जगत को आज हम जितना समझते हैं, विज्ञान के बल पर इसे जितना बदल सकते हैं उस विज्ञान की यात्रा प्राचीन ग्रीस के मिलेटस में थेलस के इस प्रश्न से प्रारम्भ हुई थी कि जगत अंततः किस तत्व से बना है। ऐसा नही है कि मानव मन में थेलस के पूर्व यह जिज्ञासा नही थी लेकिन थेलस के पूर्व उत्तर परीक्षण, प्रेक्षण और तार्किकता की जगह भावात्मकता और कल्पना से दिए जाते थे। जगत के विषय मे कल्पना और भावात्मकता के आधार पर इसके विषय मे उठी जिज्ञासा प्रत्येक संस्कृति और सभ्यता की एक सामान्य विशेषता रही है लेकिन अपनी इस प्रवृत्ति से असंतुष्ट होकर प्रेक्षण और तार्किक चिंतन के द्वारा उत्तर देने का प्रयास सर्वप्रथम ग्रीस के मिलेट्स में ही प्रारम्भ हुई। यही कारण है कि थियोरेटिकल फिजिसिस्ट यथा सिन कैरोल या कार्लो रोवेळी जब क्रमशः हिग्स बोसोन या कवांतम ग्रैविटी की बात करते हैं तो इस माईलेशीयन थाती का जिक्र करना नही भूलते।
मिलेट्स एथेंस और स्पार्टा के स्वर्ण युग के पूर्व ग्रीस का सबसे महत्वपूर्ण शहर था जहाँ मेसोपोटामिया से कारवां तथा संपूर्ण भूमध्य सागर से जहाजें एकत्र होती थीं और इनके साथ एकत्र होते थे अलग अलग जगहों से विचार। इन अलग अलग जगहों के विचार ने मिलेट्स में एक बौद्धिक क्रांति पैदा की और अब ये विचारक जगत की मिथकीय व्याख्या से संतुष्ट न थे।
थेलस मिश्र देश से ज्यामिति की परम्परा लाए थे। इनके अनुसार जल ही ऐसा मूल तत्व है जिससे सभी वस्तुवे उतपन्न हुई हैं और जिसमे सब विलीन हो जाती हैं।
ध्यान देना होगा कि उस काल मे कालांतर के वैज्ञानिक एवम मिथकीय चिंतन का भेद मानवीय चेतना मे स्पष्ट नही हो पाया था। थेलस चुम्बक में भी आत्मा के वास को स्वीकार करते थे साथ ही उनका यह भी मानना था कि सभी वस्तुओ में देवता भरे हुए हैं।
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