गई और मैं भी उस दण्ड को मैं भोग रहा हूँ तथा मेरी आने वाली पीढियां भी भोगेंगी।

सम्बुद्ध हमेशा की भांति मौन होक र आगे बढ़ गए-अव्यक्तानि;अप्रश्नानि!!
चर्मकार के मन मे एक निश्चय आया: अप्पदीपो भव!!

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【पाँच】

मुक्ति

अपराधी को फाँसी के तख्ते पर ले जाया गया। वहाँ उसके शरीर ने उन स्तम्भो को स्पर्श कर लिया जिनसे वह रस्सी बंधी थी जो थोड़ी ही देर में उसके गले मे पड़ने वाली थी--स्पर्श अत्यंत ठंढा था, बिल्कुल बर्फ सा--मानो समाज ही आज स्वयं सर्द, भावहीन होकर खड़ा हो--आखिर उसे अपने मे से ही किसी को मारना है। 
लेकिन, इस स्पर्श ने अपराधी के अंदर मृत्यु के भय को हिकारत की भावना में तब्दील कर दिया--यह स्पर्श उसके लिए कोई नया नही था--ठंढा और सर्द।
इसमें सर्द और ठंडे स्पर्श में उसने बल्कि समाज के उसके प्रति ठंडे और सर्द भावना को ही महसूस किया और वह तेजी से उस रस्सी के नीचे जाने के लिए छटपटा उठा मानो मृत्यु की गरमाहट का ही उसे वर्षो से इंतज़ार हो और यह गरमाहट ही उसकी मुक्ति हो।

सामने उसकी लाश पड़ी थी, उन्होंने अपने मे से किसी को अपना प्रतिनिधि बनाकर उसके लाश के पास भेजा। प्रतिनिधि ने उसके शरीर को स्पर्श किया--एकदम सर्द और ठंढा, उसके नब्जों को महसूस किया जो शांत पड़े थे।
प्रतिनिधि ने नोट किया-यह अब हमारे जैसा हो चुका है--शांत, सर्द और ठंढा।
फिर उसने इन तीनो शब्दो को मिलाकर एक शब्द अपनी रिपोर्ट में लिखा--अपराधमुक्त, और नीचे अपने दस्तखत कर दिए।

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【छह】

मनुष्य और जीवन

जब तक वह पत्थर रूप था उसे जीने की जरूरत ही नही थी--बस यूँ ही निष्प्राण कही उसे पड़े रहना था--हाँ कभी उसे मनुष्यो की ठोकर सहनी थी, कभी नदियों के साथ बहना था तो कभी हवाएं उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर रख देतीं।
फिर ईश्वर ने उसके अंदर जीवन फूंक दिया। अभी भी हालांकि उसका शरीर था तो पत्थर का ही लेकिन उसके अंदर कुछ नया उतपन्न हुवा जो अब मात्र पत्थर ना था--उसके इस नवीन अंश में कोमलता थी और अब  हवाएं और नदियाँ भी इस बात को जानते थे कि वह अब मात्र पत्थर न था क्योकि वह नदियों और हवाओ से खुद को सींचने लगा था--मनुष्यो ने भी उसके इस बदलाव को देखा और इस बदलाव में उन्हें अपना प्रारंभिक रूप दिखा-मनुष्य यह जान चुके थे कि उनकी अनन्त की यात्रा में उनका सहमार्गी उपस्थित हो चुका है। 

यद्यपि उस पत्थर के अंदर जीवन फुट चुका था तथापि उसका जीना मनुषयो के जीने से अलग था-उस जीवित पत्थर के लिए आज भी महज उसकी प्रवृत्तियां ही सबकुछ थी और वह इनके आगे नही बढ़ पा रहा था। उसके लिए पदत्त संसार ही उसका संसार था जबकि मनुषयो के पास प्रदत्त संसार से एक नवीन संसार का जन्म हो चुका था मानो पत्थर में प्राण वाली घटना उनके संसार के संदर्भ में दुबारा घटी हो।

उस जीवित पत्थर ने और ध्यान से देखा--मनुष्य दिए हुए संसार से अधिक इस नए संसार मे ज्यादा जीते थे--वह प्रवृतियों से आगे बढ़कर मूल्यों में जीने लगे थे।
पत्थर दार्शनिक की भांति गहन चिंतन में डूब गया और कुछ देर बाद उसकी आत्मा में यह प्रकाशित हुवा की वह मात्र जी रहा है जबकि मनुष्य जीवन का अर्थ जानते हैं।

