Wednesday, December 4, 2019

बैलेंस

माना जाता है कि हम जितनी ऊर्जा की खपत करते है उसकी तुलना में बौद्धिकता के आउटपुट के मामले में बहुत ही इनएफिशिएंट मशीन हैं।
●●इसका कारण यह है कि हम मशीन नही हैं।

बौद्धिकता आवश्यक है किंतु मात्र बौद्धिकता मनुष्य से उसकी मनुजता हर लेती है और उसे एक नए प्रकार के जानवर में तब्दील कर देती है। प्रकृति को इसका शायद पूर्वाभास था अतः उसने मनुष्य में भावना भी भरी।

पशु न जननी को मानते हैं न जन्मभूमि को। पशु जिनमे से कुछ बुद्धिहीन हैं तो पशु जिनमे कुछ अत्यंत बुद्धिमान, बुद्धिपैशाचिकता की हद तक।

मात्र भावना भी मनुष्य का कल्याण करने के बजाय उसे "जोम्बी" "द वॉकिंग डेड" बना देती है। पश्चिमी विचार के इतिहास में पूरा मध्यकाल इसका उदाहरण है जब मनुजता थियोलॉजी की जोम्बी बनी  कई सौ वर्षों तक भटकती लोगो का खून चूसती रही।
भारत के सन्दर्भ में "अलगु बिगाड़ के डर से ईमान की बात बाद में करेगा।"

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