विज्ञान का चरित्र छद्मविज्ञान से इस अर्थ में भी भिन्न होता है कि कालांतर में इसके पूर्वमान्यताओ की पृष्ठभूमि में प्रारम्भ किए गए अन्वेषण यदि किसी ऐसे निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं जो अब उस पूर्वमान्यता से ही संगति नही रखते तो विज्ञान इन नवीन निष्कर्षो को अपनी पूर्वमान्यताओ में ही ढालने के लिए तोड़-मरोड़ नही करता बल्कि अपनी पूर्वमान्यता की ही जाँच करता है और उसमे अपेक्षित सुधार करता है। यदि सुधार से भी काम न बना तो फिर विज्ञान उनका परित्याग करने से भी नही हिचकता और एक नवीन पूर्वमान्यता को स्थापित कर उसे आगे के अनुसंधानों के लिए लिए पृष्ठभूमि में स्थापित करता है।
इस सन्दर्भ में दृष्टांत के लिए निरपेक्ष देश और काल, जिनमे घटनाएँ घटती थी, से जनरल रिलेटिविटी के उस देश-काल तक, जो मात्र कोई स्टेज न होकर घटनाओ में हिस्सा लेता है, की यात्रा बड़ी मनोरंजक है।
यहाँ दार्शनिक एक प्रश्न उठाते हैं कि क्या इस द्वितीय स्तर की पूर्वमान्यतावो के अस्तित्व में आने के बाद भी क्या यह कहा जा सकता है कि इन मान्यताओं के अनुरूप वाह्य जगत में भी वैसी ही सत्ता है? क्या यह सम्भव नही है कि हम प्रतिज्ञप्तियों या ज्ञान का एक ऐसा तन्त्र रच रहे है या हमारी बुद्धि हमसे धोखा करते हुए एक ऐसा ज्ञानतन्त्र रचवा रही हो जिसमें इस तंत्र के अव्ययों में संगति और सुसंगतता तो है किंतु उस पूर्वमान्यता के अनुरूप कोई सत्ता ही न हो?
अपनी बात को पुष्ट करते हुए एक ऐसे स्वप्न का उदाहरण दिया जा सकता है जिसमें सुख-दुख आदि की अनुभूति तो होती है किंतु यह बोध नही होता कि स्वप्न में हम स्वप्न-जगत में रहते हैं और उस स्वप्न के "मैं" मे भी मैं और जगत विषयक कुछ पूर्वमान्यता विद्यमान होती है।
यहाँ व्यक्ति की "ज्ञान" विषयक क्या अवधारणा है यह निर्धारित करता है कि वह अज्ञेयवादी, संशयवादी, शून्यवादी, मायावादी या अर्थक्रियावादी विश्वदृष्टि अपनाएगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज्ञान के विषय मे एक अर्थक्रियावादी समझ रखता है। इसके अनुसार ज्ञान किसी अतीन्द्रिय सत्ता के निमित्त नही है बल्कि इसका केवल और केवल सर्वाइवल मूल्य है हालांकि विकास वृक्ष में अपनी अब तक सबसे विशिष्ट अवस्थिति के कारण मनुष्य इसका कुछ उपयोग ठीक उसी प्रकार अलग भी कर सकता है ज्यों हम अपने कंकाल तन्त्र और पेशी तन्त्र का उपयोग ब्रेकडान्स के लिए भी कर लेते है हालांकि हमारी पेशियाँ और कंकाल ब्रेक-डांस करने के निमित नही विकसित हुए।
इस सन्दर्भ में दृष्टांत के लिए निरपेक्ष देश और काल, जिनमे घटनाएँ घटती थी, से जनरल रिलेटिविटी के उस देश-काल तक, जो मात्र कोई स्टेज न होकर घटनाओ में हिस्सा लेता है, की यात्रा बड़ी मनोरंजक है।
यहाँ दार्शनिक एक प्रश्न उठाते हैं कि क्या इस द्वितीय स्तर की पूर्वमान्यतावो के अस्तित्व में आने के बाद भी क्या यह कहा जा सकता है कि इन मान्यताओं के अनुरूप वाह्य जगत में भी वैसी ही सत्ता है? क्या यह सम्भव नही है कि हम प्रतिज्ञप्तियों या ज्ञान का एक ऐसा तन्त्र रच रहे है या हमारी बुद्धि हमसे धोखा करते हुए एक ऐसा ज्ञानतन्त्र रचवा रही हो जिसमें इस तंत्र के अव्ययों में संगति और सुसंगतता तो है किंतु उस पूर्वमान्यता के अनुरूप कोई सत्ता ही न हो?
अपनी बात को पुष्ट करते हुए एक ऐसे स्वप्न का उदाहरण दिया जा सकता है जिसमें सुख-दुख आदि की अनुभूति तो होती है किंतु यह बोध नही होता कि स्वप्न में हम स्वप्न-जगत में रहते हैं और उस स्वप्न के "मैं" मे भी मैं और जगत विषयक कुछ पूर्वमान्यता विद्यमान होती है।
यहाँ व्यक्ति की "ज्ञान" विषयक क्या अवधारणा है यह निर्धारित करता है कि वह अज्ञेयवादी, संशयवादी, शून्यवादी, मायावादी या अर्थक्रियावादी विश्वदृष्टि अपनाएगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज्ञान के विषय मे एक अर्थक्रियावादी समझ रखता है। इसके अनुसार ज्ञान किसी अतीन्द्रिय सत्ता के निमित्त नही है बल्कि इसका केवल और केवल सर्वाइवल मूल्य है हालांकि विकास वृक्ष में अपनी अब तक सबसे विशिष्ट अवस्थिति के कारण मनुष्य इसका कुछ उपयोग ठीक उसी प्रकार अलग भी कर सकता है ज्यों हम अपने कंकाल तन्त्र और पेशी तन्त्र का उपयोग ब्रेकडान्स के लिए भी कर लेते है हालांकि हमारी पेशियाँ और कंकाल ब्रेक-डांस करने के निमित नही विकसित हुए।
No comments:
Post a Comment