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【सात】

देवता
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प्रोफेसर वृहस्पति सैमुअल अपनी कक्षा में विद्यार्थियों को साहित्य पढा रहे हैं। उन्होंने पुस्तक खोली और आज उन्हें जिस पाठ को पढ़ाना है उसका नाम "देवता" है।
प्रोफेसर सैम्युल का मानना है कि अतीत में मनुष्य पाखंडी थे। एक तरफ तो वह अमर होना चाहते थे लेकिन दूसरी तरफ वो अमरता से डरते थे। अतीत के मनुष्य अपनी कथाओ में, अपने मिथकों में, अपने पुराणों में अमर हुए पात्रों को शापित बना देते थे ज्यों मृत्यु जीवन से बेहतर हो और तभी चाहे वह अश्वत्थामा हो, वांडरिंग ज्यू हो या सलोमी हो, अमरता इनका अभिशाप है। 
प्रोफेसर सैम्युल का यह भी कहना था कि अतीत के मनुष्य मात्र पाखंडी ही नही बल्कि उनके अंदर दोहरा व्यक्तित्व, एक स्प्लिट पर्सनैलिटी थी क्योंकि तब मनुष्य मृत्यु से डरकर अमरत्व की कामना भी करते थे और अमरत्व से डरते भी थे। वह अपने मे से किसी के अमर हो जाने से घबरा भी जाते और कोई अमरता की चाहत न रखे इसके लिए मिथक भी रचते थे। लेकिन फिर वो अमरता की चाह भी रखते। अमरता की उनकी चाहत उनके द्वारा रचित उनके देवताओं में अभिव्यक्त होता था लेकिन विडम्बना की देवता उनमे से नही होता। 
प्रोफेसर ने लेक्चर प्रारम्भ किया:
"हमने जेनेटिक स्तर पर मृत्यु की उसमे मौजूद सूचना को  हमेशा जवान और युवा रहने की सूचना से परिवर्तित कर अतीत के उन मनुष्यो के पाखण्ड को ही मात्र खत्म नही किया बल्कि देवत्व की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए एक ऐसे मनुष्य का सृजन कर लिया है जिसका व्यक्तित्व उन अतीत के मानवो की भांति विभक्त नही है।
और हाँ, देवता अपनी प्रजाति नही बढ़ाते, वो स्वयम अमर होते हैं------"

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【आठ】

दानव
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"पर वह अश्वत्थामा की तरह अमर किन्तु मणि विहीन लोग हैं", सामने बैठे उस व्यक्ति ने कहा जो अन्य लोगो को सम्बोधित कर रहा था।
यह अतीत के एक समय की नही बल्कि भविष्य के एक समय की बात है। तब के वैश्विक सरकार की नज़र में ये लोग आतंकवादी है और इसलिए इनको आज सबसे बचकर यह मीटिंग करनी पड़ रही है जिसमे आज कुछ नए रिकरयूट भी शामिल होंगे।

मनुष्य वैज्ञानिक रूप से बहुत-बहुत ही ज्यादा प्रगति कर चुका है। आज किसी की चेतना को डिजिटलाइज कर उसको बायोप्यूटर में फीड कर उसको प्रिजर्व कर देने की बात भी इनके लिए बहुत पुरानी है। अब तो मनुष्य हज़ार -डेढ़ हजार साल से मरता ही नही। मनुष्य अब जीन को पूरी तरह कंट्रोल करना सीख गया है। भोजन भी अब जीवित रहने के लिए कोई करता ही नही, जिव्हा का कार्य अब मात्र कुछ इलेक्ट्रोड्स जोड़ कर स्वाद लेने का है। अपनी प्रजाति को बढाने के लिए सेक्स करने पर रोक लगा दी गई है  और ऐसी एक सरकारी एजेंसी है जो आपको स्टेराइल कर एक कार्ड इशु करती है जिसे रखना आपकी जिम्मेदारी है। हाँ आप मज़े के लिए चाहे जैसे सेक्स करें: रियल, वर्चुवल, कम्प्यूयर प्रोग्राम्ड...इसकी कोई मनाही नही है लेकिन यदि आप अपना स्टेरेलाइज़ेशन नही करवाते तो आप बायो-टेरोरिस्ट हैं और आपको सबसे दुखदाई तरीके से ही नही बल्कि आपके मस्तिष्क में पेन अमलीफिकेशन प्रोग्राम इम्प्लांट करके आपकी दर्द के अहसास को उस अनुपात में बढ़ा दिया जाता है जिस अनुपात का तब के मानक के अनुसार आपने अपराध किया है।

आज से एक लाख वर्ष पूर्व किसी ने यह कल्पना भी नही की थी कि भविष्य में स्वयम को जीवित रखने की प्रवृत्ति और अपनी प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति के मध्य टकराहट होगी लेकिन पिछले पच्चीस हजार वर्षों में यह हुवा है और स्वयम को जीवित रखने वाली प्रवृत्ति जीत गई है।
पूरे विश्व में हालांकि कुछ लोग हैं जो उनके पूर्वजो की अवस्था मे लौट जाने को सही मानते हैं। उनके अनुसार अंततः जीत प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति की होगी और उसके लिए वह संघर्षशील हैं।
सरकार की नज़र में ये बहुत ही खतरनाक
आतंकवादी हैं, बिल्कुल "दानव", इनका सफाया ज़रूरी है।

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【नौ】

मनुष्य

कुछ ज्ञानी उसे अभी भी पत्थर समझते हैं जबकि कुछ ज्ञानी उसे मात्र चेतना जबकि वास्तव में वह चेतन प्राणमय पत्थर है। दूसरे प्रकार के ज्ञानी उसे मात्र चेतन मान कर उसका स्रोत पत्थर और प्राण प्रकिया के बाहर किसी अन्य लोक में ढूंढते है जबकि वह अन्य लोक मैंने रचा ही नही है। जब मैं चेतन कहता हूं तो उसके अंदर प्राणमय पत्थर पूर्व से ही शामिल होता है जिसको यह ज्ञानी देख नही पाते -----अपनी डायरी का यह अंश पढ़कर ईश्वर ने  विचार किया कि क्या एक ऐसा शब्द नही हो सकता जिसके अंदर चेतना, प्राण और पत्थर के साथ  वह स्वयं भी शामिल हो?
लेकिन समस्या यह थी चेतन--प्राणमय--पत्थर की  
 श्रृंखला में खुद को आखिर रखे कहाँ--वह किसका विशेषण बने और विशेषित किससे हो क्योकि वह तो हर जगह विशेषण भी है विशेष्य भी। असल मे उसे ईश्वरमय ईश्वर-ईश्वरमय चेतना-ईश्वरमय प्राण-ईश्वरमय पत्थर--ईश्वरमय ईश्वर जैसा कुछ लिखना पड़ा लेकिन तब भी वह अपने इस लिखे से संतुष्ट नही था। उसकी असंतुष्टि ने तभी आकार ग्रहण किया और उसके सामने उपस्थित हो गई। ईश्वर ने उसे ध्यान से देखा तो यह मनुष्य था--इसके अंदर वह जो लिखना चाहता था वह सब कुछ तो था ही उसकी असंतुष्टि भी थी।

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【दस】

ॐ अपूर्णमद: अपूर्णमिदम

महासागर ने देखा उसमेंमें जल की विशाल राशि है। वह स्वयम भी जल की विशाल राशि ही है क्योकि वास्तव में तो उसमें "में" और है का भेद खत्म है। जलधि, जलनिधि, समुद्र या सागर एक दृष्टि में जल की एक बहुत बड़ी बून्द ही तो है-- बिल्कुल उस छोटी बून्द की तरह जो सामने रेत पर बैठे उस आदमी की उंगलियों पर मौजूद है। महासागर ने स्वयं से प्रश्न किया इस छोटी बून्द और मुझमें में पूर्ण कौन है? 
 उत्तर पाने के लिए महासागर ने पुनः अपनी ओर नजरें दौड़ाईं--वह विराट था, समग्र। उसे गर्व हुवा की उसने असंख्य वैसी छोटी बूंदों को अपने अंदर समेट रखा है लेकिन तत्क्षण वह परेशान हो उठा क्योकि उसे भान हुवा की वह तो छोटी छोटी उन बूंदों से ही मिलकर निर्मित है।

रेत पर बैठा वह आदमी जो अपनी उंगलियों पर बूंदों के साथ खेल रहा था कोई साधारण मानव न था। वह किसी के भी मन की बात पढ़ लेता था। वह सागर के पास गया और उसने सागर को वह बूंदे जो उसकी उंगलियों पर थी सागर को लौटाते हुए कहा--

 तुम दोनों ही अपने आप मे पूर्ण हो: यह छोटी बून्द भी और तुम महासागर भी। तुम जलनिधि जल की छोटी छोटी बूंदों से निर्मित होने के बावजूद, और ये छोटी बूंदे एक विशाल बून्द के टुकड़ों में बट जाने के बाद भी अपने आप मे पूर्ण हैं।

फिर उसने मन मे सोंचा--
महासागर की उस बड़ी बून्द को छोटी छोटी बूंदे बनना पड़ता है यह उसकी मुक्ति है और फिर इन छोटी बूंदों का महासागर बनना इन छोटी बूंदों की मुक्ति। 
मात्र यह बून्द ही बद्ध नही है,  महासागर भी मुक्त नही है क्योकि ये दोनों एक दूसरे के सामने अपूर्ण है।

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【ग्यारह】
हिन्दू-मुसलमान

"ख़ुदा है और क्या इसके सिवा तो कुछ भी नही
 है वो हसरतें, बनी आदम का ही जमते जाना"



खुदा/भगवान आदम की औलादों की हसरतों का ही जम जाना है जी, कही पत्थरो में तो कहीं अल्फाज़ो में:
हसरतें खत्म, खुदा तमाम!

तब हरफ़ बिखरे पड़े थे। अलिफ़ कहीं, लाम कहीं और हे कहीं। किसी ने हरफों को जोड़ दिया, हरफो में उसको बांध दिया। माटी भी बिखरी पड़ी थी, पत्थर भी तब लावारिश थे। किसी दूसरे ने माटी में, पत्थर में उसको गढ़ दिया।

किसी ने हरफों से मूर्ती बनाई तो किसी ने पत्थरो से सिफ़ात!
हिंदुओ में वह पत्थर में जम गया है, मुसलमानों में   निन्यानबे  अल्फाज़ो में -----मकसद एक ही है।

(बनी आदम: आदम की संतानें।)

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तत्त्व, अनुभव और यथार्थ

तत्त्व और अनुभव का द्वंद
द्वंद में उलझी विकृति 
प्रकृति निर्द्वन्द,
सजीव निर्जीव से परे,
जड़ न चेतन अरे,
वर्गीकरण से पार, अपार!
त्रिगुण की धार!!
मन क्या बुझे जो अ-मना?
यथार्थ, कई यथार्थ;
यथार्थ, अनुभव का गुणधर्म।
तत्त्व, यथो वाचो मनसा 
निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह;
शून्य, अज्ञेय या सच्चिदानन्द
वही सत अचित्त वेदना भी।

होलाका

बौद्ध दर्शन और संस्कृति में काम को मार कहते हैं। सिद्धार्थ मार विजय के पश्चात ही बुद्ध बनते हैं लेकिन यहीं बौद्ध विचार अपूर्ण हो जाता है क्योकि बौद्ध दर्शन में काम पुनर्जीवित नही होता और काम के बिना यह सृष्टि कैसी! 
हिन्दू विचार पद्धति में यद्यपि काम को शिव भष्म कर देते हैं तथापि वसंत ऋतु और मदनोत्सव में वह अभी कुछ दिन पहले ही महाशिवरात्रि में माता पार्वती के संग परिणय सूत्र में बंधकर स्वयं कामेश्वर बन कर मदन को नवजीवन प्रदान कर देते हैं और प्रकृति के विविध रंगों में, पुरषों की मस्ती में, स्त्रियों के अल्हड़पन में काम पुनर्जीवित हो उठता है--सृष्टि आगे बढ़ जाती है। 
लेकिन, एक चक्र तब तक तो पूर्ण हो चुका है--एक सम्वत्सर बीत चुका है, होलिका के रूप में अन्न की फलियां देवो को समर्पित की जा चुकी हैं--देवो ने अपना अंश भी ग्रहण कर लिया है--सम्हत जल चुकी है और अगले दिन होलाका क्रीड़ा जो रंगों और जल से की  जा रही है। 
शाश्त्रो में यह होलाका क्रीड़ा वस्तुतः देव यज्ञ है। 

[सनातन संस्कृति में पाँच प्रमुख यज्ञ हैं:--
ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ।
अपना बौद्धिक सम्वर्द्धन ब्रह्मयज्ञ है, देवताओं को उनका हिस्सा देना क्योकि वह वापस हमे पोषित करते हैं, देव यज्ञ है। कुल-परपरा का रक्षण पितृ यज्ञ है, मानवेतर प्राणियों को उनका हिस्सा देना भूत यज्ञ है और मानवमात्र से प्रेम और उनके कल्याण के अर्थ किया गया कार्य मानवयज्ञ है।

होलाका क्रीड़ा उन सामूहिक 20 क्रीड़ाओं में से एक है जिनके बारे में आचार्य वातस्यायन कामसूत्र में लिखते हैं;---
१.यक्षरात्रि, २ शरद पूर्णिमा, ३ सुवसन्तक, ४ सहकार भंजिका, ५ अभ्यूष खादिका, ६ बिसखादिका,७ नवपत्रिका, ८,उद्क क्ष्वेदिका, ९ पांचालानुयान, १० एक शाल्मली,११ यव चतुर्थी, १२ आलोल चतुर्थी, १३ मदनोत्सव, १४ दमन भंजिका, १५, होलिका, १६, अशोकोत्तनशिका, १७ पुष्पावचायिका, १८,चूतलतिका, १९ इक्षु भंजिका और २०, कदम्ब युद्ध

आचार्य वातस्याययन का आदेश है कि ये क्रीड़ाए नागरिक सम्मिलित होकर खेलें। 
आचार्य आगे लिखते हैं कि ये वर्णित क्रीड़ाए अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार अकेले नागरिक को नगरवधू के साथ, नगरवधू को अपनी सेविकाओं के साथ अथवा नागरिक को अपने मित्रों के साथ खेलनी चाहिए।]

Monday, June 21, 2021

पोस्टमार्टम

महेनदर बो (महेंद्र की औरत--महेंद्र की वधु---महेनदर बो) को नाग ने डँस लिया--विरह के नाग ने नही असली वाले नाग ने।  उनको लेकर लोग सामुदायिक चिकित्सा केंद्र भागे--वहां न डाक साब, न ए एन एम--रात थी और महेनदर बो को राते में मैदान लगा था और मैदाने में नाग ने डँस लिया--अब डाक साब तो सुबह आते लेकिन उनके पहले ही यमदूत आए और महेनदर बो का शरीर-कपड़ा-टिकली-बिंदी  उसी बेड पर छोड़ के बाकी चीज अपने साथ ले गए---चलs ढेर भईल!!

सुबह जनता ने किया बवाल---हेल्थ विभाग ये--हेल्थ विभाग वो---मुआवजा दो---सस्पेंड करो----इत्यादि।

परशाषन भी पहुंचा और साहब ने कहा ठीक है सब होगा पहिले पोस्टमार्टम ऑस्टमार्टम तो करवा लेने दीजिए।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ऐसी बनाई गई कि उसमें आया--- महेनदर बो सामुदायिक केंद्र लाने के पहले ही मर चुकी थी----उधर महेनदर बो को अस्पताल ले जाने वाले और उनके मरने तक साथ रहने वाले भौचचक---साला मरा आदमी भी जिंदा टाइप करता है----! करता ही होगा----डाक साब लोग पढ़े है तब न डाक साब बने हैं---!!----उ लोग जिंदा आ मुर्दा का भेद जादा बुझते हैं---!!!!!

दर्शन और जगत का अर्थ

दर्शन के बारे में कहा जाता है कि यह जीवन और जगत की सम्पूर्णता में व्यायख्या करने का प्रयास है, बल्कि यह संसार के अर्थ को समझने की कोशिश है। 
दो बातें हो सकती हैं--संसार का कोई अर्थ है अथवा संसार का कोई अर्थ है ही नही। संसार के अर्थ निर्धारण का इसके अलावा क्या अभिप्राय हो सकता है कि हम हम अपने अनुभवों को एक सन्दर्भ दें। हमे अपने अनुभवों को सन्दर्भ देने के लिए एक बहुत ही बड़े संरचना, स्ट्रक्चर या फ्रेमवर्क की आवश्यकता होती है जिसके अंदर हम अपने विविध अनुभवों को अलग अलग जगह रखकर एक कोहरेन्ट तस्वीर बनाने का प्रयास करते हैं। 

संरचनावादी मानते है कि प्रत्येक संरचना का एक केंद्र होता है जिसके इर्द गिर्द ही संरचनाए विकसित होती हैं-ब्रह्म, शून्यता, ईश्वर आदि ऐसे ही केंद्र हैं।
लेकिन तब संरचनावादियों के अनुसार अर्थ उभरने के लिए विपरितो की उपस्थिति भी आवश्यक है--प्रकाश को हम अंधकार की उपस्थिति में समझ ही नही सकते, जीवन को हम मृत्यु की उपस्थिति में नही समझ सकते, सत को हम असत की अनुपस्थिति में नही समझ सकते।

ध्यातव्य है कि कई बार हम विपरितो की कल्पना भी करते है क्योकि कई चीजें ऐसी है जिनके विपरीत का साक्षात हमे सम्भव नही है। नश्वरता का हमे अनुभव तो है लेकिन शाश्वतता की हमे कल्पना करनी पड़ती है लेकिन इस विपरीत के सृजन के पश्चात यह भी सम्भव है कि हमने अपने स्ट्रक्चर का जो केंद्र स्थापित किया था उसको इस नए विपरीत से प्रतिस्तापित कर दें और कालांतर में हमारे विमर्शों और चिंतन में यह विपरीत ही बार बार उस वास्तविक केंद्र को दबाते हुए उपस्थित हो और हमारी समझ चीजों की वास्तविक समझ से दूर होती चली जाय।
प्रश्न यह है कि क्या संसार और जगत को समझमे के लिए हमने जो केंद्र निर्धारित किया था वह वास्तव में ईश्वर और ब्रह्म था अथवा इनका बाइनरी और अब हमें संसार को अव्यवस्था और असत अचित्त वेदना को भी ध्यान में रखते हुए उन दार्शनिक साहित्यों के अंदर छुपे अर्थ को पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए जिनमे ऊपरी तौर पर ईश्वर, ब्रह्म आदि को केंद्र में रखकर संसार की विवेचना की गई है।

इस प्रकार के केंद्र प्रतिस्थापन से यद्यपि हमे एक नया अर्थ अवश्य मिलता है तथापि यह दावा नही किया जा सकता कि हमने चीजों के अर्थ को समझ लिया है क्योकि एक ही घटना को समझने के लिए संरचनाओं का कई तंत्र उपस्थित हो सकता है और प्रत्येक संरचना में एक दूसरे से मात्रात्मक और गुणात्मक रूप से अलग केंद्र उपस्थित हो सकते हैं और ऐसे में घटनाओ का एक निश्चित अर्थ होना अथवा कोई अर्थ होना कहना ही दुराग्रह होगा।

जीवन का अर्थ

जब तक वह पत्थर रूप था उसे जीने की जरूरत ही नही थी--बस यूँ ही निष्प्राण कही उसे पड़े रहना था--हाँ कभी उसे मनुष्यो की ठोकर सहनी थी, कभी नदियों के साथ बहना था तो कभी हवाएं उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर रख देतीं।
फिर ईश्वर ने उसके अंदर जीवन फूंक दिया। अभी भी हालांकि उसका शरीर था तो पत्थर का ही लेकिन उसके अंदर कुछ नया उतपन्न हुवा जो अब मात्र पत्थर ना था--उसके इस नवीन अंश में कोमलता थी और अब  हवाएं और नदियाँ भी इस बात को जानते थे कि वह अब मात्र पत्थर न था क्योकि वह नदियों और हवाओ से खुद को सींचने लगा था--मनुष्यो ने भी उसके इस बदलाव को देखा और इस बदलाव में उन्हें अपना प्रारंभिक रूप दिखा-मनुष्य यह जान चुके थे कि उनकी अनन्त की यात्रा में उनका सहमार्गी उपस्थित हो चुका है। 

यद्यपि उस पत्थर के अंदर जीवन फुट चुका था तथापि उसका जीना मनुषयो के जीने से अलग था-उस जीवित पत्थर के लिए आज भी महज उसकी प्रवृत्तियां ही सबकुछ थी और वह इनके आगे नही बढ़ पा रहा था। उसके लिए पदत्त संसार ही उसका संसार था जबकि मनुषयो के पास प्रदत्त संसार से एक नवीन संसार का जन्म हो चुका था मानो पत्थर में प्राण वाली घटना उनके संसार के संदर्भ में दुबारा घटी हो।
उस जीवित पत्थर ने और ध्यान से देखा--मनुष्य दिए हुए संसार से अधिक इस नए संसार मे ज्यादा जीते थे--वह प्रवृतियों से आगे बढ़कर मूल्यों में जीने लगे थे।

पत्थर दार्शनिक की भांति गहन चिंतन में डूब गया और कुछ देर बाद उसकी आत्मा में यह प्रकाशित हुवा की वह मात्र जी रहा है जबकि मनुष्य जीवन का अर्थ जानते हैं।

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...